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लखपति दीदी पहल से मध्यप्रदेश में महिलाओं को मिली आर्थिक सशक्तिकरण की नई दिशा

लखपति दीदी पहल से मध्यप्रदेश में महिलाओं को मिली आर्थिक सशक्तिकरण की नई दिशा

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नारी शक्ति वंदन भोपाल ! मध्यप्रदेश में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से संचालित “लखपति दीदी” पहल उल्लेखनीय परिणाम दे रही है। इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम का लक्ष्य स्व-सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाते हुए उनकी वार्षिक आय कम से कम 1 लाख रुपये तक पहुंचाना है। राज्य सरकार ने आगामी दो वर्षों में 16.41 लाख परिवारों को “लखपति दीदी” बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। वर्तमान में 12.49 लाख महिलाएं इस श्रेणी में पहुंच चुकी हैं, जो इस योजना की सफलता को दर्शाता है। इस पहल के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए 526 मास्टर ट्रेनर और 20 हजार 517 लखपति सीआरपी (कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन) को प्रशिक्षित किया गया है। प्रशिक्षित कर्मी महिलाओं को विभिन्न आजीविका गतिविधियों में प्रशिक्षण देने के साथ उनकी आय-व्यय योजना तैयार करने और वित्तीय एवं तकनीकी सहयोग प्रदान...
डॉ. भीमराव आंबेडकर: बहुआयामी व्यक्तित्व का समग्र परिप्रेक्ष्य

डॉ. भीमराव आंबेडकर: बहुआयामी व्यक्तित्व का समग्र परिप्रेक्ष्य

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-डॉ. सदानंद दामोदर सप्रे भारतीय इतिहास में कुछ महान व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनकी छवि समाज के सामने सीमित रूप में प्रस्तुत होती है, जबकि उनका वास्तविक योगदान उससे कहीं अधिक व्यापक और बहुआयामी होता है। डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर भी ऐसे ही एक महान पुरुष हैं। सामान्यतः उन्हें केवल “संविधान निर्माता” या “दलितों के उद्धारक” के रूप में जाना जाता है, किन्तु यह उनके विराट व्यक्तित्व का केवल एक अंश है। उनके जीवन और कार्यों का गहराई से अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि वे एक अद्वितीय विद्वान, प्रखर अर्थशास्त्री, दूरदर्शी चिंतक, समर्पित शिक्षाविद, सिद्धांतनिष्ठ पत्रकार, श्रमिकों के हितैषी तथा सच्चे राष्ट्रनेता थे। डॉ. आंबेडकर का प्रारंभिक जीवन अत्यंत कठिन परिस्थितियों में बीता। आर्थिक अभाव और सामाजिक भेदभाव के बीच उन्होंने जिस दृढ़ता और लगन से उच्च शिक्षा प्राप्त की, वह अद्भुत है। अमेरिका के क...
उपेक्षित आबादी बनाम वैश्विक एजेंडा: असली मुद्दे क्यों ओझल हो रहे हैं?

उपेक्षित आबादी बनाम वैश्विक एजेंडा: असली मुद्दे क्यों ओझल हो रहे हैं?

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-कैलाश चन्द्र भारत का सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य जितना विशाल है, उतना ही जटिल भी है। इस जटिलता के बीच आज हमारे सामने दो वास्तविकताएँ खड़ी हैं। पहली, भारत के ग्यारह करोड़ से अधिक घुमन्तु, अर्धघुमन्तु और डिनोटिफाइड जनजाति समुदाय जिन्हें डीएनटी, एनटी और एसएनटी के रूप में भी जाना जाता है, जोकि आज भी पहचान, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और मानवाधिकारों की बुनियादी लड़ाई लड़ रहे हैं। दूसरी ओर एलजीबीटीक्यू प्लस समुदाय का मुद्दा है, जिसकी जनसंख्या लगभग पाँच से छह लाख मानी जाती है, किन्तु राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विमर्श में उसकी उपस्थिति अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत की जा रही है। एक ओर इतनी विशाल आबादी है जो अदृश्य बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर एक छोटा समुदाय वैश्विक एजेंडों और वित्तीय तंत्रों के माध्यम से राष्ट्रीय बहस को प्रभावित कर रहा है। इस विरोधाभास ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा किया है कि क्या ह...
भारतीयता में समाहित है वैश्विक कल्याण का मार्ग

भारतीयता में समाहित है वैश्विक कल्याण का मार्ग

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- प्रो. एस. के. सिंह वर्तमान में अविश्वास की परतों से घिरी हुई विश्व व्यवस्था अनेक प्रकार के संघर्षों एवं अस्थिरताओं से जूझ रही है। ईरान बनाम अमेरिका-इजराइल युद्ध, अमेरिका द्वारा वेनेजुएला में की गई असंगत कार्यवाही, लंबे समय से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध, पर्यावरण संकट, मानसिक तनाव एवं बढ़ती असहिष्णुता इस बात का प्रमाण है कि आज विश्व गहरे संकट से गुजर रहा है। वस्‍तुत: पिछले कुछ समय की सैन्य गतिविधियों को देखकर तो ऐसा लग रहा है कि विश्व-व्यवस्था पूरी तरह से लड़खड़ा गई है एवं धीरे-धीरे दुनिया ‘जंगलराज’ की ओर बढ़ रही है। टैरिफ को लेकर ट्रंप के अपरिपक्व एवं गैर-जिम्मेदार रवैये तथा पल-पल बदलते उनके बचकाने बयानों ने भूमंडलीकरण के मूल उद्देश्यों पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। जिस भूमंडलीकरण को परस्पर निर्भरता, वैश्विक सहयोग एवं साझा प्रगति का आधार माना गया था, आज वह कमजोर पड़ता हुआ दि...
डीएनटी, एनटी, एसएनटी समुदाय है अदृश्य भारत की पहचान और उम्मीदों का नया द्वार

डीएनटी, एनटी, एसएनटी समुदाय है अदृश्य भारत की पहचान और उम्मीदों का नया द्वार

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-कैलाश चन्द्र भारत की स्वाधीनता को 77 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी अपनी स्वतंत्र पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है—ये हैं डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदाय, जिन्हें हम डीएनटी, एनटी, एसएनटी समुदाय के नाम से जानते हैं। अनुमान लगाया जाता है कि इनकी जनसंख्या आठ से ग्‍यारह करोड़ के बीच है, पर विडंबना यह है कि भारत की किसी भी राष्ट्रीय जनगणना ने इन्हें कभी अलग श्रेणी में नहीं गिना। इसी कारण 2027 की प्रस्तावित जनगणना को लेकर इन समुदायों में नई आशा जन्मी है, क्योंकि पहली बार उनकी पहचान साफ़-साफ़ दर्ज होने की संभावना बन रही है। इन समुदायों की पीड़ा इतिहास की धूल में दबी पड़ी है। 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट ने लगभग 150–200 समुदायों को “जन्मजात अपराधी” घोषित कर दिया था। 1952 में यह कानून भले ही खत्म हुआ, लेकिन समाज की नज़रों में अपराधीकरण का दाग अब तक नहीं...
प्राकृतिक संसाधन: सृष्टि की साझा धरोहर, मानवता का नैतिक न्यास दायित्व

प्राकृतिक संसाधन: सृष्टि की साझा धरोहर, मानवता का नैतिक न्यास दायित्व

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कैलाश चन्द्र पृथ्वी पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन जल, वायु, वन, खनिज, मिट्टी, जीव–जंतु और ऊर्जा स्रोत मानवता की निजी संपत्ति न होकर संपूर्ण सृष्टि की साझा धरोहर हैं। यह विचार केवल नैतिक आग्रह नहीं है, बल्कि पृथ्वी के भूगर्भीय इतिहास, जैविक विकास और आधुनिक वैज्ञानिक समझ का गहन निष्कर्ष है। विज्ञान स्पष्ट करता है कि जिन ऊर्जा स्रोतों पर आधुनिक सभ्यता आधारित है, वे मानव जीवन की समय-सीमा में पुनः निर्मित नहीं हो सकते। पेट्रोलियम को बनने में पांच से 30 करोड़ वर्ष, कोयले को तीन से 40 करोड़ वर्ष और प्राकृतिक गैस को करोड़ों वर्षों का समय लगता है। पृथ्वी की विशाल प्रयोगशाला ने जिन्हें युगों में निर्मित किया, उन्हें मनुष्य यदि कुछ वर्षों के युद्ध, संघर्ष या लालच में नष्ट कर दे, तो यह न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से मूर्खता है बल्कि नैतिक रूप से भी गंभीर अन्याय है। भारतीय चिंतन इस सत्य को प्राचीन क...
नवरात्रि पर्व पर साधना से मिलता है अभीष्ट फल 

नवरात्रि पर्व पर साधना से मिलता है अभीष्ट फल 

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- श्रीराम माहेश्वरी  भारतीय संस्कृति में नवरात्रि पर्व का विशेष महत्व है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक यह पर्व मनाया जाता है । एक संवत्सर में चार नवरात्र होते हैं। आश्विन का नवरात्र शारदीय नवरात्र तथा चैत्र का नवरात्र वासंतिक नवरात्र कहा जाता है । दो गुप्त नवरात्रि होती है । इस पर्व में मां दुर्गा की आराधना करने का विधान है।  आध्यात्मिक दृष्टि से शक्ति का स्वरूप विशेष दिव्य और उदात्त है। शक्ति ही सृष्टि का सृजन करती है। मां जगत जननी ही सृष्टि का आदि कारण है। यह शक्ति ही पराशक्ति है । इसके अनेक स्वरूप हैं। मां दुर्गा, काली, गायत्री, तारा, भुवनेश्वरी, बगला, षोडशी, धूमावती, त्रिपुरा, कमला, मातंगी तथा पद्मावती इन्हीं के रूप हैं। नवरात्रि के इन दिनों में श्री महालक्ष्मी, श्री मां सरस्वती, महिषासुरमर्दिनी, मां शैलपुत्री, मां ब्रह्मचारिणी, मां चंद्रघंटा, मां कुष्मांडा, मां स्कंदमाता...
अभाव से अवसर तक: नीति, नियोजन और विकास का भारतीय अनुभव

अभाव से अवसर तक: नीति, नियोजन और विकास का भारतीय अनुभव

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-कैलाश चन्द्र इतिहास बीते समय की घटनाओं का संग्रह नहीं होता, वह वर्तमान को समझने और भविष्य की दिशा तय करने का सबसे विश्वसनीय साधन होता है। जब हम भारत के आर्थिक इतिहास को देखते हैं, विशेषकर 1950 से 1991 तक के दौर को, जिसे आमतौर पर “लाइसेंस-परमिट राज” कहा जाता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह एक आर्थिक नीति से अधिक एक ऐसी व्यवस्था थी जिसने देश के आम नागरिक के जीवन, उद्योगों की गति और विकास की दिशा, तीनों को गहराई से प्रभावित किया। स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने गरीबी, संसाधनों की कमी, औद्योगिक पिछड़ापन और असमानता जैसी गंभीर चुनौतियाँ थीं। ऐसे समय में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में एक नियंत्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया, जिसका उद्देश्य सीमित संसाधनों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना था। उस समय सोवियत संघ का नियोजित आर्थिक मॉडल प्रभावी माना जा रहा था, इसलिए भारत ने भी उत्पादन, वितरण औ...
भारत में बाल मृत्यु दर में गिरावट यानी बालकों के हित सही दिशा में जा रहा देश

भारत में बाल मृत्यु दर में गिरावट यानी बालकों के हित सही दिशा में जा रहा देश

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डॉ. निवेदिता शर्मा संयुक्त राष्ट्र ने बाल मृत्यु दर में गिरावट को लेकर भारत की जमकर सराहना की है। दरअसल, हाल ही में संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट ने भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की उपलब्धियों को वैश्विक मंच पर उजागर किया है। यूएनआईजीएमई की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने बाल मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाकर दुनिया को एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है। इस उपलब्धि पर प्रतिक्रिया देते हुए नरेंद्र मोदी ने भी इसे देश की सामूहिक सफलता बताया और स्वास्थ्य क्षेत्र में किए गए सतत प्रयासों की सराहना की है। आंकड़ों में झलकती ऐतिहासिक सफलता रिपोर्ट के अनुसार, 1990 में जहां नवजात शिशु मृत्यु दर 57 प्रति हजार जीवित जन्म थी, वह 2024 में घटकर 17 रह गई है, जो लगभग 70 प्रतिशत की कमी को दर्शाती है। इसी प्रकार पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 127 से घटकर 27 प्र...
होलिका दहन पर वामपंथी कलुष

होलिका दहन पर वामपंथी कलुष

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कैलाश चन्द्र भारत की सांस्कृतिक स्मृति पर जितने हमले बाहरी आक्रांताओं ने नहीं किए, उससे कहीं अधिक गहरे और कहीं अधिक धूर्त हमले आज के वैचारिक उपनिवेशवादियों ने किए हैं। यह हमला तलवारों का नहीं, शब्दों का है। यह आक्रमण सीमाओं का नहीं, स्मृति का है। वस्‍तुत: आज जो लोग होली, होलिका दहन और प्रह्लाद की कथा को “ब्राह्मणवाद द्वारा एक दलित नारी को जलाए जाने” की घटना बताकर प्रस्तुत करते हैं, वे न परंपरा जानते हैं और न कथा समझते हैं। वे सिर्फ भारत की सांस्कृतिक संचेतना को उसकी अपनी कहानी से काट देना चाहते हैं। होलिका की वास्तविक कथा होलिका की कथा जितनी सरल है, उतनी ही गहन भी। कश्यप ऋषि और दिति की पुत्री तथा दिति की संतानों को स्वभाव वैचित्र्य के कारण दैत्य कहा गया है। सम्पूर्ण कथा श्रीमद्भागवत पुराण में बहुत विस्तार से कही गई है। भारतवर्ष में होने वाली अधिकांश भागवत कथाओं में भागवताचार्य...