
नई दिल्ली, 14 अक्टूबर (प्रेस ब्यूरो)। दिल्ली यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स (डीयूजे) ने आज सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक याचिका दायर की है, जिसमें उन्होंने 10 एवं 11 अक्टूबर को दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान मीडियाकर्मियों के साथ हुई कथित पुलिस हिंसा, बदसलूकी और उनके अवैध रूप से हिरासत में लिये जाने के आरोपों को स्पष्ट किया है। याचिका में बताया गया है कि इस अवधि के दौरान कई पत्रकारों को बिना किसी वैध कारण के रोक लिया गया, उनपर बलपूर्वक बंधक बनाया गया और उनके उपकरणों को जब्त किया गया।
डीयूजे के प्रवक्ता ने कहा कि यह घटना केवल एक व्यक्तिगत अनुशासनात्मक त्रुटि नहीं, बल्कि पत्रकारों की कार्यस्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर एक गंभीर हमले का प्रतीक है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इस घटना के बाद कई रिपोर्टर अपने काम को जारी रखने में संकोच महसूस कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि पुनः ऐसी ही बदसलूकी का सामना करना पड़ेगा।
याचिका में यह तर्क दिया गया है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत माध्यमों की स्वतंत्रता को संरक्षित किया गया है, और इस अधिकार का उल्लंघन करने वाली कोई भी कार्रवाई न्यायिक समीक्षा के अधीन होनी चाहिए। डीयूजे ने विशेष रूप से इस बात पर ज़ोर दिया कि पुलिस ने न केवल पत्रकारों को अवैध रूप से हिरासत में लिया, बल्कि उन्हें मौखिक और शारीरिक रूप से भी दंडित किया, जिससे उनके जीवन और सुरक्षा दोनों को खतरा उत्पन्न हुआ।
डीयूजे ने अदालत से अनुरोध किया है कि पुलिस अधिकारियों को इस मामले में जवाबदेह ठहराया जाए और भविष्य में ऐसी किसी भी प्रकार की पुलिस हिंसा को रोकने के लिए उचित दिशा-निर्देश जारी किए जाएँ। इसके साथ ही उन्होंने यह भी माँग की है कि सभी गिरफ्तार पत्रकारों को तुरंत रिहा किया जाए और उनके बंद किए गए उपकरणों को लौटाया जाए।
यह याचिका इस बात का संकेत देती है कि पत्रकार संघटन भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए संस्थागत उपायों की तलाश में सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं, विशेषकर जब ऐसी घटनाएँ सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान उत्पन्न होती हैं। इस मामले के निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि न्यायपालिका प्रेस की सुरक्षा के मुद्दे को किस हद तक महत्व देती है।
