नई दिल्ली। भारत में जल्द ही सैटेलाइट आधारित इंटरनेट सेवा शुरू होने की तैयारी है। इसके जरिए उन इलाकों में भी हाईस्पीड इंटरनेट पहुंच सकेगा, जहां फाइबर केबल बिछाना मुश्किल है। इस क्षेत्र में रिलायंस जियो, एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की स्टारलिंक और एयरटेल समर्थित वनवेब को सरकार से लाइसेंस मिल चुका है। हालांकि, भारत में इन सेवाओं की शुरुआत और टैरिफ को लेकर अभी अंतिम घोषणा नहीं हुई है।
भारत में फिलहाल जियो और एयरटेल जैसी कंपनियां फाइबर केबल के जरिए इंटरनेट उपलब्ध करा रही हैं। इन कंपनियों के शुरुआती ब्रॉडबैंड प्लान करीब 599 रुपये मासिक से शुरू होते हैं, जिनमें 100 एमबीपीएस तक की स्पीड मिलती है। दूसरी ओर, सैटेलाइट इंटरनेट की कीमतों को लेकर उपभोक्ताओं में उत्सुकता है। इसकी लागत और इंस्टॉलेशन प्रक्रिया तय करेगी कि भारतीय बाजार में यह सेवा कितनी लोकप्रिय होती है।
स्टारलिंक का विदेशी प्लान फाइबर से कई गुना महंगा
भारत में स्टारलिंक की सेवा की कीमत अभी घोषित नहीं हुई है। हालांकि, अमेरिका के शिकागो में कंपनी का शुरुआती रेजिडेंशियल प्लान 60.50 डॉलर यानी करीब 5,600 रुपये प्रतिमाह बताया गया है। इसमें 100 एमबीपीएस की स्पीड उपलब्ध है। इस हिसाब से यह भारत में मिलने वाले 599 रुपये के शुरुआती फाइबर प्लान से काफी महंगा है। हालांकि, विदेशी बाजार की कीमतों को सीधे भारतीय टैरिफ का आधार नहीं माना जा सकता।
इंस्टॉलेशन में भी होगा अंतर
फाइबर इंटरनेट कनेक्शन में कंपनियां कई बार तीन महीने के प्लान के साथ इंस्टॉलेशन शुल्क माफ कर देती हैं। वहीं, सैटेलाइट इंटरनेट के लिए घर की छत या खुले स्थान पर विशेष टर्मिनल लगाना होगा, जो सीधे सैटेलाइट से सिग्नल प्राप्त करेगा।
स्टारलिंक के अमेरिकी पोर्टल पर हार्डवेयर की लागत शून्य बताई गई है, लेकिन सेवा बंद करने पर उपकरण लौटाना होगा। कंपनी के अनुसार, प्रोफेशनल इंस्टॉलेशन का शुल्क 99 डॉलर यानी करीब 9,000 रुपये है। भारत में इसकी वास्तविक लागत और शर्तें कंपनी की सेवा शुरू होने के बाद ही स्पष्ट होंगी।
कैसे काम करेगा सैटेलाइट इंटरनेट?
सैटेलाइट इंटरनेट में पृथ्वी की निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) में स्थापित कई उपग्रह मिलकर नेटवर्क तैयार करते हैं। ये उपग्रह इंटरनेट सिग्नल को जमीन पर लगे टर्मिनल तक पहुंचाते हैं। घर की छत पर लगाया जाने वाला टर्मिनल सिग्नल प्राप्त करता है और केबल के माध्यम से वाई-फाई राउटर से जुड़ता है। इसके बाद घर के भीतर मोबाइल, लैपटॉप और अन्य उपकरणों पर इंटरनेट इस्तेमाल किया जा सकता है।
स्टारलिंक इसी तकनीक के माध्यम से अमेरिका सहित कई देशों में इंटरनेट सेवा उपलब्ध करा रही है। इसकी खासियत यह है कि इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए हर जगह जमीन पर फाइबर केबल बिछाने की आवश्यकता नहीं होती।
पहाड़ी और सीमावर्ती इलाकों को होगा फायदा
सैटेलाइट इंटरनेट का सबसे अधिक लाभ उन क्षेत्रों को मिल सकता है, जहां भौगोलिक परिस्थितियों के कारण पारंपरिक इंटरनेट नेटवर्क पहुंचाना कठिन है। पहाड़ी, सीमावर्ती और दूरदराज के गांवों में रहने वाले लोगों को इससे बेहतर कनेक्टिविटी मिल सकती है। विद्यार्थियों को ऑनलाइन पढ़ाई, कारोबारियों को डिजिटल सेवाओं और स्थानीय संस्थानों को इंटरनेट आधारित सुविधाओं का लाभ मिल सकेगा।
भारतीय बाजार में कीमत होगी सबसे बड़ी चुनौती
भारत में इंटरनेट सेवाएं दुनिया के कई बाजारों की तुलना में सस्ती हैं। जियो और एयरटेल जैसी कंपनियों का फाइबर नेटवर्क पहले से बड़ा उपभोक्ता आधार रखता है। ऐसे में सैटेलाइट इंटरनेट कंपनियों के सामने कीमत को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने की चुनौती होगी।
सैटेलाइट इंटरनेट उन क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण विकल्प बन सकता है, जहां फाइबर कनेक्टिविटी उपलब्ध नहीं है। हालांकि, शहरी क्षेत्रों में पहले से सस्ती ब्रॉडबैंड सेवाओं के बीच यह कितना प्रतिस्पर्धी होगा, इसका फैसला भारतीय टैरिफ और उपकरणों की कीमत सामने आने के बाद ही होगा।
