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“बच्चों को सिर्फ पढ़ाइए मत… उन्हें समझिए और समझाएं भी”

-डॉ. निवेदिता शर्मा

भोपाल की 17 वर्षीय ओजस्वी ने जब ये शब्द “सॉरी मम्मी-पापा… मैं अच्छी बेटी नहीं बन सकी…” लिखे होंगे, तब शायद उसकी आंखों में आंसू रहे होंगे, मन में डर रहा होगा और दिल में एक ऐसा भाव, जिसे वह किसी से कह नहीं पाई!

सोचिए… एक बच्ची, जो अपने माता-पिता की दुनिया थी, जिसने बचपन से उनके स्नेह में पलकर सपने देखे, आखिर उसके मन में ऐसा कौन-सा तूफान उठा होगा कि उसे जीवन छोड़ देना आसान लगा? यह घटना सिर्फ भोपाल की नहीं है। यह हर उस घर की कहानी है जहां बच्चे मुस्कुराते तो हैं, किंतु भीतर से टूट रहे होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कई बच्चों की चुप्पी दिखाई नहीं देती। आज जरूरत इस बात की है कि हम उनसे यह पूछें- “तुम ठीक तो हो ना?”

सच कहा जाए तो बच्चे कमजोर नहीं होते, बस अकेले पड़ जाते हैं, अक्सर हम बड़े लोग सोचते हैं कि बच्चों की जिंदगी में आखिर तनाव ही क्या है? ना कमाने की चिंता, ना घर चलाने की जिम्मेदारी, किंतु सच मानिए, आज का बच्चा भीतर से जितना दबाव झेल रहा है, शायद उतना पहले कभी नहीं था।उसके आसपास बनी मोबाइल और गेम की दुनिया ने जैसे उसके जीवंत संबंध ही उससे छीन लिए हैं। अधि‍कांश परिवार भी वो व्‍यवस्‍था नहीं कर पा रहे जिसमें बच्‍चे को मन और तन की सुदृढ़ता मिले।

आज 13 से 17 साल की उम्र में हर चौथा बच्चा डिप्रेशन जैसी मानसिक समस्या से गुजर रहा है। यह आंकड़ा डराता है। क्योंकि इसका मतलब है कि हमारे आसपास बैठे चार बच्चों में से एक बच्चा शायद हर रात अकेले रोता हो, हर दिन खुद को दूसरों से कम समझता हो या हर पल किसी डर में जी रहा हो। किशोरावस्था वह उम्र होती है जहां बच्चे खुद को साबित करने की कोशिश करते हैं। उन्हें लगता है कि यदि वे असफल हुए तो लोग उन्हें प्यार करना छोड़ देंगे। छोटी-सी डांट भी उन्हें यह महसूस करा सकती है कि वे “अच्छे बच्चे” नहीं हैं। यही वजह है कि कई बार हम जो बात गुस्से में कह देते हैं, वही बात बच्चे के दिल में तीर की तरह उतर जाती है।

सोचिए… जब बच्चा उदास होकर कमरे में चला जाए, खाना छोड़ दे, कम बोलने लगे या अकेला रहने लगे, तब क्या हम उसके पास बैठते हैं? क्या हम उससे पूछते हैं; “क्या बात है बेटा? तुम परेशान लग रहे हो…” अक्सर हम कहते हैं,  “इतनी-सी बात पर रोते हो?” “हमारे समय में ऐसा नहीं होता था।” “मोबाइल छोड़ो, सब ठीक हो जाएगा।” लेकिन सच यह है कि बच्चे समाधान से पहले अपनापन चाहते हैं। उन्हें सलाह से पहले सुनने वाला चाहिए।

नंबरों की दौड़ ने बचपन छीन लिया

आज हर बच्चा एक प्रतियोगिता में भाग रहा है। स्कूल की रैंक, कोचिंग का दबाव, प्रतियोगी परीक्षाएं, करियर की चिंता, ऐसा लगता है जैसे बच्चों को बचपन से ही यह समझा दिया गया हो कि जिंदगी एक रेस है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में छात्र आत्महत्या के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है।

मोबाइल के दौर में बच्चे सबसे ज्यादा अकेले हैं। घर में सब साथ बैठे होते हैं, लेकिन बातचीत गायब हो चुकी है। माता-पिता मोबाइल में व्यस्त हैं, बच्चे स्क्रीन में खोए हैं और भावनाएं धीरे-धीरे मौन होती जा रही हैं। सोशल मीडिया ने बच्चों को तुलना करना सिखा दिया है। कोई ज्यादा सुंदर दिखता है, कोई ज्यादा अमीर, कोई ज्यादा सफल। ऐसे में बच्चा अपने जीवन को कमतर समझने लगता है। ऐसे में कई बच्चे साइबर बुलिंग का शिकार होते हैं। कई बच्चों को बॉडी शेमिंग झेलनी पड़ती है, किेंतु वे डर के कारण किसी से कुछ नहीं कहते। बच्चे बाहर से सामान्य दिखते हैं, लेकिन अंदर से बिखर चुके होते हैं। यही सबसे खतरनाक स्थिति है।

बच्चों को सलाह नहीं, भरोसा चाहिए

हर बच्चा चाहता है कि उसके जीवन में कोई ऐसा हो जिसके सामने वह बिना डरे रो सके। जब बच्चा गलती करे, तब उसे यह डर नहीं होना चाहिए कि अब मम्मी-पापा प्यार नहीं करेंगे। उसे यह भरोसा होना चाहिए कि डांट पड़ेगी, लेकिन साथ नहीं छूटेगा। बच्चों को यह मत सिखाइए कि “लोग क्या कहेंगे?” उन्हें यह सिखाइए कि “मुश्किल समय में बात करना कमजोरी नहीं, हिम्मत है।” यदि बच्चा उदास है, गुस्से में रहता है, अचानक चुप हो गया है या बार-बार खुद को बेकार कहता है, तो इसे नजरअंदाज मत कीजिए। यह मदद की पुकार हो सकती है।

माता-पिता भी थोड़ा रुककर खुद से सवाल करें

 कभी-कभी हमें खुद से पूछना चाहिए कि  क्या हमने अपने बच्चे को आखिरी बार बिना किसी कारण गले कब लगाया था? क्या हमने उसकी बातें बिना टोके सुनी थीं?क्या हमने कभी उससे कहा- “तुम जैसे भी हो, हमारे लिए बहुत खास हो…” बच्चों को महंगे स्कूल, कोचिंग और मोबाइल से ज्यादा जरूरत अपने माता-पिता के समय और स्नेह की होती है।

मानसिक स्वास्थ्य को समझना समय की मांग है

आज मानसिक स्वास्थ्य कोई “फैशन” या “बहाना” नहीं है। यह एक वास्तविक समस्या है। जैसे शरीर बीमार होता है, वैसे ही मन भी बीमार हो सकता है। यदि किसी बच्चे को बुखार हो तो हम तुरंत डॉक्टर के पास जाते हैं, किेंतु जब बच्चा लगातार उदास रहता है, तब हम कहते हैं- “सब ठीक हो जाएगा…” नहीं, हर बार सब अपने आप ठीक नहीं होता। कई बार विशेषज्ञ की मदद जरूरी होती है। हमें बच्चों को यह समझाना होगा कि मदद मांगना कमजोरी नहीं है। रो लेना, अपनी परेशानी बताना और काउंसलर से बात करना बिल्कुल सामान्य बात है।

हमें कैसी पीढ़ी चाहिए?

हमें सिर्फ सफल बच्चे नहीं, खुश बच्चे चाहिए। ऐसे बच्चे जो अपने मन की बात कह सकें, जो असफलता से डरें नहीं और जिन्हें यह भरोसा हो कि उनका परिवार हर परिस्थिति में उनके साथ खड़ा है। आज रात जब आपका बच्चा आपके सामने आए, तो उससे सिर्फ पढ़ाई की बात मत कीजिए। उसके सिर पर हाथ रखिए और पूछिए- “सच-सच बताना… तुम खुश तो हो ना?” क्योंकि कई बार एक संवेदनशील बातचीत वह कर जाती है, जो बड़ी-बड़ी सीख और डांट भी नहीं कर पाती।

फिर भी यदि कभी किसी बच्चे या युवा के मन में आत्महत्या का विचार आए, तो तुरंत सहायता लें। मध्‍यप्रदेश में बाल अधिकार संरक्षण आयोग सीपीसीआर एक्‍ट 2007 के अंतर्गत बाल अधिकारों की सुरक्षा हेतु निरंतर आप बच्‍चों के हित, सर्वोच्‍च देखभाल और चिंता के लिए ही कार्यरत है। यदि कहीं भी लगता है, कुछ भी गलत हो रहा है, यदि कहीं अंदर अवसाद या नकारात्‍मकता स्‍वयं पर हावी हो रही है तो बाल आयोग से सीधे संपर्क किया जा सकता है। प्रदेश में माननीय मुख्‍यमंत्री डॉ. मोहन यादवजी ने अनेक योजनाएं आज मप्र के बच्‍चों के हित में चलायी हुई हैं, बच्‍चे और उनके अभिभावक दोनों ही अपने अनुरूप उन योजनाओं का लाभ लेने आगे आ सकते हैं।

यदि कहीं कोई कठिनाई आ रही है तो मप्र बाल संरक्षण आयोग से सीधे https://www.cpcr.mp.gov.in/ पर संपर्क कर सकते हैं। हमारी वेबसाइट पर अनेक बातें एवं सुविधाओं के बारे में जानकारियां दी गई हैं। आप आयोग के ई-मेल mpcpcr@gmail.com पर दोस्‍त निवेदिता के नाम पत्र लिख सकते हैं। दूरभाष 0755-2559900/03/04/05/06 पर संपर्क कर सकते हैं। वेबसाइट पर दिए गए अध्‍यक्ष एवं सदस्‍यों के नंबरों पर सीधे फोन लगा सकते हैं। याद रखिए, हर बच्चा अनमोल है और हर जीवन बचाया जा सकता है। फिर कभी कोई –‘ओजस्वी’ गले में फंदा न डाले, हम सभी के प्रयास यही होने चाहिए।
(लेखिका मप्र बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्‍यक्ष हैं)

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