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रेप पीड़िता: सुप्रीम कोर्ट का आया निर्णय एक सबक, उनके लिए जो अपनी जिम्मेदारी से भागते हैं!

रेप पीड़िता: सुप्रीम कोर्ट का आया निर्णय एक सबक, उनके लिए जो अपनी जिम्मेदारी से भागते हैं!

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डॉ. निवेदिता शर्मा गाजियाबाद की चार वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को इलाज देने से इनकार करने वाले दो निजी अस्पतालों पर सर्वोच्च न्यायालय की तीखी टिप्पणी ने सभी देशवासियों का अपनी ओर ध्‍यान खींचा है। पूरे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था, पुलिस तंत्र, प्रशासनिक जवाबदेही और सामाजिक संवेदनशीलता पर ऐसे मामले सामने आने पर गंभीर प्रश्न खड़े हो जाते हैं। मु एक तरह से देखें तो मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने जिस स्पष्टता से कहा कि "यदि आपने अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया तो अपने नाम के आगे डॉक्टर लिखने का कोई अधिकार नहीं है," वह उन सभी लोगों के लिए चेतावनी है जो अपने पेशे को केवल व्यवसाय समझ बैठे हैं या जो जिम्‍मेदारी उन्‍हें मिली है, उससे जुड़ा वह कार्य जिम्‍मेदारीपूर्वक पूर्ण करना नहीं चाहते। इस घटना में चार वर्षीय मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ। परिजन उसे उपचार क...
संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक : क्या भारत अपनी सांस्कृतिक शक्ति खो रहा है?

संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक : क्या भारत अपनी सांस्कृतिक शक्ति खो रहा है?

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कैलाश चन्द्र संयुक्त परिवार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें बच्चे केवल अपने माता-पिता के साथ नहीं, बल्कि भाई-बहनों, चचेरे-ममेरे भाई-बहनों, दादा-दादी तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ रहते हुए जीवन जीना सीखते हैं। जब तीन-चार बच्चे एक साथ खेलते हैं, साथ बैठकर भोजन करते हैं, अपने खिलौने और वस्तुएँ बाँटते हैं, छोटे-बड़े का ध्यान रखते हैं और छोटी-छोटी बातों पर रूठते-मनाते हैं, तब उनके भीतर बिना किसी औपचारिक शिक्षा के सामाजिक जीवन के संस्कार विकसित होने लगते हैं। वे समझते हैं कि जीवन केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति का नाम नहीं, बल्कि दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने का भी नाम है। परिवार उन्हें सहयोग, सहिष्णुता, त्याग, धैर्य, अनुशासन, साझेदारी और परस्पर उत्तरदायित्व का व्यावहारिक प्रशिक्षण देता है। इसी वातावरण में परस्पर स्नेह, आत्मीयता, अपनापन और एक-दूसरे का सहारा बनने की भावना स्वाभाविक ...
मानसून की चुनौती: आखिर स्मार्ट शहर भी क्यों हो रहे हैं बेबस?

मानसून की चुनौती: आखिर स्मार्ट शहर भी क्यों हो रहे हैं बेबस?

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- योगेश कुमार गोयल मानसून ने इस वर्ष अपने आगमन के साथ ही देश के बड़े हिस्से में राहत से अधिक आफत का संदेश दिया है। जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ से लेकर महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा और मध्य प्रदेश तक प्रकृति का रौद्र रूप साफ दिखाई दे रहा है। भारी बारिश, भूस्खलन, बादल फटने और बाढ़ जैसी घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हमारा बुनियादी ढांचा और प्रशासनिक तैयारी अभी भी इस प्राकृतिक चुनौती का सामना करने में सक्षम नहीं है। जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले में लगातार मूसलाधार बारिश के चलते भूस्खलन की घटनाएं सामने आई हैं, जिससे राष्ट्रीय राजमार्ग-244 कई स्थानों पर क्षतिग्रस्त हो गया है। ऐसी घटनाएं न केवल आवागमन को बाधित करती हैं बल्कि यह भी दिखाती हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण और रखरखाव में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव है। महाराष्ट्र के पुणे जिले मे...
मध्य प्रदेश में तकनीक आधारित उद्योग विकास : संदर्भ- ‘एमपी टेक ग्रोथ कॉन्क्लेव 3.0’

मध्य प्रदेश में तकनीक आधारित उद्योग विकास : संदर्भ- ‘एमपी टेक ग्रोथ कॉन्क्लेव 3.0’

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारत में पिछले एक दशक हुए डिजिटल परिवर्तनों ने  राष्ट्रीय विकास के आगे उसे आज अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर विकास की धुरी बनाया है। डिजिटल इंडिया मिशन, इंडिया एआई मिशन, सेमीकंडक्टर मिशन, मेक इन इंडिया और स्टार्टअप इंडिया जैसी पहलों ने देश को नई तकनीकी दिशा दी है। इसी राष्ट्रीय दृष्टि को राज्य स्तर पर गति देने का प्रयास इन दिनों मध्यप्रदेश में होता हुआ देखा जा सकता है, जिसमें कि 'एमपी टेक ग्रोथ कॉन्क्लेव 3.0' उसी परिवर्तन का सशक्त प्रतीक बनकर हमारे सामने है। यह सम्मेलन निश्‍चि‍त ही मुख्‍यमंत्री डॉ. मोहन यादव की उस नई आर्थिक सोच का परिचायक है, जिसमें मध्यप्रदेश स्वयं को कृषि प्रधान राज्य की पारंपरिक छवि से आगे बढ़ाकर भारत के उभरते हुए हाई-टेक औद्योगिक और डिजिटल केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहता है। वस्‍तुत: जैसा कि मुख्‍यमंत्री कई अवसरों पर कहते भी रहे हैं कि वि...
अभाविप : एक प्रासंगिक छात्र आंदोलन

अभाविप : एक प्रासंगिक छात्र आंदोलन

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– चेतस सुखाड़िया भारत का छात्र आंदोलन केवल छात्रसंघ चुनावों या शैक्षणिक मांगों तक सीमित नहीं रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रनिर्माण तक विद्यार्थियों ने समय-समय पर अपनी सक्रिय भूमिका निभाई है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि बदलते समय, शिक्षा के उभरते नए आयाम, तकनीकी क्रांति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में छात्र संगठनों की प्रासंगिकता क्या है? यदि कोई छात्र संगठन समय के साथ स्वयं को समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालते हुए विद्यार्थियों के हितों और राष्ट्रीय दायित्वों के बीच संतुलन स्थापित करता है, तो उसकी प्रासंगिकता स्वतः सिद्ध होती है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) इसी दृष्टि से भारत का एक प्रासंगिक छात्र आंदोलन है। जिसने स्वयं को कालसुसंगत बनाते हुए संपूर्ण विद्यार्थी समाज को अपने साथ जोड़ने कार्य कि...
वीबी-जी राम जी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को करेगा मजबूत

वीबी-जी राम जी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को करेगा मजबूत

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डॉ.लोकेश कुमार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार ने ग्रामीण सशक्तीकरण को लेकर बड़ा कदम उठाया है, जो एक जुलाई, 2026 से पूरे देश में वीबी-जी राम जी के नाम से लागू होने जा रहा है। मनरेगा के स्थान पर विकसित भारत- गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ( वीबी-जी राम जी) योजना पूरे देश के ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर, समावेशी और सशक्त बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी। गांवों से रोजगार की तलाश में शहरों में हो रहे पलायन को रोकने के लिए यह एक कारागार कदम है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र सरकार ने इस योजना में 95 हजार, 692 करोड़ रुपये का बजटीय आवंटन किया है, जो ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के लिए अब तक का सर्वाधिक आवंटन राशि है। राज्यों के राज्यांश सहित इस कार्यक्रम का कुल परिव्यय 1.51 लाख करोड़ रुपए से अधिक होने का अनुमान है। ग्रामीण क्षेत्र के ऐसे प्रत्येक पात्र परिवार को ...
बाल पुरस्कारों के लिए मप्र के बच्चों का आह्वान

बाल पुरस्कारों के लिए मप्र के बच्चों का आह्वान

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प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार के लिए आगे आएं प्रदेश के होनहार बच्चे -डॉ. निवेदिता शर्मा भारत प्रतिभाओं की धरती है। यहां के गांवों, कस्बों और शहरों में ऐसे हजारों बच्चे हैं, जो अपनी उम्र से कहीं आगे बढ़कर समाज, पर्यावरण, विज्ञान, खेल, कला और संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। कोई कठिन परिस्थितियों में भी पढ़ाई जारी रखते हुए वैज्ञानिक सोच के साथ नवाचार कर रहा है, कोई जल और जंगल बचाने का अभियान चला रहा है, कोई राष्ट्रीय स्तर पर खेलों में नाम रोशन कर रहा है, तो कोई अपनी संवेदनशीलता और साहस से समाज के लिए मिसाल बन रहा है। स्‍वभाविक है इस कार्य को मध्‍य प्रदेश के हमारे अपने अनेकों बच्‍चे भी कर रहे हैं, किंतु दुर्भाग्य यह है कि इनमें से अनेक बच्चों की प्रेरक कहानियां स्थानीय स्तर तक ही सीमित रह जाती हैं। वास्‍तव में ऐसे बच्चों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के उद्द...
समान नागरिक संहिता का बाल-अधिकार दृष्टिकोण

समान नागरिक संहिता का बाल-अधिकार दृष्टिकोण

लेख, विशेष समाचार
- डॉ. निवेदिता शर्मा भले ही भारत का संविधान प्रत्येक बच्चे को गरिमा, समानता, सुरक्षा और विकास का अधिकार प्रदान करता है, किंतु जब भी हम परिवार, विवाह, तलाक, उत्तराधिकार या सामाजिक परंपराओं की चर्चा करते हैं, तब प्रायः वयस्कों के अधिकारों और दायित्वों पर अधिक विचार होता है। जिसकी वाणी अक्सर सबसे कम सुनाई देती है, वे हैं हमारे बच्चे। वास्तव में किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता इस बात से मापी जाती है कि वह अपने बच्चों के अधिकारों और हितों की कितनी प्रभावी रक्षा करती है। आज जब मध्यप्रदेश समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की दिशा में विचार कर रहा है, तब यह आवश्यक है कि इसका प्रारूप वैवाहिक, पारिवारिक और उत्तराधिकार संबंधी कानूनों का एकीकरण करने तक सीमित न रहे, वह बाल-अधिकारों की सुरक्षा का भी सशक्त दस्तावेज बने। इसी दृष्टि से मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर विचार...
वैश्विक तनावों के बीच भारत की आर्थिक दृढ़ता

वैश्विक तनावों के बीच भारत की आर्थिक दृढ़ता

लेख
- डॉ. मयंक चतुर्वेदी पश्चिम एशिया में जारी तनाव, वैश्विक व्यापार में सुस्ती और विकसित अर्थव्यवस्थाओं की कमजोर पड़ती मांग के बीच यदि कोई देश अपेक्षाकृत आत्मविश्वास के साथ आज आगे बढ़ता दिखाई देता है, तो वह भारत है। वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत में सामने आए जीएसटी संग्रह, विनिर्माण गतिविधियों और सेवा क्षेत्र के आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत स्थिति को दर्शा रहे हैं। वस्तुत: मई 2026 में सकल जीएसटी संग्रह लगभग 1.94 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंचना इस बात का संकेत है कि आर्थिक गतिविधियों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। यद्यपि शीर्ष स्तर पर यह वृद्धि केवल 3.2 प्रतिशत दिखाई देती है, किंतु रिफंड समायोजन के बाद वास्तविक राजस्व वृद्धि लगभग 9 से 10 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। यह बताता है कि अर्थव्यवस्था में उपभोग और कारोबारी गतिविधियों का आधार अपेक्षाकृत मजबूत बना हुआ है। वित्त वर्ष के श...
न्यायालय के आलोक में बेटी का अधिकार!

न्यायालय के आलोक में बेटी का अधिकार!

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-डॉ. निवेदिता शर्मा भारतीय न्यायपालिका ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि न्याय हमेशा ही समाज की बदलती वास्तविकताओं को स्वीकार करते हुए समानता, गरिमा और मानवीय अधिकारों की रक्षा का सशक्त माध्यम है। उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया हालिया निर्णय, जिसमें विवाहित बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति एवं आश्रित कोटे के लाभों से बाहर रखने को असंवैधानिक ठहराया गया है, भारतीय न्यायिक इतिहास में महिला अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय कहलाएगा । वास्‍तव में यह निर्णय उस सोच को भी चुनौती देता है जो विवाह के बाद बेटी को उसके माता-पिता के परिवार से अलग मान लेने की प्रवृत्ति रखती है। कई बार माता-पिता के लिए भी और कई बार परिवार के भाई एवं अन्‍य कुटुम्‍बजनों के लिए। माननीय न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने स्पष्ट कहा कि विवाहित पुत्री को “परिवार”...