
कोलकाता के मां दक्षिणेश्वर काली की आत्मा सहरसा जिला के कहरा प्रखंड अंतर्गत स्थित चैनपुर गांव के अदि काली मंदिर के पिंडी में भी बसती है। यहाँ काली पूजा का इतिहास 156 वर्ष पुराना है और परंपरा में कोलकाता की मां दक्षिणेश्वर की आभा को महसूस किया जाता है। सालों भर यहाँ के भक्त पिंडी दर्शन व पूजा कर आध्यात्मिक उर्जा से अभिभूत होते रहते हैं।
चैनपुर में काली पूजा की परंपरा 1870 से है। उस वर्ष, गाँव निवासी साधक सिंहेश्वर दत्त ठाकुर द्वारा कोलकाता के मां दक्षिणेश्वर काली मंदिर की पिंडी की मिट्टी लेकर चैनपुर के पछवारी टोला में प्राण-प्रतिष्ठा की गई। इसके बाद अमृतनाथ झा ने पूजा पद्धति बनाकर विधिवत पूजा-अराधना प्रारंभ की। ग्रामीणों का कहना है कि दक्षिणेश्वर काली का कोलकाता में भी 1847 में मंदिर निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ था।

मां काली के जन्म के साथ ही भक्तों का भक्ति भाव और पूजा-अर्चना में जुट जाना अनिवार्य है। काली पूजा और छागर बलि की अद्भुत परंपरा यहाँ प्रचलित है, और प्रत्येक वर्ष वैदिक रीति-रिवाज के अनुसार पूजा-अराधना की जाती है। जन्म के दूसरे दिन मेला और तीसरे दिन ग्राम भ्रमण कर मूर्ति विसर्जन किया जाता है।
वहीं, श्रीश्री 108 श्री नीलकंठ काली पूजा समिति चैनपुर ने 1972 में एक अलग स्थान पर मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा की। यह संस्था 54 वां स्थापना दिवस मना रही है। यहाँ के मूर्तिकार संजय खां पिछले 30 वर्षों से मूर्ति बनाते आ रहे हैं।
मूरतिकार की परंपरा भी समृद्ध है। चैनपुर के भायलाल झा ने प्रथम मूर्ति बनाई, जिसके बाद मधुबनी जिले के मधेपुर के बतहु पंडित ने निर्माण शुरू किया। उनके वंशजों में पुत्र शिवजी पंडित और फिर पुत्र रामप्रसाद पंडित ने आकर्षक और कलात्मक मूर्ति बनाती रही। वर्तमान में रामप्रसाद पंडित नई मूर्ति बना रहे हैं, जिससे यह परंपरा जारी है।
