अनुसूचित जाति आरक्षण और मतांतरण: संवैधानिक सीमाएँ, न्यायिक दृष्टिकोण
-कैलाश चन्द्र
भारत का संवैधानिक ढाँचा अनुसूचित जातियों (एससी) को उन ऐतिहासिक सामाजिक विषमताओं से उबारने के लिए विशेष संरक्षण और आरक्षण प्रदान करता है, जो सदियों से चले आ रहे अस्पृश्यता, बहिष्कार और जातिगत उत्पीड़न से उत्पन्न हुई हैं। यह व्यवस्था केवल आर्थिक पिछड़ेपन का समाधान नहीं है बल्कि एक गहरे सामाजिक अन्याय के प्रतिकार के रूप में विकसित की गई है। इसी कारण अनुसूचित जाति का दर्जा मूलतः उस सामाजिक-धार्मिक संरचना से जुड़ा माना गया है, जिसमें यह उत्पीड़न उत्पन्न हुआ अर्थात पारंपरिक हिंदू सामाजिक व्यवस्था।
संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुसार एससी का दर्जा प्रारंभ में केवल हिंदुओं तक सीमित था, जिसे बाद में संशोधनों के माध्यम से सिख (1956) और बौद्ध (1990) समुदायों तक विस्तारित किया गया। इस व्यवस्था के अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति, जो मूलतः एससी समुदाय से आता है, इस्लाम या ईस...









