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संघ के 100 सालः बूंद-बूंद सागर बना

मनोज कुमार मिश्र

इस विजयादशमी को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्थापना के सौ स्वर्णिम साल पूरे हो गए। सौ साल पहले डाक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने अपने कुछ साथियों के साथ राष्ट्र जागरण के संकल्प के साथ संघ के रूप में एक दीप जलाया था। इन सौ सालों में वह अखंड ज्योति बन कर भारत की आत्मा को आलोकित कर रहा है। उसकी मजबूत उपस्थिति आज समाज के हर क्षेत्र में है। संघ के मौजूदा सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत ने कई बार दोहराया है कि संघ में सबकुछ परिवर्तनशील है, सिवाय इस मूल विश्वास के कि भारत हिन्दू राष्ट्र है।

संघ हिन्दू समाज को संगठित करने और उसे सामर्थ्यवान बनाने का काम कर रहा है। वह न तो किसी का तुष्टिकरण करता है न ही किसी से भेदभाव। संघ के आसपास बने विभिन्न संगठनों में कांग्रेस तो एक हद तक अपनी मौजूदगी बनाए हुए है लेकिन जिस नेता (महात्मा गांधी) के बूते उसे आजाद भारत की सत्ता मिली, उसके विचारों से जुड़ी संस्थाएं मृतप्राय हैं। समाजवादी दल तहस-नहस हो गए। वामदल तमाम टूट-फूट के बाद हाशिए पर पहुंच गए।

संघ ने इस सौ साल की यात्रा में तमाम मिथ्या आरोप झेले, तीन-तीन बार प्रतिबंधों का सामना किया और इन सभी बाधाओं को पार कर विश्व का सबसे बड़ा संगठन बना। संघ में निरंतरता बनी रही। इतना ही नहीं वह इस देश को परम वैभव पर पहुंचाने के अपने लक्ष्य के लिए लगातार काम कर रहा है। संघ ने समाज जीवन के हर क्षेत्र में मानक स्थापित करने वाले संगठन बनाए। वास्तव में उनका कार्यक्षेत्र संघ के सहयोग से संघ से भी बड़ा हो गया है।

अंग्रेजों के शासन से देश को देश को आजाद कराने के आंदोलन के समय अनेक संगठन वजूद में आए। कुछ क्रांतिकारी संगठन तो अपने नेता के न रहने पर या आजादी के साथ समाप्त हो गए लेकिन विचारधारा से जुड़े संगठन आगे भी चलते रहे। 1885 में कांग्रेस की स्थापना भले किसी और उद्देश्य से हुई हो लेकिन बाद में वह आजादी के आंदोलन का ध्वज वाहक बना। इसलिए समाजवादी दल, वाम (तब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी थी) दल या डाक्टर हेडगेवार और उनके साथी, सभी आजादी के आंदोलन में कांग्रेस के साथ ही सक्रिय थे। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की प्रेरणा से आजादी के आंदोलन में सक्रिय होकर डाक्टर हेडगेवार जेल गए लेकिन उनका कांग्रेस नेतृत्व से जल्दी ही मोहभंग हो गया।

डाक्टर हेडगेवार ने संघ के व्यक्ति निर्माण के काम को प्राथमिकता से करना जारी रखा। उनके साथ लोग जुड़ते गए और कारवां बढ़ता गया।

संघ की स्थापना 1925 में विजयादशमी के दिन हुई। कलकत्ता (अब कोलकता) से डाक्टरी की पढ़ाई कर के लौटे केशव बलिराम हेडगेवार ने अपने कुछ साथियों के साथ संघ की स्थापना की। वे देश के आजादी के आंदोलन में सक्रिय होकर जेल भी गए। 1940 में उनके निधन तक संघ की पहचान एक बड़े संगठन के तौर पर हो गई थी। उन्होंने अपना उत्तराधिकारी माधव सदाशिव गोलवरकर (गुरुजी) को बनाया, जो बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय(बीएचयू) में प्राणी विज्ञान के प्रोफेसर थे। उन पर अध्यात्म का प्रभाव ज्यादा था। वे 33 साल तक सरसंघचालक रहे। इस दौरान 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद मिथ्या आरोप में संघ पर 4 फरवरी को प्रतिबंध लगा और गुरुजी समेत बड़ी संख्या में संघ के कार्यकर्ता गिरफ्तार किए गए। 12 जुलाई, 1949 को संघ से प्रतिबंध हटा।

9 जुलाई, 1949 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् का गठन हुआ। परिषद् आज देश का सबसे बड़ा छात्र संगठन बना। उसने अपना घोष वाक्य बनाया-छात्र शक्ति, राष्ट्र शक्ति। 1936 में महिलाओं में काम करने के लिए राष्ट्र सेविका समिति बनी। 1955 में भारतीय मजदूर संगठन बना। संगठन के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी ने इसे न केवल देश का सबसे बड़ा संगठन बनाया। इसके साथ 44 फेडरेशन और 5300 यूनियन हैं। उन्होंने मजदूर संगठनों की नई परिभाषा बना दी। नया नारा दिया- देश हित में करेंगे काम, काम के लेंगे पूरे दाम। 3 दिसंबर, 1950 को राजनीतिक दल जनसंघ का गठन हुआ जो जनता पार्टी से अपनी यात्रा को पूरी करके 1980 में भाजपा बना। 1966 में विश्व हिन्दु परिषद बना। इसी तरह हर क्षेत्र में संगठन बने। संस्कार भारती, सेवा भारती, बनवासी कल्याण केन्द्र, भारतीय किसान संघ, स्वदेशी जागरण मंच, एकल विद्यालय, गो रक्षा, अधिवक्ता परिषद, नेशनल मेडिको आर्गनाईजेशन इत्यादि। आज 51 हजार स्थानों पर संघ की 83 हजार शाखाएं लग रही हैं। संघ से जुड़े 1,29,000 सेवा प्रकल्प शिक्षा, स्वास्थ से लेकर भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लक्ष्य पर काम कर रहे हैं। संघ की प्रेरणा से श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति महायज्ञ संपन्न हुआ। संघ की प्रेरणा से ही जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 समाप्त हुआ।

संघ की इस सौ साल की यात्रा में अनेक बाधाएं आई। अनेक प्रभावशाली पदाधिकारी और नेता, संघ से नाराज होकर अलग घर बैठ गए लेकिन किसी ने दूसरा संघ बनाने का प्रयास नहीं किया। संघ नेतृत्व की क्षमता के अनेक उत्कृष्ट उदाहरण मिलते हैं। गुरुजी के बाद अब तक सरसंघचालक का सबसे लंबा कार्यकाल बाला साहब (मधुकर दतात्रेय) देवरस का रहा। वे और संपूर्ण उत्तर भारत में संघ कार्य खड़ा करने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले उनके छोटे भाई भाऊराव (मुरलीधर दत्तात्रेय) देवरस 7 साल (1953 से 1960) तक संघ नेतृत्व से मतभेद के चलते घर लौट गए थे। गुरुजी ने उनसे संवाद बनाए रखा और उन्हें वापस लाकर पहले रेशम बाग में बन रहे डाक्टर साहब की समाधि निर्माण की जिम्मेदारी दी। फिर सह सरकार्यवाह और फिर सरकार्यवाह और 1973 में अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। वे अगले बीस साल तक संघ के सरसंघचालक रहे। इसी तरह दिल्ली में संघ काम खड़ा करने वाले वसंत राव ओक संघ से नाराज रहे लेकिन कोई नया संगठन नहीं बनाया। इस तरह से संघ के किसी पदाधिकारी से या किसी मुद्दे पर संघ से नाराज होने वालों की भी बड़ी संख्या है लेकिन न तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से संघ की आलोचना की और न ही कोई संगठन बनाया। इतना ही नहीं संघ से जुड़े संगठनों खास करके राजनीतिक दल जनसंघ या भाजपा से अनेक नेता अलग हुए। कुछ ने अपना दल भी बनाया लेकिन वे ज्यादा लंबा नहीं चल पाए।

यह बार-बार साबित हुआ कि संघ के नेताओं ने जिसे अपना उत्तराधिकारी बनाया वे न केवल उनके पदचिन्हों पर चले बल्कि कई मायने में नए कीर्तिमान बनाए। संघ पर दूसरा प्रतिबंध 4 जुलाई 1975 को लगा। सरसंघचालक बाला साहब देवरस समेत संघ के करीब सवा लाख कार्यकर्ता जेल गए। 1977 में संघ से प्रतिबंध हटा। जनता पार्टी की सरकार बनी। बाला साहब ने संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों के काम को देश के कोने-कोने में पहुंचाया। उन्होंने सेवा के काम को प्राथमिकता दी। उनका कहना था कि छूआछूत अगर पाप नहीं है तो दुनिया में कोई पाप नहीं है। इसी भावना को मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत ने आगे बढ़ाया। उन्होंने हिंदू समाज के लिए एक कुंआ, एक मंदिर और एक श्मशान का लक्ष्य रखा है।

तमाम अपवाहों को दरकिनार करते हुए बाला साहब ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर रहे राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। बाला साहब ने अपना कोई स्मारक न बनाने, नाम के साथ परम पूजनीय न लगाने और संघ के आयोजनों में पहले दोनों सरसंघचालकों के ही फोटो लगाने के निर्देश दिया। रज्जू भैया केवल छह साल सरसंघचालक रहे लेकिन उतने कम समय में भी उन्होंने समाज पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन उनके ही मार्गदर्शन में चला। 6 दिसंबर, 1992 को ढांचा टूटने पर संघ पर तीसरी बार 10 दिसंबर को प्रतिबंध लगा जो अदालती आदेश से 4 जून, 1993 को हटा। रज्जू भैया ने भी अपनी कोई समाधि न बनाने के आग्रह करते हुए जहां शरीर छूटा वहीं अंतिम संस्कार करने का आग्रह किया। दूसरे सरसंघचालक गुरुजी ने तो जीते जी अपना श्राद्ध कर लिया था ताकि किसी को परेशान न होना पड़े।

पांचवें सरसंघचालक के एस सुदर्शन ने अपने पूर्ववर्ती सरसंघचालकों के काम को आगे बढ़ाया। उन्होंने स्वदेशी का सर्वाधिक आग्रह किया जो अब केन्द्र सरकार का मुख्य एजेंडा बन गया है। उन्होंने भाजपा का नेतृत्व युवा हाथों में सौंपने का सुझाव दिया। मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत 2009 से सरसंघचालक हैं। उन्होंने कई नए मानक बनाए। उनका कहना है कि अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर से संघ जुड़ा था। मंदिर बनने के बाद किसी और मंदिर के लिए संघ आंदोलन नहीं करेगा लेकिन हिंदु मानस काशी और मथुरा भी चाहता है। इसका हिन्दु समाज आग्रह करेगा। लेकिन हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग न खोजने का भी उन्होंने आग्रह किया। संघ ने पंच परिवर्तन का आह्वान किया है। सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, कुटुंब प्रबोधन-परिवार मूल संस्थाएं, स्वदेशी और नागरिक कर्तव्य बोध।

संघ केन्द्र की भाजपा की अगुवाई वाली सरकार के 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करवाने में सहयोगी बना है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संघ के सौ साल पूरे होने पर संघ पर डाक टिकट और सिक्का जारी करके अपनी सहभागिता सुनिश्चित की। लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने मोदी लगातार संघ से अपने जुड़ाव और उसके कामकाज की सराहना करके संघ-भाजपा को एक बनाए रखने में सक्रिय भूमिका अदा कर रहे हैं। दोनों में बेहतर समन्वय बना हुआ है। बूंद-बूंद से सागर बनता है, यह संघ ने साबित कर दिया। अब संघ महा सागर बनने की दिशा में है।

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