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घोष केवल संगीत और वादन नहीं, यह साधना है

  • नितिन गर्गे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जब भी पथ संचलन निकलता है, तब घोष उसका सौंदर्य बढ़ाता है। संघ कार्य का यह शताब्दी वर्ष है। इन 100 वर्षों में जिस प्रकार संघ का क्रमिक विकास हुआ है, उसी प्रकार संघ के घोष का भी क्रमिक विकास हुआ है। दिसंबर, 1926 में जब संघ का पहला पथ संचलन निकला था, तब घोष में केवल एक आनक और एक शंख ही शामिल हुआ था। घोड़े पर चढ़कर पहले सरसेनापति मार्तंड राव जोग आगे चलते थे तथा पीछे बिगुल वादक एवं स्वयंसेवक संचलन करते थे।

विगत 100 वर्षों में यह यात्रा घोष की बड़ी और समृद्ध इकाई तक पहुँच गई है। घोषदल की इकाई में पणव (बास ड्रम), आनक (साइड ड्रम), शंख, वंशी, झल्लरी (झांझ), ट्राइंगल (त्रिभुज ), नियंत्रण और संकेत के लिए घोषदंड शामिल रहता है। आरएसएस का मत है कि घोष केवल संगीत का माध्यम नहीं, बल्कि यह वीरता, पराक्रम और राष्ट्रनिर्माण की भावना का प्रतीक है। शंख, ढोल और रणभेरी जैसे वाद्ययंत्र प्राचीन काल से ही ऊर्जा, उत्साह और विजय के संदेशवाहक रहे हैं। युद्धभूमि में भी ये रणवाद्य वीरता और उमंग का संचार करते थे। संघ का घोष दल उसी गौरवशाली परंपरा को आज के समाज तक पहुंचा रहा है। समय के साथ विदेशी ब्रास बैंड का प्रचलन बढ़ा, लेकिन संघ के घोष में जो धुनें बजाई जाती हैं, वे भारतीय रागों पर आधारित होती हैं। यहां तक कि विदेशी धुनों को भी भारतीय स्वरूप में ढालकर उन्हें हमारी सांस्कृतिक परंपरा के अनुरूप प्रस्तुत किया जाता है।

प्रारंभिक समय में अंग्रेजी पद्धति का घोष सिखाया जाता था। बाद में, पुणे के वरिष्ठ स्वयंसेवक हरि विनायक दात्ये ने अथक परिश्रम कर इसका भारतीयकरण किया तथा सारे घोष वाद्यों की लिपि को भातखंडे लिपि में लिपिबद्ध किया। उनके द्वारा किया गया यह प्रयास संगीत के क्षेत्र में किया गया अद्भुत योगदान सिद्ध हुआ। आज सम्पूर्ण देश में घोष, जिसे रण संगीत के रूप में जाना जाता है, प्रचलित है।

अपने भारतीय रागदारी से युक्त यह लिपि विभिन्न तालों जैसे कहरवा, दादरा, खेमटा पर आधारित है। आज इन तालों पर आधारित अनेक रचनाओं का निर्माण स्वयंसेवकों द्वारा किया गया है, जैसे- गणेश, भूप, केदार, शिवरंजिनी, चेतक, तिलक कामोद आदि सभी वाद्यों में कुल 90 से अधिक रचनाओं का समावेश है।

जिस प्रकार माथे पर लगी बिंदी अपना विशेष स्थान रखती है, उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में घोष का स्थान है। संचलन में घोष का स्वर स्वयंसेवकों में जोश एवं उत्साह भर देता है। मध्यभारत प्रान्त में लगभग 180 से अधिक घोष की इकाई है जहाँ घोष का अभ्यास होता है। अलग रुचि एवं आयु वर्ग के करीब 4000 वादक जुड़े हुए हैं। विजयादशमी पर्व पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में मध्यभारत प्रांत में एक नए इतिहास का सृजन करने जा रहा है। पहली बार नगर-नगर, गली-गली और छोटी-छोटी इकाइयों तक में पथ संचलन का भव्य आयोजन हो रहा है, इसके लिए बड़ी संख्या में घोष दल तैयार हुए हैं। 180 से अधिक प्रशिक्षित घोष शिक्षकों द्वारा नये स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण दिया गया है। शताब्दी वर्ष के लिए प्रत्येक नगर में 8 से 10 घोष इकाई (वाद्य दल) तैयार हो गई हैं।

मध्य भारत प्रान्त में घोष के उल्लेखनीय कार्यक्रम

नवम्बर 2021 में ग्वालियर में ‘स्वर साधक संगम’ घोष शिविर आयोजित किया गया था, जिसमें सम्पूर्ण प्रान्त के 27 जिलों से 500 से अधिक वादकों ने हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत भी उपस्थित रहे। इसी प्रकार, भोपाल के प्रताप जिले द्वारा अपना वार्षिकोत्सव ‘स्वर नाद संगम’ किया गया था, जिसमें कक्षा 4 से लेकर महाविद्यालयीन विद्यार्थियों द्वारा 5 भागों मे 29 रचनाओं का वादन प्रस्तुत किया गया। इनमें घोष विभाग की प्रथम लिखित रचना गणेश गोरखकल्याण, प्रसाद, जननी, हंसध्वनि तथा गीत जयोस्तुते, आर्यावर्त, ए मेरे प्यारे वतन, केशव रचना का मनमोहक आकृतियों के प्रदर्शन पर वादन किया गया।

संघ में घोष का क्या महत्व है, इस संदर्भ में सह सरकार्यवाह आलोक कुमार कहते हैं कि “संघ में घोष केवल वादन या मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह एक साधना है, जो मनुष्य को अनुशासन, समन्वय और राष्ट्रहित से जोड़ती है।” इसके साथ ही वेद मंत्र “सङ्गच्छध्वं संवदध्वं, सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे, संञ्जानाना उपासते।” का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि जब सभी मिलकर एक साथ चलते हैं तो केवल कदम ही नहीं, बल्कि मन भी एक हो जाते हैं। यही घोष साधना का उद्देश्य है- राष्ट्र को एक दिशा में, एक मन होकर आगे बढ़ाना।

(लेखक, मध्य भारत प्रांत घोष प्रमुख हैं।)

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