नई दिल्ली। सिंधु जल संधि को लेकर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की पाकिस्तान की कोशिशों को उस समय बड़ा झटका लगा, जब कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इस्लामाबाद में हुई संयुक्त प्रेस वार्ता में पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने भारत के फैसले का विरोध करते हुए कनाडा से समर्थन मांगा, लेकिन अनीता आनंद ने इस विषय पर कोई टिप्पणी करने से परहेज किया।
कौन हैं अनीता आनंद?
अनीता आनंद कनाडा सरकार में विदेश मंत्री हैं और देश की प्रमुख राजनीतिक हस्तियों में शामिल मानी जाती हैं। इससे पहले वह रक्षा मंत्री, सार्वजनिक सेवा मंत्री और ट्रेजरी बोर्ड की अध्यक्ष जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुकी हैं।
भारतीय मूल से जुड़ी अनीता आनंद का जन्म कनाडा में हुआ था। उनके माता-पिता भारत से कनाडा जाकर बसे थे। उनकी मां का संबंध पंजाब से और पिता का तमिलनाडु से रहा है। दोनों पेशे से डॉक्टर थे और बाद में कनाडा में बस गए।
पाकिस्तान ने क्यों लगाई गुहार?
इस्लामाबाद में आयोजित संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इशाक डार ने सिंधु जल संधि का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कनाडा से आग्रह किया कि वह भारत पर दबाव बनाए ताकि संधि को फिर से लागू कराया जा सके। डार ने आरोप लगाया कि भारत पानी का इस्तेमाल दबाव बनाने के साधन के रूप में कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का पालन नहीं कर रहा।
पाकिस्तान की कोशिश थी कि कनाडा जैसे प्रभावशाली देश का समर्थन मिल जाए, जिससे वह इस मुद्दे को वैश्विक मंचों पर और मजबूती से उठा सके।
लेकिन कनाडा ने साध ली चुप्पी
पाकिस्तान की अपील के बावजूद अनीता आनंद ने प्रेस वार्ता में सिंधु जल संधि पर कोई बयान नहीं दिया। बाद में कनाडा सरकार की ओर से जारी आधिकारिक बयान में भी इस मुद्दे का उल्लेख नहीं किया गया। इसे पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक निराशा के रूप में देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कनाडा इस विवाद में किसी एक पक्ष का सार्वजनिक समर्थन करने से बचना चाहता है, खासकर ऐसे समय में जब वह भारत के साथ अपने संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में भी प्रयास कर रहा है।
क्या है सिंधु जल संधि?
सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी। इसके तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के जल का बंटवारा तय किया गया था। रावी, ब्यास और सतलुज का उपयोग भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकांश जल पाकिस्तान के हिस्से में गया। भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित सिंचाई, जलविद्युत और गैर-उपभोग परियोजनाएं संचालित करने का अधिकार भी दिया गया।
भारत ने क्यों रोकी संधि?
अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया। नई दिल्ली का कहना है कि सीमा पार आतंकवाद जारी रहने की स्थिति में पुराने स्वरूप में इस समझौते को लागू रखना संभव नहीं है।
भारत का यह भी तर्क है कि 1960 में बनी संधि वर्तमान परिस्थितियों, बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन और नई जल आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं रह गई है। इसलिए भविष्य में यदि इस पर आगे बढ़ा भी जाता है तो मौजूदा प्रावधानों की समीक्षा आवश्यक होगी।
पाकिस्तान के लिए बढ़ी कूटनीतिक चुनौती
अनीता आनंद की ओर से कोई समर्थन नहीं मिलने से पाकिस्तान की उस रणनीति को झटका लगा है, जिसके तहत वह सिंधु जल संधि के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना चाहता है। दूसरी ओर भारत लगातार यह रुख दोहरा रहा है कि आतंकवाद और सामान्य द्विपक्षीय संबंध साथ-साथ नहीं चल सकते।
ऐसे में फिलहाल पाकिस्तान को इस मुद्दे पर वैश्विक स्तर पर वैसा समर्थन मिलता नहीं दिख रहा है, जिसकी उसे उम्मीद थी। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि सिंधु जल संधि का विवाद केवल जल बंटवारे का नहीं, बल्कि व्यापक कूटनीतिक और सुरक्षा चिंताओं से भी जुड़ चुका है।
