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वैश्विक तनावों के बीच भारत की आर्थिक दृढ़ता

वैश्विक तनावों के बीच भारत की आर्थिक दृढ़ता

लेख
- डॉ. मयंक चतुर्वेदी पश्चिम एशिया में जारी तनाव, वैश्विक व्यापार में सुस्ती और विकसित अर्थव्यवस्थाओं की कमजोर पड़ती मांग के बीच यदि कोई देश अपेक्षाकृत आत्मविश्वास के साथ आज आगे बढ़ता दिखाई देता है, तो वह भारत है। वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत में सामने आए जीएसटी संग्रह, विनिर्माण गतिविधियों और सेवा क्षेत्र के आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत स्थिति को दर्शा रहे हैं। वस्तुत: मई 2026 में सकल जीएसटी संग्रह लगभग 1.94 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंचना इस बात का संकेत है कि आर्थिक गतिविधियों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। यद्यपि शीर्ष स्तर पर यह वृद्धि केवल 3.2 प्रतिशत दिखाई देती है, किंतु रिफंड समायोजन के बाद वास्तविक राजस्व वृद्धि लगभग 9 से 10 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। यह बताता है कि अर्थव्यवस्था में उपभोग और कारोबारी गतिविधियों का आधार अपेक्षाकृत मजबूत बना हुआ है। वित्त वर्ष के श...
न्यायालय के आलोक में बेटी का अधिकार!

न्यायालय के आलोक में बेटी का अधिकार!

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-डॉ. निवेदिता शर्मा भारतीय न्यायपालिका ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि न्याय हमेशा ही समाज की बदलती वास्तविकताओं को स्वीकार करते हुए समानता, गरिमा और मानवीय अधिकारों की रक्षा का सशक्त माध्यम है। उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया हालिया निर्णय, जिसमें विवाहित बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति एवं आश्रित कोटे के लाभों से बाहर रखने को असंवैधानिक ठहराया गया है, भारतीय न्यायिक इतिहास में महिला अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय कहलाएगा । वास्‍तव में यह निर्णय उस सोच को भी चुनौती देता है जो विवाह के बाद बेटी को उसके माता-पिता के परिवार से अलग मान लेने की प्रवृत्ति रखती है। कई बार माता-पिता के लिए भी और कई बार परिवार के भाई एवं अन्‍य कुटुम्‍बजनों के लिए। माननीय न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने स्पष्ट कहा कि विवाहित पुत्री को “परिवार”...
“बच्चों को सिर्फ पढ़ाइए मत… उन्हें समझिए और समझाएं भी”

“बच्चों को सिर्फ पढ़ाइए मत… उन्हें समझिए और समझाएं भी”

लेख
-डॉ. निवेदिता शर्मा भोपाल की 17 वर्षीय ओजस्वी ने जब ये शब्द “सॉरी मम्मी-पापा… मैं अच्छी बेटी नहीं बन सकी…” लिखे होंगे, तब शायद उसकी आंखों में आंसू रहे होंगे, मन में डर रहा होगा और दिल में एक ऐसा भाव, जिसे वह किसी से कह नहीं पाई! सोचिए… एक बच्ची, जो अपने माता-पिता की दुनिया थी, जिसने बचपन से उनके स्नेह में पलकर सपने देखे, आखिर उसके मन में ऐसा कौन-सा तूफान उठा होगा कि उसे जीवन छोड़ देना आसान लगा? यह घटना सिर्फ भोपाल की नहीं है। यह हर उस घर की कहानी है जहां बच्चे मुस्कुराते तो हैं, किंतु भीतर से टूट रहे होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कई बच्चों की चुप्पी दिखाई नहीं देती। आज जरूरत इस बात की है कि हम उनसे यह पूछें- “तुम ठीक तो हो ना?” सच कहा जाए तो बच्चे कमजोर नहीं होते, बस अकेले पड़ जाते हैं, अक्सर हम बड़े लोग सोचते हैं कि बच्चों की जिंदगी में आखिर तनाव ही क्या है? ना कमाने की चिंता, ...
प्रखर राष्ट्रवाद में ओझल सावरकर का भाषाई योगदान

प्रखर राष्ट्रवाद में ओझल सावरकर का भाषाई योगदान

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-प्रो. एस.के.सिंह दुनिया में ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे जहां पर किसी व्यक्ति का जब एक विशेष पक्ष लोकप्रियता के शिखर पर होता है तो उसकी छाया में व्यक्ति की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषतायें ओझल हो जाती हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर की पहचान वैश्विक स्तर पर एक महान दार्शनिक एवं शिक्षाविद् के रूप में है, किंतु इन उपलब्धियों की छाया में उनकी एक दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता पेंटिंग (चित्रकला) की प्रतिभा दबकर रह गई एवं उसकी पर्याप्त चर्चा नहीं हो पायी। वस्‍तुत: इसी तरह प्रखर क्रांतिकारी रणनीतिकार एवं कालापानी की कठोर यातनायें सहने वाले स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) की क्रांतिकारी छवि एवं उनके व्यापक संघर्षों की छाया में उनका महत्वपूर्ण ‘भाषाशुद्धि आन्दोलन’ जन-मानस में उतनी ख्याति नहीं पा सका, जिसका कि वह आन्दोलन हकदार था। उन्होंने देवनागरी लिपि को आधुनिक ...
नक्सलवाद की ढहती दीवारें और मध्य प्रदेश की रणनीतिक जीत

नक्सलवाद की ढहती दीवारें और मध्य प्रदेश की रणनीतिक जीत

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कृष्णमोहन झा भारत में नक्सलवाद लंबे समय तक आंतरिक सुरक्षा के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रहा है। जंगलों और सीमावर्ती क्षेत्रों में फैला यह लाल आतंक केवल हिंसा तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने विकास, लोकतंत्र और जनविश्वास को भी प्रभावित किया। मध्य प्रदेश का बालाघाट क्षेत्र भी वर्षों तक इस चुनौती से जूझता रहा। लेकिन अब परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। मध्य प्रदेश ने नक्सलवाद के खिलाफ जिस प्रभावी रणनीति और दृढ़ संकल्प के साथ अभियान चलाया है, वह आज पूरे देश के लिए एक मॉडल बनता दिखाई दे रहा है।इस परिवर्तन के पीछे मुख्यमंत्री मोहन यादव का स्पष्ट नेतृत्व और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर उनकी गंभीर सोच महत्वपूर्ण रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने लगातार यह संदेश दिया कि प्रदेश में विकास और सुरक्षा साथ-साथ चलेंगे तथा नक्सलवाद जैसी चुनौती को किसी भी स्थिति में बढ़ने नहीं दिया जाएगा। उनके मार्ग...
विश्व अशांति के दौर में भारत की संयमित आवाज

विश्व अशांति के दौर में भारत की संयमित आवाज

लेख
डॉ राघवेंद्र शर्मा हमें कब, कहां, क्या, बोलना चाहिए या नहीं बोलना चाहिए, या फिर हमें कब, कहां, क्या, करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, यह सावधानी बड़े मायने रखती है। क्योंकि हमारे विद्वान कह गए हैं - बिना बिचारे जो करे सो पांछे से पछताय। काम बिगाड़े आपनो, जग में होत हंसाय।। अर्थात बिना विचार किये जो भी व्यक्ति कुछ कहता या करता है, वह खुद का काम तो बिगाड़ता ही है, साथ में हंसी का पात्र भी बनता है। आज यही हालत खुद को दुनिया का ठेकेदार मानने वाले देशों और वहां के कतिपय नेताओं की हो गई है।अमेरिका ने ईरान पर हमला क्यों बोला ? सब जानते हैं। इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की दुश्मनी डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ऊपर क्यों ली? यह भी सबको पता है। रूस यूक्रेन लंबे समय से क्यों एक दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं, यह भी किसी से छुपा नहीं है। रह जाती है खाड़ी देशों की बात, तो वहां से भी अच्छे समाचार नह...
ग्रेट निकोबार : क्‍या राष्ट्रहित से ऊपर है कांग्रेस की राजनीति?

ग्रेट निकोबार : क्‍या राष्ट्रहित से ऊपर है कांग्रेस की राजनीति?

लेख, विशेष समाचार
डॉ. मयंक चतुर्वेदी आज जब भारत विश्व मंच पर एक उभरती हुई महाशक्ति के रूप में अपनी पहचान बना रहा है, तब देश को मजबूत सामरिक ढांचा, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक व्यापारिक क्षमता की भी आवश्यकता है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच भारत को अपने समुद्री हितों और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करना समय की मांग है। ऐसे समय में ग्रेट निकोबार परियोजना भारत के सामरिक, आर्थिक और वैश्विक भविष्य की आधारशिला है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस इस परियोजना का लगातार विरोध कर रही है। वस्‍तुत: कभी पर्यावरण के नाम पर, कभी आदिवासी हितों के नाम पर और अब राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर प्रश्न उठाकर कांग्रेस एक ऐसे प्रोजेक्ट को रोकने की कोशिश कर रही है, जोकि भविष्‍य में भारत को समुद्री शक्ति, व्यापारिक आत्मनिर्भरता और सामरिक मजबूती प्रदान करने का कारण बनेगा। सवाल यह है कि क्...
(पुण्‍य स्‍मरण) सेवा, साधना और संवेदना के पर्याय अनिल माधव दवे

(पुण्‍य स्‍मरण) सेवा, साधना और संवेदना के पर्याय अनिल माधव दवे

लेख, विशेष समाचार
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारतीय संस्कृति में प्रकृति को चेतना माना गया है। नदियाँ यहां मां हैं, वृक्ष देवता हैं और जल जीवन का आधार। आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में जब पर्यावरण संकट वैश्विक चिंता बनता जा रहा है, तब कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी हुए जिन्होंने भारतीय जीवनदृष्टि को आधुनिक पर्यावरणीय चिंताओं से जोड़ने का प्रयास किया। श्रद्धेय अनिल माधव दवे उन्हीं विरले व्यक्तित्वों में से एक थे। उनके लिए पर्यावरण साधना, सेवा और संस्कार का हिस्सा रहा। नर्मदा के तटों से लेकर संयुक्त राष्ट्र की जलवायु वार्ताओं तक, उन्होंने भारतीय चिंतन को मजबूती से रखा। नर्मदा से जुड़ा आत्मिक रिश्ता अनिल माधव दवे का नाम लेते ही सबसे पहले नर्मदा का स्मरण होता है। मध्य प्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली नर्मदा नदी उनके हृदय के अत्यंत निकट थी। उन्होंने नर्मदा को केवल नदी नहीं, बल्कि संस्कृति और सभ्यता की धारा माना।उनके ग...
पीएम मोदी की अपील पर राहुल-अखिलेश की नकारात्‍मक राजनीति !

पीएम मोदी की अपील पर राहुल-अखिलेश की नकारात्‍मक राजनीति !

लेख, विशेष समाचार
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडराते खतरे ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा कर रखी है। भारत जैसा देश, जोकि विश्‍व की विशाल जनसंख्‍या का प्रतिनिधित्‍व करता है, स्‍वभाविक है कि अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, स्वाभाविक रूप से इस संकट से प्रभावित है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ईंधन बचाने, अनावश्यक सोना खरीदने से बचने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने की अपील की है तो इसमें अनुचित क्‍या है? यह अपील न तो किसी भय का संकेत थी और न ही किसी आपातकाल की घोषणा, बल्कि आर्थिक अनुशासन और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का संदेश है, किंतु कांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे सरकार की विफलता बताकर राजनीतिक हमला शुरू कर दिया है। सवाल यह है कि क्या हर राष्ट्रीय चुनौती को राजनीति के चश्मे से ...
आत्मनिर्भर भारत : देश को सशक्‍त बनाने के लिए पीएम मोदी के पंद्रह सूत्र

आत्मनिर्भर भारत : देश को सशक्‍त बनाने के लिए पीएम मोदी के पंद्रह सूत्र

लेख, विशेष समाचार
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारत आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहां वह वैश्विक नेतृत्व की क्षमता रखने वाली शक्ति के रूप में उभर रहा है। ऊर्जा संकट, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, विदेशी निर्भरता और खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दे आज पूरी दुनिया के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं। भारत भी इनसे बाहर नहीं है, ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए पंद्रह सूत्र भारत को आत्मनिर्भर, आर्थिक रूप से मज़बूत, पर्यावरणीय रूप से संतुलित और रणनीतिक रूप से शक्तिशाली बनाने का राष्ट्रीय संकल्प है। प्रधानमंत्री मोदी ने कई अवसरों पर कहा है कि “21वीं सदी भारत की सदी होगी”, किंतु बड़ा प्रश्‍न यही है कि यह संभव कैसे होगा?  वस्‍तुत: यह तभी संभव है- जब भारत ऊर्जा, कृषि, उपभोग, परिवहन और जीवनशैली के स्तर पर आत्मनिर्भरता की ओर निर्णायक कदम बढ़ाए, इसलिए पीएम मोदी के आज के समय में दिए गए इन पंद्रह सूत्रों म...