रक्षाबंधन : एक राखी, अनेक संकल्प
डॉ. वंदना सेन
“येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”
जिस रक्षा सूत्र से महाबली राजा बलि को बाँधा गया था, उसी रक्षा-सूत्र से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षासूत्र! तुम अडिग रहना, अपने संकल्प से कभी विचलित मत होना।
रक्षाबंधन पर धागों पर बंधन एक संकल्प है।
वह धागा राखी का नहीं, रिश्तों का होता है।
बहन जब भाई की कलाई पर राखी बाँधती है तो वह केवल धागा नहीं बाँधती। वह अपने बचपन को बाँधती है, अपनी स्मृतियों को बाँधती है, अपने विश्वास को बाँधती है। उसकी आँखों में एक मौन प्रार्थना होती है- “भैया! जीवन चाहे जितना बदल जाए, हमारे रिश्ते का यह विश्वास कभी मत बदलना।” और भाई भी जब बहन की ओर देखता है तो उसके मन में एक संकल्प जन्म लेता है- “तुम्हारे जीवन में कोई कठिनाई आए तो मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।” यही रक्षाबंधन है। भारतीय संस्कृति की सुंदरता ...









