
नई दिल्ली, 26 अक्टूबर (प्रेस ब्यूरो)। उच्चतम न्यायालय की वह पीठ, जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस सूर्यकांत कर रहे हैं, ने श्री सरयू नगर विकास समिति द्वारा दायर की गई याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रखा है। इस याचिका में अयोध्या में प्रस्तावित एक विस्तृत आवासीय योजना के तहत भूमि अधिग्रहण को चुनौती दी गई थी, और अदालत ने इस मुद्दे को अभी के लिए स्थगित करने का आदेश दिया है।
पिछले कुछ हफ्तों में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने 6 अगस्त को उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद को निर्देश दिया था कि वह उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद अधिनियम के अंतर्गत अनिवार्य भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में मुआवजा, पुनर्वास और पुनर्स्थापन के सभी लाभ स्पष्ट रूप से निर्धारित करे। कोर्ट ने इस प्राधिकरण से कहा था कि वह अपने पूर्वनिर्णय में स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप इन पहलुओं को निपटाने के लिए आवश्यक कदम उठाए। इसमें भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार कानून में वर्णित प्रावधानों को भी लागू किया जाना सम्मिलित था।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि अधिकारी जब भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार कानून के तहत निर्धारित सुरक्षा उपायों को नजरअंदाज़ करते हैं, तो प्रभावित भूमि मालिकों को केवल मौद्रिक मुआवजे तक सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन, पहले से अर्जित भूमि के उपयोग के प्रावधान, तथा बहु‑फसली कृषि भूमि के अधिग्रहण के नियमों को भी पूरी तरह से लागू किया जाना चाहिए, ताकि प्रभावित किसानों और जमीन मालिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।
इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय अयोध्या में चल रहे आवासीय प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को कानूनी रूप से अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अदालत ने सभी पक्षकारों को आगे के निर्देशों के लिए तैयार रहने और लागू नियमों का सख्ती से पालन करने का आह्वान किया है।
