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अमेरिका में एकबार फिर हिंदुत्व का जयघोष

अमेरिका में एकबार फिर हिंदुत्व का जयघोष

लेख, विशेष समाचार
डॉ. मयंक चतुर्वेदी न्यूयॉर्क में 29 अगस्त को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का संबोधन भारतीय चिंतन की उस व्यापक दृष्टि को सामने लाता है, जिसमें विविधता के बीच मानवता की एकता को आधार माना गया है। ‘वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी’ अंतरधार्मिक संवाद में भागवत ने धर्म, हिंदुत्व, सामाजिक समरसता, सेवा, राजनीति और वैश्विक शांति जैसे विषयों पर अपने विचार रखे। उनके संबोधन की खास बात यह रही कि उन्होंने हिंदुत्व को किसी समुदाय के विरोध अथवा बहिष्कार के विचार से अलग करते हुए मानव गरिमा और सभी पंथों के सम्मान से जोड़ने का प्रयास किया। विविधता में एकता का भारतीय विचार भागवत ने कहा कि दुनिया में धर्म और संस्कृतियां अनेक हैं। उनकी पूजा पद्धतियां, मान्यताएं और कर्मकांड अलग हो सकते हैं, मगर मनुष्य की मूल पहचान एक है। उन्होंने विविधता को समाप्त करने के बजाय उसे स्वीकार करने, उसका सम्म...
विकसित भारत के लिए सिविल सेवा परीक्षा में चाहिए नया प्रतिमान

विकसित भारत के लिए सिविल सेवा परीक्षा में चाहिए नया प्रतिमान

लेख
-अभिषेक शुक्ल भारतीय सिविल सेवा परीक्षा की वर्तमान संरचना में औपनिवेशिक प्रशासनिक व्यवस्था की ऐतिहासिक छाप दिखाई देती है। व्यापक सामान्य ज्ञान, अत्यधिक विस्तृत पाठ्यक्रम, स्मृति-आधारित तैयारी और वर्णनात्मक उत्तर लेखन पर निर्भरता इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं। यह व्यवस्था उस समय की प्रशासनिक आवश्यकताओं के लिए उपयोगी रही होगी लेकिन आज की जटिल और तकनीक प्रधान शासन व्यवस्था में इसके पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता स्पष्ट है। भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। इस परिवर्तन की सफलता केवल आर्थिक विकास, आधुनिक आधारभूत संरचना और तकनीकी प्रगति पर निर्भर नहीं होगी। शासन की गुणवत्ता, प्रशासनिक संस्थाओं की क्षमता एवं योग्य मानव संसाधन का चयन भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। इस दृष्टि से भारतीय सिविल सेवा परीक्षा की वर्तमान संरचना पर गंभीर और व्यापक पुनर्विचार आवश्यक है। भारतीय प्रशा...
रक्षाबंधन : एक राखी, अनेक संकल्प

रक्षाबंधन : एक राखी, अनेक संकल्प

लेख, विशेष समाचार
डॉ. वंदना सेन “येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥” जिस रक्षा सूत्र से महाबली राजा बलि को बाँधा गया था, उसी रक्षा-सूत्र से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षासूत्र! तुम अडिग रहना, अपने संकल्प से कभी विचलित मत होना। रक्षाबंधन पर धागों पर बंधन एक संकल्प है। वह धागा राखी का नहीं, रिश्तों का होता है। बहन जब भाई की कलाई पर राखी बाँधती है तो वह केवल धागा नहीं बाँधती। वह अपने बचपन को बाँधती है, अपनी स्मृतियों को बाँधती है, अपने विश्वास को बाँधती है। उसकी आँखों में एक मौन प्रार्थना होती है- “भैया! जीवन चाहे जितना बदल जाए, हमारे रिश्ते का यह विश्वास कभी मत बदलना।” और भाई भी जब बहन की ओर देखता है तो उसके मन में एक संकल्प जन्म लेता है- “तुम्हारे जीवन में कोई कठिनाई आए तो मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।” यही रक्षाबंधन है। भारतीय संस्कृति की सुंदरता ...
मक्का रक्षा समझौता और भारतीय उपमहाद्वीप का बदलता भू-राजनीतिक चक्रव्यूह

मक्का रक्षा समझौता और भारतीय उपमहाद्वीप का बदलता भू-राजनीतिक चक्रव्यूह

लेख, विशेष समाचार
डॉ. मयंक चतुर्वेदी मक्का में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच सात अगस्त 2026 को हुआ ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौता’ भारतीय उपमहाद्वीप में ऐसे समय में सामने आया है जब मध्य-पूर्व में जारी संघर्षों ने पारंपरिक सुरक्षा समीकरणों को हिला दिया है। समझौते के तहत तीनों देशों ने सामूहिक प्रतिरोध को मजबूत करने और किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमले को तीनों पर हमला मानने की प्रतिबद्धता जताई है। भारत के लिए इस घटनाक्रम की गंभीरता तब और बढ़ जाती है, जब इसी समझौते के प्रति बांग्लादेश ने भी सकारात्मक रुख के संकेत दिए हैं। बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने कहा है कि ढाका सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये से जुड़े आर्थिक या रक्षा ढांचे में शामिल होने की संभावना के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखता है। ऐसे में मक्का समझौते को इस्लामिक मजहबी करण के उम्मा के तहत एकजुटता के चश्मे से भी देखा ...
अनुच्छेद 370 से 5 अगस्त 2019 तक: जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक यात्रा, राष्ट्र की सामूहिक आकांक्षाओं का जीवंत प्रतिबिंब

अनुच्छेद 370 से 5 अगस्त 2019 तक: जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक यात्रा, राष्ट्र की सामूहिक आकांक्षाओं का जीवंत प्रतिबिंब

लेख
कैलाश चन्द्र स्वतंत्रता के साथ ही भारत के अनेक जटिल प्रश्न राष्ट्र के समक्ष उपस्थित हुए। इनमें सबसे संवेदनशील और दीर्घकालिक प्रश्न जम्मू-कश्मीर का था। यह केवल किसी राज्य के भारत में विलय का विषय नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, संघीय व्यवस्था, लोकतांत्रिक मूल्यों, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और संवैधानिक विकास की ऐसी गाथा थी, जिसने स्वतंत्र भारत की राजनीति और संविधान को सात दशकों तक प्रभावित किया। 5–6 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को निष्प्रभावी करने तथा अनुच्छेद 35A के अप्रभावी होने के साथ इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हुआ और एक नया अध्याय प्रारम्भ हुआ। इस विषय को समझने के लिए केवल 2019 को देखना ही पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे 1947 से प्रारम्भ हुई घटनाओं, संविधान सभा की बहसों, राष्ट्रपति के आदेशों, संसद की भूमिका, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों और जम्मू-कश्मी...
सावन : आस्था, प्रकृति और शिव भक्ति का पावन संगम

सावन : आस्था, प्रकृति और शिव भक्ति का पावन संगम

लेख
उदय कुमार सिंह भारतीय सनातन संस्कृति में श्रावण मास, जिसे सामान्य रूप से सावन कहा जाता है, धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से वर्ष का सबसे पवित्र महीना माना जाता है। वर्षा ऋतु के मध्य आने वाला यह महीना केवल प्राकृतिक सौंदर्य और हरियाली का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि भक्ति, तप, संयम, लोकजीवन और सामाजिक समरसता का भी संदेश देता है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि सावन का प्रत्येक दिन भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष फलदायी होता है। यही कारण है कि पूरे महीने देशभर के शिवालयों में जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, कांवड़ यात्रा, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों की धूम रहती है। सावन को 'पावस ऋतु' का प्रमुख महीना भी कहा जाता है। इस दौरान वर्षा से धरती हरी-भरी हो जाती है, खेत-खलिहानों में नई जान आ जाती है और प्रकृति अपने सबसे सुंदर स्वरूप में दिखाई देती है। भारतीय संस्कृति में प्रकृति और अध्यात्...
सीजेपी प्रोटेस्ट और युवा : जेन जी को शिक्षा के साथ संस्कार आवश्यक

सीजेपी प्रोटेस्ट और युवा : जेन जी को शिक्षा के साथ संस्कार आवश्यक

लेख
- प्रो. मनीषा शर्मा सीजेपी आंदोलन खत्म हो गया, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी हो गया लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में मुझे सबसे ज्यादा चिंता हुई इस युवा पीढ़ी की जो वहाँ उपस्थित थी। उनके आचरण, व्यवहार और प्रयोग की जा रही भाषा सबने एक पालक और शिक्षक होने के नाते मुझे झकझोर कर रख दिया। क्या यह पीढ़ी हमारे देश का भविष्य है? उनकी शिक्षा के विषय में क्या ही बात की जाए। कोई आईएएस की तैयारी कर रहा है, कोई मेडिकल की, कई उच्च शिक्षित थे, कई विद्यार्थी प्रसिद्ध और नामी विवि के थे। मतलब हम इन्हें उच्च शिक्षित कह सकते हैं लेकिन जब सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो, रील, मीम्स देखते हैं तो दिमाग जवाब दे जाता है। क्या यह वाकई शिक्षित है? यदि हां तो हम कैसी शिक्षा व्यवस्था चला रहे जो इस पीढ़ी को यह तक ना सिखा पाई कि एक शिक्षित और सभ्य इंसान की भाषा का स्तर क्या होता है। हमारे यहां कहा जाता है...
सीजेपी का प्रदर्शन, क्या अपने मूल उद्देश्य से भटक गया ?

सीजेपी का प्रदर्शन, क्या अपने मूल उद्देश्य से भटक गया ?

लेख
डॉ. मयंक चतुर्वेदी देश में जब ‘नीट’ प्रश्नपत्र लीक का मामला सामने आया तो स्वाभाविक रूप से लाखों छात्रों और उनके अभिभावकों में गहरा आक्रोश उत्पन्न हुआ। यह उन युवाओं के भविष्य का प्रश्न था जिन्होंने वर्षों की मेहनत, आर्थिक संसाधन और मानसिक ऊर्जा इस परीक्षा की तैयारी में लगाई थी। ऐसे समय में छात्रों का शांतिपूर्ण आंदोलन लोकतंत्र की स्वाभाविक अभिव्यक्ति माना जा सकता है। वैसे भी किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में छात्रों को अपनी बात रखने, सरकार से जवाब मांगने और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग करने का पूरा अधिकार है, किन्तु दिल्ली में पिछले दिनों में जो घटा है, उसे देखने के बाद यह प्रश्न उठने लगा है कि क्या यह आंदोलन अभी भी छात्रों के भविष्य और शिक्षा सुधार को लेकर हो रहा है? जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन के अनेक दृश्य, वहां उठ रहे विभिन्न प्रकार के नारे, अलग-अलग राजनीतिक और वैचारिक संग...
भारतीय मजदूर संघ : 71 वर्षों की राष्ट्रनिष्ठ श्रमिक यात्रा, जिसने श्रम आंदोलन को दिया भारतीय दृष्टिकोण

भारतीय मजदूर संघ : 71 वर्षों की राष्ट्रनिष्ठ श्रमिक यात्रा, जिसने श्रम आंदोलन को दिया भारतीय दृष्टिकोण

लेख
डॉ. मयंक चतुर्वेदी 23 जुलाई 1955 को स्थापित भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) आज केवल देश का सबसे बड़ा श्रमिक संगठन होने के नाते भारतीय श्रम दर्शन का सबसे सशक्त प्रतिनिधि है। वस्‍तुत: जब विश्व का श्रमिक आंदोलन पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच संघर्ष की धुरी पर घूम रहा था, तब राष्ट्रऋषि दत्तोपंत ठेंगड़ी ने भारतीय मजदूर संघ की स्थापना करते हुए श्रम आंदोलन को एक तीसरा मार्ग दिया, जिसके लिए कहा गया, "राष्ट्रहित, उद्योगहित और मजदूरहित" का मार्ग। यही कारण है कि सात दशक बाद भी आज बीएमएस राष्ट्र निर्माण में श्रमिकों की रचनात्मक भागीदारी का एक सशक्त मंच बनकर खड़ा है। यहां ध्‍यान देने योग्‍य है कि भारतीय मजदूर संघ का जन्म ऐसे समय हुआ था, जब अधिकांश ट्रेड यूनियनें राजनीतिक दलों अथवा वैचारिक समूहों के प्रभाव में काम कर रही थीं। कहीं वर्ग संघर्ष की कम्युनिस्ट अवधारणा प्रमुख थी तो कहीं श्रमिक आंदोलन राजनीत...
रेप पीड़िता: सुप्रीम कोर्ट का आया निर्णय एक सबक, उनके लिए जो अपनी जिम्मेदारी से भागते हैं!

रेप पीड़िता: सुप्रीम कोर्ट का आया निर्णय एक सबक, उनके लिए जो अपनी जिम्मेदारी से भागते हैं!

लेख
डॉ. निवेदिता शर्मा गाजियाबाद की चार वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को इलाज देने से इनकार करने वाले दो निजी अस्पतालों पर सर्वोच्च न्यायालय की तीखी टिप्पणी ने सभी देशवासियों का अपनी ओर ध्‍यान खींचा है। पूरे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था, पुलिस तंत्र, प्रशासनिक जवाबदेही और सामाजिक संवेदनशीलता पर ऐसे मामले सामने आने पर गंभीर प्रश्न खड़े हो जाते हैं। मु एक तरह से देखें तो मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने जिस स्पष्टता से कहा कि "यदि आपने अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया तो अपने नाम के आगे डॉक्टर लिखने का कोई अधिकार नहीं है," वह उन सभी लोगों के लिए चेतावनी है जो अपने पेशे को केवल व्यवसाय समझ बैठे हैं या जो जिम्‍मेदारी उन्‍हें मिली है, उससे जुड़ा वह कार्य जिम्‍मेदारीपूर्वक पूर्ण करना नहीं चाहते। इस घटना में चार वर्षीय मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ। परिजन उसे उपचार क...