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पीएम मोदी की अपील पर राहुल-अखिलेश की नकारात्‍मक राजनीति !

पीएम मोदी की अपील पर राहुल-अखिलेश की नकारात्‍मक राजनीति !

लेख, विशेष समाचार
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडराते खतरे ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा कर रखी है। भारत जैसा देश, जोकि विश्‍व की विशाल जनसंख्‍या का प्रतिनिधित्‍व करता है, स्‍वभाविक है कि अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, स्वाभाविक रूप से इस संकट से प्रभावित है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ईंधन बचाने, अनावश्यक सोना खरीदने से बचने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने की अपील की है तो इसमें अनुचित क्‍या है? यह अपील न तो किसी भय का संकेत थी और न ही किसी आपातकाल की घोषणा, बल्कि आर्थिक अनुशासन और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का संदेश है, किंतु कांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे सरकार की विफलता बताकर राजनीतिक हमला शुरू कर दिया है। सवाल यह है कि क्या हर राष्ट्रीय चुनौती को राजनीति के चश्मे से ...
आत्मनिर्भर भारत : देश को सशक्‍त बनाने के लिए पीएम मोदी के पंद्रह सूत्र

आत्मनिर्भर भारत : देश को सशक्‍त बनाने के लिए पीएम मोदी के पंद्रह सूत्र

लेख, विशेष समाचार
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारत आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहां वह वैश्विक नेतृत्व की क्षमता रखने वाली शक्ति के रूप में उभर रहा है। ऊर्जा संकट, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, विदेशी निर्भरता और खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दे आज पूरी दुनिया के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं। भारत भी इनसे बाहर नहीं है, ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए पंद्रह सूत्र भारत को आत्मनिर्भर, आर्थिक रूप से मज़बूत, पर्यावरणीय रूप से संतुलित और रणनीतिक रूप से शक्तिशाली बनाने का राष्ट्रीय संकल्प है। प्रधानमंत्री मोदी ने कई अवसरों पर कहा है कि “21वीं सदी भारत की सदी होगी”, किंतु बड़ा प्रश्‍न यही है कि यह संभव कैसे होगा?  वस्‍तुत: यह तभी संभव है- जब भारत ऊर्जा, कृषि, उपभोग, परिवहन और जीवनशैली के स्तर पर आत्मनिर्भरता की ओर निर्णायक कदम बढ़ाए, इसलिए पीएम मोदी के आज के समय में दिए गए इन पंद्रह सूत्रों म...
मध्यप्रदेश में आम उत्पादन की बढ़ती संभावनाएँ और “मैंगो फेस्टिवल 2026”

मध्यप्रदेश में आम उत्पादन की बढ़ती संभावनाएँ और “मैंगो फेस्टिवल 2026”

मध्य प्रदेश, लेख
· अनिल वशिष्ठ भारत कृषि प्रधान देश होने के साथ उद्यानिकी फसलों के उत्पादन में भी विश्व स्तर पर अपनी मजबूत पहचान रखता है। फलों, फूलों और सब्जियों के उत्पादन के माध्यम से देश की कृषि अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिल रही है। इसी क्रम में मध्यप्रदेश ने उद्यानिकी क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ अर्जित करते हुए देश के अग्रणी राज्यों में अपना स्थान बनाया है। विशेष रूप से फल उत्पादन के क्षेत्र में प्रदेश देश में चौथे स्थान पर है। भारतवर्ष में कुल लगभग 1176 लाख मीट्रिक टन फलों का उत्पादन होता है, जिसमें से लगभग 102 लाख मीट्रिक टन उत्पादन मध्यप्रदेश में किया जा रहा है। यह उपलब्धि प्रदेश के किसानों की मेहनत, अनुकूल जलवायु और राज्य सरकार की योजनाओं का प्रतिफल है। फल उत्पादन की दृष्टि से यदि किसी एक फल की लोकप्रियता और आर्थिक महत्व की चर्चा की जाए तो आम का नाम सबसे पहले आ...
पश्चिम बंगाल 2026 : परिवर्तन की राजनीति नहीं, ये विचार–तप की ऐतिहासिक परिणति

पश्चिम बंगाल 2026 : परिवर्तन की राजनीति नहीं, ये विचार–तप की ऐतिहासिक परिणति

लेख
-कैलाश चन्द्रपश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के परिणाम भारत की राजनीति में केवल संख्यात्मक उलटफेर नहीं हैं; वे उन अदृश्य धाराओं का सतही प्रकट रूप हैं जिनकी गति दशकों से इस प्रदेश की मिट्टी में प्रवाहित हो रही थी। 294 सीटों वाले इस राज्य में दो चरणों- 23 और 29 अप्रैल में हुए मतदान ने 92.93 प्रतिशत का अभूतपूर्व जनसहभाग दर्ज कराया, और 4–5 मई को आए परिणामों ने लगभग असंभव प्रतीत होने वाला परिदृश्य रचा। भारतीय जनता पार्टी लगभग 206 सीटों पर विजय या बढ़त के साथ स्पष्ट बहुमत प्राप्त करती है, जबकि तृणमूल कांग्रेस 81 के आसपास सिमट जाती है।यदि इस घटना को केवल राजनीतिक गणित के संदर्भ में पढ़ा जाए, तो यह विश्लेषण अधूरा रह जाएगा। क्योंकि बंगाल में सत्ता-परिवर्तन सामान्यतः राजनीतिक रणनीतियों से नहीं, सांस्कृतिक चेतना के परिवर्तन से होता है और 2026 का यह जनादेश, वस्तुतः, उसी चेतना के पुनरुत्थान की कथा कहत...
अनुसूचित जाति आरक्षण और मतांतरण: संवैधानिक सीमाएँ, न्यायिक दृष्टिकोण

अनुसूचित जाति आरक्षण और मतांतरण: संवैधानिक सीमाएँ, न्यायिक दृष्टिकोण

लेख
-कैलाश चन्द्र भारत का संवैधानिक ढाँचा अनुसूचित जातियों (एससी) को उन ऐतिहासिक सामाजिक विषमताओं से उबारने के लिए विशेष संरक्षण और आरक्षण प्रदान करता है, जो सदियों से चले आ रहे अस्पृश्यता, बहिष्कार और जातिगत उत्पीड़न से उत्पन्न हुई हैं। यह व्यवस्था केवल आर्थिक पिछड़ेपन का समाधान नहीं है बल्कि एक गहरे सामाजिक अन्याय के प्रतिकार के रूप में विकसित की गई है। इसी कारण अनुसूचित जाति का दर्जा मूलतः उस सामाजिक-धार्मिक संरचना से जुड़ा माना गया है, जिसमें यह उत्पीड़न उत्पन्न हुआ अर्थात पारंपरिक हिंदू सामाजिक व्यवस्था। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुसार एससी का दर्जा प्रारंभ में केवल हिंदुओं तक सीमित था, जिसे बाद में संशोधनों के माध्यम से सिख (1956) और बौद्ध (1990) समुदायों तक विस्तारित किया गया। इस व्यवस्था के अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति, जो मूलतः एससी समुदाय से आता है, इस्लाम या ईस...
लखपति दीदी पहल से मध्यप्रदेश में महिलाओं को मिली आर्थिक सशक्तिकरण की नई दिशा

लखपति दीदी पहल से मध्यप्रदेश में महिलाओं को मिली आर्थिक सशक्तिकरण की नई दिशा

लेख
नारी शक्ति वंदन भोपाल ! मध्यप्रदेश में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से संचालित “लखपति दीदी” पहल उल्लेखनीय परिणाम दे रही है। इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम का लक्ष्य स्व-सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाते हुए उनकी वार्षिक आय कम से कम 1 लाख रुपये तक पहुंचाना है। राज्य सरकार ने आगामी दो वर्षों में 16.41 लाख परिवारों को “लखपति दीदी” बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। वर्तमान में 12.49 लाख महिलाएं इस श्रेणी में पहुंच चुकी हैं, जो इस योजना की सफलता को दर्शाता है। इस पहल के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए 526 मास्टर ट्रेनर और 20 हजार 517 लखपति सीआरपी (कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन) को प्रशिक्षित किया गया है। प्रशिक्षित कर्मी महिलाओं को विभिन्न आजीविका गतिविधियों में प्रशिक्षण देने के साथ उनकी आय-व्यय योजना तैयार करने और वित्तीय एवं तकनीकी सहयोग प्रदान...
डॉ. भीमराव आंबेडकर: बहुआयामी व्यक्तित्व का समग्र परिप्रेक्ष्य

डॉ. भीमराव आंबेडकर: बहुआयामी व्यक्तित्व का समग्र परिप्रेक्ष्य

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-डॉ. सदानंद दामोदर सप्रे भारतीय इतिहास में कुछ महान व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनकी छवि समाज के सामने सीमित रूप में प्रस्तुत होती है, जबकि उनका वास्तविक योगदान उससे कहीं अधिक व्यापक और बहुआयामी होता है। डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर भी ऐसे ही एक महान पुरुष हैं। सामान्यतः उन्हें केवल “संविधान निर्माता” या “दलितों के उद्धारक” के रूप में जाना जाता है, किन्तु यह उनके विराट व्यक्तित्व का केवल एक अंश है। उनके जीवन और कार्यों का गहराई से अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि वे एक अद्वितीय विद्वान, प्रखर अर्थशास्त्री, दूरदर्शी चिंतक, समर्पित शिक्षाविद, सिद्धांतनिष्ठ पत्रकार, श्रमिकों के हितैषी तथा सच्चे राष्ट्रनेता थे। डॉ. आंबेडकर का प्रारंभिक जीवन अत्यंत कठिन परिस्थितियों में बीता। आर्थिक अभाव और सामाजिक भेदभाव के बीच उन्होंने जिस दृढ़ता और लगन से उच्च शिक्षा प्राप्त की, वह अद्भुत है। अमेरिका के क...
उपेक्षित आबादी बनाम वैश्विक एजेंडा: असली मुद्दे क्यों ओझल हो रहे हैं?

उपेक्षित आबादी बनाम वैश्विक एजेंडा: असली मुद्दे क्यों ओझल हो रहे हैं?

लेख
-कैलाश चन्द्र भारत का सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य जितना विशाल है, उतना ही जटिल भी है। इस जटिलता के बीच आज हमारे सामने दो वास्तविकताएँ खड़ी हैं। पहली, भारत के ग्यारह करोड़ से अधिक घुमन्तु, अर्धघुमन्तु और डिनोटिफाइड जनजाति समुदाय जिन्हें डीएनटी, एनटी और एसएनटी के रूप में भी जाना जाता है, जोकि आज भी पहचान, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और मानवाधिकारों की बुनियादी लड़ाई लड़ रहे हैं। दूसरी ओर एलजीबीटीक्यू प्लस समुदाय का मुद्दा है, जिसकी जनसंख्या लगभग पाँच से छह लाख मानी जाती है, किन्तु राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विमर्श में उसकी उपस्थिति अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत की जा रही है। एक ओर इतनी विशाल आबादी है जो अदृश्य बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर एक छोटा समुदाय वैश्विक एजेंडों और वित्तीय तंत्रों के माध्यम से राष्ट्रीय बहस को प्रभावित कर रहा है। इस विरोधाभास ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा किया है कि क्या ह...
भारतीयता में समाहित है वैश्विक कल्याण का मार्ग

भारतीयता में समाहित है वैश्विक कल्याण का मार्ग

लेख
- प्रो. एस. के. सिंह वर्तमान में अविश्वास की परतों से घिरी हुई विश्व व्यवस्था अनेक प्रकार के संघर्षों एवं अस्थिरताओं से जूझ रही है। ईरान बनाम अमेरिका-इजराइल युद्ध, अमेरिका द्वारा वेनेजुएला में की गई असंगत कार्यवाही, लंबे समय से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध, पर्यावरण संकट, मानसिक तनाव एवं बढ़ती असहिष्णुता इस बात का प्रमाण है कि आज विश्व गहरे संकट से गुजर रहा है। वस्‍तुत: पिछले कुछ समय की सैन्य गतिविधियों को देखकर तो ऐसा लग रहा है कि विश्व-व्यवस्था पूरी तरह से लड़खड़ा गई है एवं धीरे-धीरे दुनिया ‘जंगलराज’ की ओर बढ़ रही है। टैरिफ को लेकर ट्रंप के अपरिपक्व एवं गैर-जिम्मेदार रवैये तथा पल-पल बदलते उनके बचकाने बयानों ने भूमंडलीकरण के मूल उद्देश्यों पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। जिस भूमंडलीकरण को परस्पर निर्भरता, वैश्विक सहयोग एवं साझा प्रगति का आधार माना गया था, आज वह कमजोर पड़ता हुआ दि...
डीएनटी, एनटी, एसएनटी समुदाय है अदृश्य भारत की पहचान और उम्मीदों का नया द्वार

डीएनटी, एनटी, एसएनटी समुदाय है अदृश्य भारत की पहचान और उम्मीदों का नया द्वार

लेख
-कैलाश चन्द्र भारत की स्वाधीनता को 77 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी अपनी स्वतंत्र पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है—ये हैं डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदाय, जिन्हें हम डीएनटी, एनटी, एसएनटी समुदाय के नाम से जानते हैं। अनुमान लगाया जाता है कि इनकी जनसंख्या आठ से ग्‍यारह करोड़ के बीच है, पर विडंबना यह है कि भारत की किसी भी राष्ट्रीय जनगणना ने इन्हें कभी अलग श्रेणी में नहीं गिना। इसी कारण 2027 की प्रस्तावित जनगणना को लेकर इन समुदायों में नई आशा जन्मी है, क्योंकि पहली बार उनकी पहचान साफ़-साफ़ दर्ज होने की संभावना बन रही है। इन समुदायों की पीड़ा इतिहास की धूल में दबी पड़ी है। 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट ने लगभग 150–200 समुदायों को “जन्मजात अपराधी” घोषित कर दिया था। 1952 में यह कानून भले ही खत्म हुआ, लेकिन समाज की नज़रों में अपराधीकरण का दाग अब तक नहीं...