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बड़ा मायने है पर्यटन में मध्‍य प्रदेश का वैश्‍विक रूप से हृदय जीत लेना !

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

मध्य प्रदेश ने पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह पर्यटन के क्षेत्र में अपनी सशक्त पहचान बनाई है, वह नीतियों और प्रचार अभियानों के साथ दृष्टि और निरंतरता का प्रतीक है। भारत के हृदय में स्थित यह प्रदेश आज देश-विदेश के यात्रियों के लिए भरोसे और अनुभव दोनों का केन्द्र बन गया है। महामारी के बाद जब वैश्विक पर्यटन उद्योग पुनर्जीवन की राह खोज रहा था, तब मध्यप्रदेश ने योजनाबद्ध ढंग से अपनी साख दोबारा कायम की।

पर्यटन के हर आयाम में यहां नई हलचल दिख रही है। कभी विरासत और वन्यजीव के लिए पहचाने जाने वाला यह प्रदेश आज वेडिंग, एमआईसीई, फिल्म और ग्रामीण पर्यटन जैसे क्षेत्रों में देशव्यापी अग्रणी भूमिका निभा रहा है। भोपाल में हुए एमआईसीई एवं वेडिंग टूरिज्म सम्मेलन में देशभर के विशेषज्ञों ने माना है कि मध्यप्रदेश आयोजनों का नया केन्द्र बनकर उभर रहा है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि राज्य भौगोलिक रूप से देश के मध्य में है, जहां सड़क, रेल और हवाई मार्ग से सुगमता है, साथ ही यहां के शहर आधुनिक सुविधाओं और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम हैं।

खजुराहो, महेश्वर, मांडू, पचमढ़ी और भोपाल जैसे शहर अब विवाह समारोहों और कॉर्पोरेट इवेंट्स के लिए नई पसंद बन रहे हैं। पारंपरिक स्थापत्य, शांत परिवेश और उत्कृष्ट आतिथ्य ने इन्हें विशिष्ट पहचान दी है। इस उभार के पीछे प्रशासनिक दक्षता और निजी क्षेत्र के साथ सरकार की साझेदारी की नई सोच है। आज जो सामने से दिखाई दे रहा है, वह यह है कि मध्यप्रदेश की कोशिश अब केवल आयोजन करवाने तक सीमित नहीं, हर आयोजन को सांस्कृतिक अनुभव में बदलने की है।

वेडिंग टूरिज्म ने जहां स्थानीय कारीगरों, संगीतज्ञों और सेवा क्षेत्र को नए अवसर दिए हैं, वहीं यह संस्कृति और परंपरा के जीवंत प्रदर्शन का मंच भी बना है। मांडू के ऐतिहासिक महलों में संगीत की ध्वनियाँ और महेश्वर के घाटों पर नर्मदा की लहरों के बीच विवाह समारोह, प्रदेश के सांस्कृतिक आत्मविश्वास के नए प्रतीक हैं। पर्यटन विभाग का मानना है कि हर विवाह आयोजन राज्य की जीवंत संस्कृति का दर्पण है।

इसी तरह फिल्म पर्यटन भी मध्यप्रदेश की पहचान का मजबूत स्तंभ बन चुका है। भोपाल, महेश्वर, पचमढ़ी, जबलपुर और ग्वालियर जैसे शहर अब फिल्मकारों के प्रिय स्थल हैं। यहां की फिल्म नीति ने शूटिंग प्रक्रिया को सरल बनाया है और स्थानीय कलाकारों के लिए नए अवसर खोले हैं। फिल्मों और वेब सीरीज़ की शूटिंग से इन इलाकों में रोजगार बढ़ा है, साथ ही पर्यटन को नया जीवन मिला है।

अपर मुख्य सचिव पर्यटन व संस्कृति एव प्रबंधन संचालक मध्य प्रदेश टूरिज्म बोर्ड शिवशेखर शुक्ला कहते भी है कि राज्‍य अब एक विविधतापूर्ण, बहुआयामी और ऑफबीट पर्यटन गंतव्य के रूप में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बना रहा है। यहां विरासत, वन्यजीवन, रोमांच, संस्कृति, कला, हस्तशिल्प और पाक-परंपराओं का अनूठा संगम देखने को मिलता है। मध्यप्रदेश की सीमा से लगे अन्य राज्य जैसे छत्तीसगढ़ से राम वन पथ गमन सर्किट, महाराष्ट्र के साथ ज्योर्तिलिंग सर्किट जैसे संयुक्त कार्यों पर काम किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त टाइगर कॉरिडोर, फिल्म पर्यटन और ईको टूरिज्म के साझा विकास की संभावना भी तलाशी जा सकती है। ऐसे अनेक प्रयासों ने प्रदेश के टूरिज्‍म को आज एक नई गति दी है।

यही कारण है कि राज्य ने अंतरराज्यीय सहयोग की दिशा में भी उल्लेखनीय पहल की है। राजस्थान, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के साथ साझा पर्यटन परिपथ विकसित किए जा रहे हैं, कहीं हेरिटेज सर्किट, कहीं वाइल्डलाइफ या जनजातीय सर्किट। इससे यात्रियों को विविध अनुभव मिलेंगे और क्षेत्रीय पर्यटन को गति मिलेगी। यह सहयोगी दृष्टिकोण दिखाता है कि मध्यप्रदेश पर्यटन को स्थानीय या सीमित अर्थों में नहीं, व्यापक भारतीय परिप्रेक्ष्य में देख रहा है।

कहना होगा कि विरासत संरक्षण और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाना इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है। राज्य में 498 राज्य संरक्षित, 290 एएसआई संरक्षित स्मारक और तीन यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं। इन धरोहरों को संरक्षित रखते हुए आधुनिक पर्यटन सुविधाओं का समावेश किया गया है। भोपाल और ग्वालियर का यूनेस्को क्रिएटिव सिटी नेटवर्क में शामिल होना इस दिशा में ऐतिहासिक कदम है। भोपाल अपने संग्रहालयों, झीलों और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए अंतरराष्ट्रीय पहचान बना रहा है, जबकि ग्वालियर अपनी संगीत परंपरा और स्थापत्य वैभव के साथ नए सिरे से पर्यटकों को आकर्षित कर रहा है।

राज्य की नीतियों में सतत पर्यटन प्रमुख तत्व के रूप में उभरा है। ग्रामीण और ईको-टूरिज्म पर ध्यान देकर मध्यप्रदेश ने पर्यटन को स्थानीय समुदायों से जोड़ा है। सतपुड़ा, कान्हा, बांधवगढ़ और पेंच जैसे वनक्षेत्रों में अब ईको-लॉज और कम्युनिटी-बेस्ड टूरिज्म के मॉडल फलफूल रहे हैं। गांवों में होम-स्टे की पहल से यात्रियों को स्थानीय जीवन, भोजन और संस्कृति का अनुभव मिलता है। यह पर्यटन का नया चेहरा है और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दिशा में बढ़ता कदम भी है।

महामारी के बाद जब वैश्विक पर्यटक दोबारा यात्रा के लिए तैयार हो रहे थे, तब मध्यप्रदेश ने उन्हें भरोसे का कारण दिया। बेहतर स्वास्थ्य सुरक्षा, स्वच्छ गंतव्य और सहज नीतियों ने इसे पुनः विश्वसनीय बनाया। एफआईसीसीआई जैसे राष्ट्रीय निकायों के साथ साझेदारी, फिल्म और एमआईसीई टूरिज्म पर केंद्रित प्रयासों ने निवेशकों और आयोजकों का विश्वास जीता है। पर्यटन एवं संस्कृति विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ने हाल में कहा कि “हमारा लक्ष्य केवल पर्यटक संख्या बढ़ाना नहीं, ऐसा अनुभव देना है जो यादों में बस जाए।” यही दृष्टि राज्य के पर्यटन विकास का आधार बन गई है।

पर्यटन अब मध्य प्रदेश में यात्रा नहीं, भावनाओं और आत्मीयता का अनुभव है। महेश्वर के घाटों से उठती आरती की लौ, खजुराहो के मंदिरों की नक्काशी, पचमढ़ी के जंगलों की नमी और भोपाल की झीलों में उत्‍साह से आती लहरें, इन सबमें वह भरोसा झलकता है जो किसी भी गंतव्य को जीवंत बनाता है। यही वह भरोसा है जिसने मध्यप्रदेश को भारत का नहीं, विश्व पर्यटन का भी हृदय बना दिया है।

आज जब दुनिया के तमाम देश अपने पर्यटन मॉडल को स्थायी और समावेशी बनाने की दिशा में सोच रहे हैं, तब मध्यप्रदेश अपने अनुभव से एक नया उदाहरण पेश कर रहा है, जहां विरासत जीवित है, आधुनिकता शामिल है और प्रकृति सुरक्षित है। यह विकास की कहानी है और उस संवेदनशील दृष्टि की मिसाल है जिसने पर्यटन को आर्थिक गतिविधि से आगे, विश्वास और आत्मगौरव की यात्रा बना दिया है।

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