
नई दिल्ली, 09 अक्टूबर (प्रेस ब्यूरो)। एलन मस्क और स्पेसएक्स ने स्टारलिंक के माध्यम से भारत के दूर‑दराज़ क्षेत्रों में हाई‑स्पीड इंटरनेट पहुँचाने का वादा किया है। लेकिन इस पहल के पीछे कई वास्तविक चिंताएँ हैं।
पहला, निवेश का दायरा अस्पष्ट है। मस्क ने बड़े पैमाने पर भुगतान या भारतीय साझेदारियों की कोई ठोस योजना नहीं दी है, जिससे प्रोजेक्ट की वित्तीय स्थिरता पर सवाल उठते हैं।
दूसरा, सुरक्षा जोखिम बढ़ते दिख रहे हैं। सैटेलाइट नेटवर्क को संभावित जासूसी और साइबर‑हमले का शिकार माना जा रहा है, जबकि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति इस प्रकार के विदेशी तकनीकी अधिग्रहण के प्रति सतर्क है।
तीसरा, मौजूदा डिजिटल डिवाइड को घटाने के लिए भारत ने पहले ही भू‑आधारित फाइबर‑ऑप्टिक और 4G/5G नेटवर्क में बड़े निवेश किए हैं। सैटेलाइट‑आधारित सेवाओं से इन प्रयासों में दोहराव और अनावश्यक खर्च की संभावना है।
चौथा, नियामक बाधाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारतीय टेली‑कॉम नियामक प्राधिकरण ने अभी तक स्टारलिंक को पूर्ण लाइसेंस नहीं दिया है, और अंतरराष्ट्रीय स्पेस ट्रैफ़िक नियमों के तहत भारत को सैटेलाइट कक्षा का अधिकार भी सीमित किया गया है।
इन सभी कारणों से, भारत को स्टारलिंक जैसी विदेशी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा अपनाने से पहले विस्तृत आर्थिक‑सुरक्षा मूल्यांकन और स्पष्ट निवेश‑सुरक्षा समाधान की आवश्यकता है, न कि केवल वादे और आरोपों पर भरोसा करना।
