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हर समारोह में वंदे मातरम् के सभी अंतरे बजाने को अनिवार्य करना तर्कसंगत नहीं : शशि थरूर

नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद शशि थरूर (Congress MP Shashi Tharoor) ने वंदे मातरम् (VANDAM MATARAM) के गायन को लेकर चल रही बहस के बीच बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी आधिकारिक कार्यक्रम की शुरुआत और समापन पर राष्ट्रीय गीत के सभी पांच पदों का गायन करवाना उचित नहीं लगता। संवाददाताओं से बात करते हुए थरूर ने कहा कि वंदे मातरम का सभी सम्मान करते हैं, लेकिन हर समारोह में इसके सभी अंतरे बजाने को अनिवार्य करना तर्कसंगत नहीं है।


कांग्रेस सांसद ने कहा, “वंदे मातरम राष्ट्रगीत है और जब इसे गाया जाता है तो हम सम्मानपूर्वक खड़े हो जाते हैं। इसका पहला अंतरा या शुरुआती दो अंतरे, ज्यादातर लोगों को मुंह जुबानी याद होते हैं।” थरूर ने बताया कि परंपरागत रूप से यह गीत किसी कार्यक्रम की शुरुआत में एक बार गाया जाता है, जबकि राष्ट्रगान अलग से, अक्सर अंत में बजाया जाता है।


उन्होंने कहा, “अब वे चाहते हैं कि हर कार्यक्रम की शुरुआत में और अंत में पांचों अंतरे गाए जाएं। मुझे लगता है कि यह एक अनावश्यक थोपा हुआ नियम है।” थारूर ने इस बात पर जोर दिया कि उन्हें राष्ट्रगीत से कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा, “हम सभी वंदे मातरम का सम्मान करते हैं। मैं खुशी-खुशी इसे आपके लिए गा सकता हूं।”


राज्य सरकार और राज्यपाल के रुख में अंतर का संकेत
कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य थरूर ने कहा कि केरल सरकार का रुख यह रहा है कि वंदे मातरम् का पूरा संस्करण गाना वैकल्पिक है। वहीं, उन्होंने संकेत दिया कि राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर की राय इससे अलग दिखाई देती है। थरूर के मुताबिक, इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय की आवश्यकता पड़ सकती है क्योंकि संसद द्वारा ऐसा कोई कानून पारित नहीं किया गया है जो हर कार्यक्रम में पूरे गीत के गायन को अनिवार्य बनाता हो। उन्होंने इसे मुख्य रूप से परंपरा और प्रचलन से जुड़ा विषय बताया।


‘राष्ट्रीय गीत से कोई आपत्ति नहीं’
थरूर ने स्पष्ट किया कि उन्हें वंदे मातरम् से कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा कि सभी भारतीय इस राष्ट्रीय गीत का सम्मान करते हैं और वह स्वयं भी इसे खुशी से गा सकते हैं। उन्होंने एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए बताया कि नई दिल्ली में आयोजित उस कार्यक्रम में, जिसमें उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन मौजूद थे, वंदे मातरम् का पूरा संस्करण कार्यक्रम की शुरुआत और अंत दोनों समय बजाया गया था।


‘दर्शकों के लिए यह व्यावहारिक चुनौती बन जाती है’
थरूर का कहना था कि अपेक्षाकृत लंबा और कम परिचित गीत जब एक ही कार्यक्रम में दो बार सुनाया जाता है तो दर्शकों के लिए लंबे समय तक खड़े रहना एक मुद्दा बन सकता है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक आयोजनों में परंपरागत रूप से वंदे मातरम् का वही हिस्सा गाया जाता रहा है जिसकी अवधि लगभग राष्ट्रीय गान के बराबर होती है। यह स्वरूप लंबे समय से व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता रहा है और लोगों द्वारा सम्मानित भी है।


विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान निकलने की उम्मीद
इस पूरे विवाद को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए थरूर ने उम्मीद जताई कि इसका समाधान आपसी समझ और सौहार्द के साथ निकलेगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पदाधिकारियों की मौजूदगी वाले विशेष औपचारिक कार्यक्रमों में एक बार पूरा गीत गाए जाने को समझा जा सकता है। हालांकि, किसी छोटे कार्यक्रम में पूरे वंदे मातरम् का दो बार गायन करवाने के पीछे उन्हें कोई स्पष्ट तर्क नजर नहीं आता। उनके अनुसार यह व्यवस्था न तो विशेष रूप से व्यावहारिक है और न ही बहुत प्रभावी।

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