संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक : क्या भारत अपनी सांस्कृतिक शक्ति खो रहा है?
कैलाश चन्द्र
संयुक्त परिवार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें बच्चे केवल अपने माता-पिता के साथ नहीं, बल्कि भाई-बहनों, चचेरे-ममेरे भाई-बहनों, दादा-दादी तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ रहते हुए जीवन जीना सीखते हैं। जब तीन-चार बच्चे एक साथ खेलते हैं, साथ बैठकर भोजन करते हैं, अपने खिलौने और वस्तुएँ बाँटते हैं, छोटे-बड़े का ध्यान रखते हैं और छोटी-छोटी बातों पर रूठते-मनाते हैं, तब उनके भीतर बिना किसी औपचारिक शिक्षा के सामाजिक जीवन के संस्कार विकसित होने लगते हैं। वे समझते हैं कि जीवन केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति का नाम नहीं, बल्कि दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने का भी नाम है। परिवार उन्हें सहयोग, सहिष्णुता, त्याग, धैर्य, अनुशासन, साझेदारी और परस्पर उत्तरदायित्व का व्यावहारिक प्रशिक्षण देता है।
इसी वातावरण में परस्पर स्नेह, आत्मीयता, अपनापन और एक-दूसरे का सहारा बनने की भावना स्वाभाविक ...









