
सीवान, 14 अक्टूबर (प्रेस ब्यूरो)। देश के प्रथम राष्ट्रपति एवं देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद का अपनी जन्मभूमि, अपनी मिट्टी और भारतीय संस्कृति से गहरा लगाव रहा है। वे जब 1950 में भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुँचे, तब भी अपनी जड़ों और धार्मिक परंपराओं को नहीं भूले। इस लगाव का सबसे स्पष्ट प्रमाण उनकी दुर्गापूजा परंपरा है, जिसे वह हर साल जीरादेई में मनाते आएँ।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 को बिहार के सीवान जिले के जीरादेई गाँव में हुआ था। बचपन से ही वे माँ-बाप की खेती‑किसानी और गाँव के सामाजिक जीवन में गहरी रुचि रखते थे। उनके परिवार में हर वर्ष शरद ऋतु में दुर्गा माता की पूजा का विशेष आयोजन होता था, जिसमें गाँव के सभी लोग भाग लेते थे। यह परंपरा उनके दिल में गहरी जड़ें जमा गई और बाद में जब वह स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेकर भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने, तब भी उन्होंने इस परम्परा को जीवित रखने का संकल्प लिया।
राष्ट्रपति पद संभालने के बाद, डॉ. प्रसाद ने हर वर्ष दुर्गा पूजा के अवसर पर जीरादेई लौटने का क्रम स्थापित किया। 1952‑1957 के बीच, राष्ट्रपति कार्यालय से विशेष अनुमति लेकर वे अपने परिवार के साथ गाँव पहुँचते और स्थानीय लोगों के साथ मिलकर पूजा‑अर्चना एवं भजन‑कीर्तन में भाग लेते। इस दौरान उन्होंने गाँव के बच्चों को शैक्षिक सहायता प्रदान की और महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिये कई योजनाओं की शुरुआत की।
एक बार उन्होंने कहा, “मेरे लिये यह पूजा केवल धर्म नहीं, बल्कि मेरे अतीत और मेरे भविष्य के बीच का वह पुल है, जिससे मैं अपने देश के नागरिकों के साथ जुड़ाव महसूस करता हूँ।” इस कथन में उनकी जड़ों से जुड़ी भावना स्पष्ट झलकती है। उनका मानना था कि राष्ट्र की प्रगति के लिये उसकी सांस्कृतिक जड़ें भी मजबूत होनी चाहिए।
आज भी जीरादेई में हर शरद ऋतु में आयोजित दुर्गा पूजा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के जीवन से प्रेरित कई लोग भाग लेते हैं। उनकी स्मृति को सम्मानित करने के लिये गाँव में एक स्मारक स्थापित किया गया है, जहाँ प्रत्येक वर्ष उनका पदचिह्न देखते हुए स्थानीय प्रशासन और श्रद्धालु उनका सम्मान करते हैं। इस प्रकार, राष्ट्रपति पद की ऊँचाइयों पर पहुँचने के बाद भी डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति और अपनी परम्परा को कभी नहीं भुलाया, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय अभिमान के रूप में आगे बढ़ाया।
