सीजेआई गवई और राकेश किशोर मामला कहां जाकर थमेगा
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारतीय लोकतंत्र की आत्मा उसके संविधान और न्यायपालिका में बसती है, जहां समानता, स्वतंत्रता और न्याय के आदर्शों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। वस्तुत: सर्वोच्च न्यायालय को इसी आत्मा का रक्षक कहा जाता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह प्रश्न बार-बार उठ रहा है कि क्या यह रक्षक संस्था सभी समुदायों के लिए समान रूप से न्यायसंगत है? जब मुद्दे बहुसंख्यक समाज, हिन्दू परंपराओं या सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़े होते हैं, तो न्यायिक रवैया अक्सर असहज और असंतुलित दिखाई देता है।
जनहित याचिका : उद्देश्य से औपचारिकता तक
भारत में जनहित याचिका (पीआईएल) की शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी ताकि समाज के हाशिये पर खड़े लोगों को भी न्याय का दरवाजा खुला मिले। ‘लोकस स्टैंडी’ की दीवार को तोड़कर सुप्रीम कोर्ट ने आम नागरिकों को न्याय की प्रक्रिया में भागीदार बनाया। किंतु धीरे-धीरे यह औजार राजनीत...

