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रक्षाबंधन : एक राखी, अनेक संकल्प

डॉ. वंदना सेन

“येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः।

तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”

जिस रक्षा सूत्र से महाबली राजा बलि को बाँधा गया था, उसी रक्षा-सूत्र से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षासूत्र! तुम अडिग रहना, अपने संकल्प से कभी विचलित मत होना।

रक्षाबंधन पर धागों पर बंधन एक संकल्प है।

वह धागा राखी का नहीं, रिश्तों का होता है।

बहन जब भाई की कलाई पर राखी बाँधती है तो वह केवल धागा नहीं बाँधती। वह अपने बचपन को बाँधती है, अपनी स्मृतियों को बाँधती है, अपने विश्वास को बाँधती है। उसकी आँखों में एक मौन प्रार्थना होती है- “भैया! जीवन चाहे जितना बदल जाए, हमारे रिश्ते का यह विश्वास कभी मत बदलना।” और भाई भी जब बहन की ओर देखता है तो उसके मन में एक संकल्प जन्म लेता है- “तुम्हारे जीवन में कोई कठिनाई आए तो मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।” यही रक्षाबंधन है। भारतीय संस्कृति की सुंदरता यह है कि वह किसी पर्व को केवल व्यक्तिगत संबंध तक सीमित नहीं रखती। वह एक छोटे से पारिवारिक संस्कार को भी व्यापक सामाजिक संदेश में बदल देती है। रक्षा केवल बहन की नहीं करनी है। रक्षा रिश्तों की करनी है। रक्षा संस्कारों की करनी है। रक्षा समाज की करनी है। रक्षा संस्कृति की करनी है। रक्षा राष्ट्र की करनी है। और रक्षा उस प्रकृति की करनी है, जिसके बिना हमारा अस्तित्व ही संभव नहीं।

राखी की डोर से राष्ट्र तक

हम अक्सर कहते हैं कि देश की रक्षा सैनिक करते हैं। यह सत्य है और इस सत्य के सामने हमारा सिर श्रद्धा से झुक जाता है। सीमा पर खड़ा सैनिक अपने घर की राखी छोड़कर राष्ट्र की रक्षा के लिए तैनात रहता है। वह जानता है कि उसके पीछे करोड़ों परिवार चैन की नींद सो रहे हैं।

किसी सैनिक की कलाई पर बँधी राखी में भारत माता की रक्षा का आशीर्वाद भी होता है।

कल्पना कीजिए उस बहन की, जो अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधते हुए मन ही मन कहती होगी- “भैया! तुम देश की सीमा पर रहकर लाखों बहनों की रक्षा करना, मैं यहाँ तुम्हारे लौटने की प्रार्थना करूँगी।” यह भाव केवल एक परिवार का नहीं है। यह पूरे राष्ट्र का भाव है। लेकिन राष्ट्र की रक्षा केवल सीमा पर नहीं होती। जब कोई शिक्षक अपने विद्यार्थियों में चरित्र का निर्माण करता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। जब कोई किसान कठिन परिश्रम करके खेत में अन्न उगाता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। जब कोई चिकित्सक ईमानदारी से रोगी का उपचार करता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। जब कोई वैज्ञानिक देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अनुसंधान करता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। और जब एक सामान्य नागरिक ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाता है, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करता है, कानून का सम्मान करता है और देश की एकता को मजबूत करता है, तब वह भी राष्ट्र की रक्षा करता है। इस रक्षाबंधन पर हमें अपने भीतर एक अदृश्य राखी बाँधनी चाहिए, जो कर्तव्य करने का संकल्प बन सके। हम आधुनिक बनें, विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ें, दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाएँ- यह आवश्यक है। आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है। राखी केवल बाजार से खरीदा हुआ धागा नहीं है। उसके पीछे हजारों वर्षों की सांस्कृतिक चेतना है। वे यह समझें कि भारतीय पर्व जीवन मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचाने वाले माध्यम हैं।

हमारे त्योहार हमें जोड़ते हैं। वे हमें बताते हैं कि जीवन केवल स्वयं के लिए जीने का नाम नहीं है। हमारे पर्व वास्तव में हमारी संस्कृति की जीवित पाठशालाएँ हैं। इसलिए संस्कृति की रक्षा का अर्थ केवल पुरानी परंपराओं को दोहराना नहीं है। संस्कृति की रक्षा का अर्थ है- उसके मूल्यों को अपने जीवन में उतारना। प्रकृति हमें बार-बार संकेत दे रही है कि अब उसकी रक्षा का समय आ गया है। तो क्यों न इस रक्षाबंधन पर एक नई परंपरा शुरू की जाए? एक राखी भाई की कलाई पर और एक राखी वृक्ष की शाखा पर। यदि एक परिवार हर वर्ष एक वृक्ष की जिम्मेदारी ले ले, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए कितनी बड़ी विरासत तैयार हो सकती है। रक्षा का अर्थ अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है। हर अधिकार के साथ एक उत्तरदायित्व जुड़ा होता है। जिसकी रक्षा करने का संकल्प लेते हैं, उसके प्रति हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।

एक राखी, अनेक संकल्प। इस बार जब बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधे तो भाई केवल उपहार देने तक सीमित न रहे। दोनों मिलकर कुछ संकल्प लें- माता-पिता का सम्मान करेंगे। परिवार में संवाद बनाए रखेंगे। बुजुर्गों को अकेला नहीं छोड़ेंगे। बच्चों को संस्कार देंगे। जरूरतमंद की सहायता करेंगे। देश की संपत्ति को अपनी संपत्ति समझेंगे। प्रकृति को नुकसान नहीं पहुँचाएँगे। यदि रक्षाबंधन इन संकल्पों का पर्व बन जाए तो समाज की कितनी समस्याएँ अपने आप कम हो सकती हैं। वस्तुएँ कुछ समय बाद पुरानी हो जाती हैं, लेकिन संकल्प जीवनभर साथ रहता है।

रक्षाबंधन की राखी कलाई पर बँधती है, लेकिन उसका अर्थ हृदय में उतरना चाहिए। उसकी डोर हमें बचपन से जोड़ती है, परिवार से जोड़ती है, समाज से जोड़ती है, संस्कृति से जोड़ती है और अंततः राष्ट्र से जोड़ती है। यह धागा हमें बताता है कि जीवन में केवल अपने सुख की चिंता करना पर्याप्त नहीं है। इसलिए इस रक्षाबंधन पर एक राखी कलाई पर बाँधिए और एक संकल्प हृदय में। एक रिश्ता बचाइए। एक बुजुर्ग का हाथ थामिए। एक वृक्ष बचाइए।

एक जलस्रोत को स्वच्छ रखिए। तभी राखी का धागा सचमुच मजबूत होगा। यही रक्षाबंधन की सार्थकता है।

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डॉ. वन्दना सेन

पार्वती बाई गोखले विज्ञान महाविद्यालय

जीवाजीगंज, लश्कर ग्वालियर म. प्र.

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