
नई दिल्ली, 14 अक्टूबर (प्रेस ब्यूरो)। एक व्यापक वर्ग, जो हार्वर्ड विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों और शोध समूहों से मिलकर बना है, ने भारत में संवैधानिक संस्थाओं के प्रति चल रहे नकारात्मक सार्वजनिक विमर्श और एक सुनियोजित अभियान के बारे में गहरी चिंता व्यक्त की। इस समूह ने कहा कि वर्तमान में चुनाव आयोग, उच्चतम न्यायालय और मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय सहित कई प्रमुख संस्थाओं को लक्ष्य बनाकर सार्वजनिक राय को प्रभावित करने के प्रयत्न देखे जा रहे हैं।
समूह के प्रमुख प्रवक्ता ने कहा, “हम इस बात को लेकर अत्यंत चिंतित हैं कि लोकतंत्र की बुनियादी संस्थाएँ, जो किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की स्थिरता और न्यायसंगतता को सुनिश्चित करती हैं, उन पर निरंतर आलोचना और अपमानजनक टिप्पणी की जा रही है। ऐसी सुनियोजित अभियान न केवल संस्थागत स्वतंत्रता को कमजोर करती है, बल्कि नागरिकों में भरोसे को भी क्षति पहुंचाती है।”
वक्तव्य में यह भी उल्लेख किया गया कि इस प्रकार की प्रवृत्ति को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक समुदाय को सतर्क रहना चाहिए और भारत के भीतर सच्ची संवादात्मक प्रक्रिया को प्रोत्साहित करना चाहिए। उन्होंने कहा, “हमें आशा है कि सभी स्टेकहोल्डर, विशेषकर मीडिया और सामाजिक मंच, जिम्मेदार रिपोर्टिंग और तथ्यपरक विश्लेषण को प्राथमिकता दें, जिससे संविधानिक संस्थाओं को उनका वैध स्थान प्राप्त हो सके।”
समूह ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी भी सरकार या राजनीतिक दल की आलोचना करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि लोकतांत्रिक सिद्धांतों का सम्मान और संरक्षण हो। उन्होंने कहा कि यदि इस नकारात्मक सार्वजनिक विमर्श को अनियंत्रित रहने दिया गया, तो इससे दीर्घकालिक रूप से लोकतंत्र की नींव कमजोर हो सकती है और नागरिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
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