By: हृदयनारायण दीक्षित

हृदयनारायण दीक्षित प्रकृति माँ है। माँ प्रथमा है। हम सब माँ के अंग हैं। माँ का ही विस्तार हैं। माँ न होती तो हम न होते। माँ सृष्टि प्रकृति की आदि अनादि अनुभूति है। माँ दिव्य है। माँ का अनुभव दिव्यता है। तैत्तिरीय उपनिषद् के ऋषि ने ठीक ही माँ को दे
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
