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देशभक्ति पर तकरार क्यों? राहुल गांधी का बढ़ता आत्मविश्वास क्या कोई राजनीतिक संदेश है?

देशभक्ति पर तकरार क्यों? राहुल गांधी का बढ़ता आत्मविश्वास क्या कोई राजनीतिक संदेश है?

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सौरभ वार्ष्णेयदेशभक्ति किसी राजनीतिक दल या विचारधारा की बपौती नहीं है। यह संविधान, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्र के प्रति नागरिकों की निष्ठा से जुड़ी भावना है। फिर आखिर देशभक्ति को लेकर राजनीतिक तकरार क्यों ? क्या राष्ट्रप्रेम का प्रमाण एक-दूसरे पर आरोप लगाकर और बहस की चुनौती देकर दिया जाएगा? भारतीय राजनीति में इन दिनों जिस तरह बयानबाजी और कटाक्ष का दौर तेज हुआ है, उसमें कांग्रेस नेता राहुल गांधी का बदला हुआ राजनीतिक तेवर विशेष चर्चा का विषय बन गया है। देश में कथित वोट चोरी और मतदाता सूची की पारदर्शिता को लेकर विपक्षी आंदोलन शुरू होने के बाद राहुल गांधी लगातार केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमलावर हैं। अब उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रधानमंत्री को सीधे बहस की चुनौती देकर राजनीतिक सरगर्मी और बढ़ा दी है। राजनीति में एक-दूसरे पर कटाक्ष करना और सवाल उठाना नई बात ...
कब तक अभियान और अनुदान के भरोसे होगा जल संरक्षण?

कब तक अभियान और अनुदान के भरोसे होगा जल संरक्षण?

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- नीलेश वर्मा जल संकट अब किसी एक गांव, शहर या प्रदेश की समस्या नहीं रह गया है, देश के अनेक जिले आज तेजी से सूखाग्रस्त घोषित हो रहे हैं। अनियमित मानसून एवं भूजल के लगातार गिरते स्तर से आने वाले समय की बड़ी चुनौती हमारे सामने खड़ी है। बारिश का मौसम अभी समाप्त ही हुआ है और जल का पर्याप्त संचय नहीं कर पाने का परिणाम हमारे सामने है। आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब तक जल संरक्षण के नाम पर हम अभियान, सरकारी योजनाएं और आर्थिक अनुदान के भरोसे बैठे रहेंगे? क्या जल संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी है? इसलिए अब प्रत्येक नागरिक को अपनी भूमिका निभानी होगी, क्योंकि जल ही जीवन है और यही हमारे कल को निर्धारित करेगा। भारत में विभिन्न राज्यों  के अनेक जिलों में सूखे की स्थिति नीचे जानेंगे, जो आगामी ग्रीष्म ऋतु में गंभीर जल संकट का रूप ले सकती है हाल के दिनों में महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश सहित देश के...
जांच से संरक्षण और जांच एजेंसियों की स्वायत्तता के बीच संवैधानिक संतुलन

जांच से संरक्षण और जांच एजेंसियों की स्वायत्तता के बीच संवैधानिक संतुलन

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By: AUTONOMY ARTICLE-INVESTIGATIVE-AGENCIES जांच से संरक्षण और जांच एजेंसियों की स्वायत्तता के बीच संवैधानिक संतुलन अभिषेक शुक्ल विनीत नारायण से तेजाराम तक का सफर बताता है कि ईमानदार प्रशासनिक निर्णयों को संरक्षण देना जितना जरूरी है, भ्रष्टाचार की जांच को निर्बाध रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। धारा 17ए पर सर्वोच्च न्यायालय की ताजा व्याख्या ने इसी संवैधानिक बहस को नई दिशा दी है। कल्पना कीजिए कि एक सरकारी अधिकारी किसी जनहितकारी योजना के क्रियान्वयन, किसी कर्मचारी की पदोन्नति अथवा किसी सार्वजनिक परियोजना के संबंध में निर्णय लेता है। निर्णय लेने के बाद उस पर भ्रष्टाचार का आरोप लग जाता है। यदि प्रत्येक प्रशासनिक निर्णय के बाद अधिकारी को आपराधिक जांच का भय सताने लगे तो वह कठिन और महत्वपूर्ण फैसले लेने से बच सकता है। प्रशासन में निर्णयहीनता पैदा हो सकती है। तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। यदि क...
आखिर कौन बो रहा है बच्चों के मन में हिंसा के बीज?

आखिर कौन बो रहा है बच्चों के मन में हिंसा के बीज?

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By: CHILDREN ARTICLE-VIOLENT-BEHAVIOR आखिर कौन बो रहा है बच्चों के मन में हिंसा के बीज? -योगेश कुमार गोयल बचपन को मासूमियत, निश्छलता, संवेदनशीलता और खिलखिलाती मुस्कान का पर्याय माना जाता है। बच्चों के हाथों में खिलौने अच्छे लगते हैं, पत्थर और ईंटें नहीं, उनकी आंखों में सपने अच्छे लगते हैं, किसी के प्रति नफरत और हिंसा नहीं। लेकिन जब 8-10 वर्ष की उम्र के बच्चे भी किसी दूसरे मासूम की जान लेने पर उतारू हो जाएं, तब सवाल केवल एक बच्चे के असामान्य व्यवहार का नहीं रह जाता बल्कि पूरे सामाजिक परिवेश, पारिवारिक संस्कारों, शिक्षा व्यवस्था और हमारी बदलती जीवनशैली का हो जाता है। हरियाणा के पंचकूला में छह साल की विशेष आवश्यकता वाली बच्ची पर तीसरी कक्षा के आठ वर्षीय छात्र द्वारा किया गया बर्बर हमला इसी भयावह वास्तविकता का आईना है। जब पंचकूला के सेक्टर-20 स्थित राजकीय संस्कृति मॉडल स्कूल में हुई इस ह...
किसानों को ग्रीन अमोनिया से सस्ती खाद की उम्मीद

किसानों को ग्रीन अमोनिया से सस्ती खाद की उम्मीद

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सौरभ वार्ष्णेयभारतीय कृषि लंबे समय से बढ़ती लागत और घटती आमदनी की चुनौती व पुरानी रुढि़वादी तकनीक से जूझ रही है। डीजल, बिजली, बीज, कीटनाशक और उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि ने किसानों के सामने आर्थिक संकट को और गहरा किया है। खेती की लागत में उर्वरकों की हिस्सेदारी भी काफी महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से यूरिया की उपलब्धता और उसकी कीमत किसानों के लिए हमेशा एक बड़ा मुद्दा रही है। ऐसे में सरकार द्वारा ग्रीन अमोनिया के इस्तेमाल की संभावनाएं तलाशना एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा सकती है। यदि यह प्रयोग सफल होता है तो आने वाले समय में किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने की दिशा में बड़ा बदलाव संभव है। हालांकि, इस पहल की वास्तविक सफलता केवल तकनीकी प्रयोग तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसका लाभ खेतों में काम करने वाले किसानों तक पहुंचना भी जरूरी है।किेसानों के लिए खुश खबरी आई है कि सरकार छह राज्यों में लगभग 1...
न्यायपालिका की गरिमा व अनुशासन की लक्ष्मण रेखा

न्यायपालिका की गरिमा व अनुशासन की लक्ष्मण रेखा

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By: of The-Lakshman-Rekha-line न्यायपालिका की गरिमा व अनुशासन की लक्ष्मण रेखा डाॅ. अरविंद नाथ तिवारी न्यायपालिका पर न्याय, निष्पक्षता और संवैधानिक अधिकारों के प्रति आम नागरिक का विश्वास टिका होता है। न्यायालय के भीतर अनुशासन, पद की मर्यादा और परस्पर सम्मान का विशेष महत्व है लेकिन जब न्यायालय की कार्यवाही के दौरान किसी घटना को लेकर न्यायाधीश और अधिवक्ता के आचरण पर सवाल उठने लगता है तो यह केवल संबंधित व्यक्तियों तक सीमित विषय नहीं रह जाता बल्कि न्यायिक व्यवस्था की कार्य संस्कृति और संस्थागत गरिमा पर व्यापक बहस का कारण बन जाता है। हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्याय कक्ष संख्या-49 में न्यायमूर्ति अजय भनोट से संबंधित एक घटनाक्रम को लेकर अधिवक्ताओं के बीच असंतोष की चर्चा सामने आई है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, न्यायालय में एक जनपद के पुलिस अधीक्षक के प्रथम पंक्ति में बैठने और एक अधिवक...
भारत के संदर्भ में यूरोप की हिंसा भिन्न प्रणाली से समझनी होगी

भारत के संदर्भ में यूरोप की हिंसा भिन्न प्रणाली से समझनी होगी

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By: INDIA ARTICLE-EUROPE-VIOLENCE भारत के संदर्भ में यूरोप की हिंसा भिन्न प्रणाली से समझनी होगी योगेश कुमार सोनी लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन जनता की आवाज बुलंद करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। जब सरकारें जनभावनाओं को अनसुना करती हैं, नीतियों को लेकर असंतोष बढ़ता है या लोगों को लगता है कि उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा, तब सड़कों पर उतर कर विरोध करना स्वाभाविक है। लेकिन जब यही विरोध हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़ और पुलिस से टकराव का रूप ले लेता है तो सवाल केवल प्रदर्शनकारियों के उद्देश्य का नहीं रह जाता बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था, सामाजिक स्थिरता और कानून के शासन का भी बन जाता है। यूरोप के विभिन्न देशों में समय-समय पर हुए हिंसक प्रदर्शनों से भारत को भी कई महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं। हालांकि यूरोप एक समान राजनीतिक या सामाजिक इकाई नहीं है। फ्रांस में पेंशन सुधारों के विरोध, किसानों के आंदोलन, ब...
करवा चौथः पति-पत्नी के पवित्र रिश्तों का पर्व

करवा चौथः पति-पत्नी के पवित्र रिश्तों का पर्व

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By: cel Karva-Chauth-festival करवा चौथः पति-पत्नी के पवित्र रिश्तों का पर्व रमेश सर्राफ धमोरा भारत एक धर्म प्रधान देश है। यहां साल के सभी दिनों का महत्व है तथा साल का हर दिन पवित्र माना जाता है। करवा चौथ हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार है। यह राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पंजाब का पर्व है। यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले करीब 4 बजे के बाद शुरू होकर रात में चन्द्रमा दर्शन के बाद सम्पूर्ण होता है। ग्रामीण स्त्रियों से लेकर आधुनिक महिलायें करवा चौथ का व्रत बड़ी श्रद्धा एवं उत्साह के साथ रखती हैं। यह व्रत लगातार 12 अथवा 16 वर्ष तक हर वर्ष किया जाता है। अवधि पूरी होने के पश्चात इस व्रत का उद्यापन किया जाता है। जो सुहागिन स्त्रियां आजीवन रखना चाहें वे जीवनभर इस व्रत को कर सकती हैं। करवा चौथ का व्रत हर साल महिलाओं द्वारा अपने पतियों...
स्त्री की स्वतंत्रता पर बढ़ता बाजार और बदल रही सौंदर्य दृष्टि

स्त्री की स्वतंत्रता पर बढ़ता बाजार और बदल रही सौंदर्य दृष्टि

लाइफस्टाइल, लेख
-डा. अरविंद नाथ तिवारीआज की स्त्री स्वयं को पुरुषवादी व्यवस्था की बेड़ियों से मुक्त करने के लिए संघर्षरत है। वह अपने अधिकार, स्वतंत्र निर्णय और समानताओं के लिए आवाज उठा रही है। यह संघर्ष निःस्संदेह समय की आवश्यकता है क्योंकि सदियों से चली आ रही सामाजिक रूढ़ियों ने स्त्री की स्वतंत्रता को सीमित करने का प्रयास किया है लेकिन इस संघर्ष के बीच एक गंभीर प्रश्न भी खड़ा होता है कि क्या स्वतंत्रता की तलाश में स्त्री अनजाने उसी बाजारवादी व्यवस्था के हाथों का खिलौना बनती जा रही है, जिसका वह विरोध करना चाहती है? क्या आधुनिकता के नाम पर उसकी पसंद, पहनावा और सौंदर्यबोध को बाजार की शक्तियां नियंत्रित कर रही हैं? यह प्रश्न स्त्री की स्वतंत्रता का विरोध नहीं बल्कि स्वतंत्रता के वास्तविक स्वरूप को समझने का प्रयास है। वर्तमान समय में पहनावों को लेकर समाज में तेजी से बदलाव आया है। वस्त्रों की शैली, उनकी बन...
विकास की कीमत बनता प्रदूषण

विकास की कीमत बनता प्रदूषण

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By: Pollution Development-Cost विकास की कीमत बनता प्रदूषण कुलभूषण उपमन्यु वर्तमान सभ्यता मूलतः औद्योगिक सभ्यता है। दैनिक जरूरतों के सामान से लेकर सब तरह के ऊर्जा, सुरक्षा, परिवहन, स्वास्थ्य, शिक्षा, निर्माण आदि से संबंधित सामान और उपकरण बड़े पैमाने पर उद्योगों में ही बनाना संभव है। इसलिए दुनिया भर में उद्योगों की स्थापना की होड़ लगी रहती है। अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाएं औद्योगीकरण पर ही टिकी हुई हैं, इसलिए कोई भी उद्योगों से पैदा होने वाली पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय समस्याओं पर बोलना नहीं चाहता, लेकिन हर सहनशीलता की भी एक सीमा है। उद्योग एक ओर रोजगार देकर आम आदमी को राहत देते हैं तो दूसरी ओर हवा, पानी, मिट्टी को प्रदूषित करके जीवन यापन की स्थितियों को बीमारियों के भंवर में फंसा देते हैं। पर्यावरण को पहुंचने वाले नुकसान के आधार पर उद्योगों को शून्य से 100 के स्केल से मापा जाता है। 60 सू...