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इतिहास का इतिहास

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By: हृदयनारायण दीक्षित इतिहास का इतिहास - हृदयनारायण दीक्षित गाँधीजी जीवित होते तो आज 156 साल के होते। परसों उनकी पुण्यतिथि थी। वे बहुत गहराई से याद किए गए। उन्होंने विश्व इतिहास में हस्तक्षेप किया और काल की अखण्ड सत्ता को प्रभावित किया। काल है भी अखण्ड सत्ता। सारी घटनाएं समय के भीतर होती हैं। अथर्ववेद (19.53-54) में भृगु कहते हैं “काल-अश्व विश्व-रथ का संवाहक है। काल ही पिता है, वही आगे पुुत्र होता है। काल में प्राण हैं, मन हैं, सारे नाम हैं, काल की अनुकूलता ही आनंद है। काल स्वयंभू है। काल के द्वारा ही भूत और भविष्य पैदा हुए हैं आदि आदि।” समय पकड़ में नहीं आता। घटनाएं घटती हैं, घटना अतीत है। अतीत की घटनाओं का यथातथ्य संकलन इतिहास है। प्राचीन राष्ट्र की घटनाएं करोड़ों की संख्या में होती हैं। भारत ऐसा ही राष्ट्र है। मूलभूत प्रश्न है कि घटनाओं के संकलन में संकलनकर्ता की रूचि क्या है...
प्रतिभा पलायन के बीच ईयू ट्रेड डील का लाभ लेने को हम कितने तैयार हैं!

प्रतिभा पलायन के बीच ईयू ट्रेड डील का लाभ लेने को हम कितने तैयार हैं!

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By: डॉ. मयंक चतुर्वेदी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत-यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) को परिवर्तनकारी समझौता कहा है। वहीं यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा, इस फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से हर साल करीब 4 अरब यूरो (43 हजार करोड़ रुपये) के टैरिफ कम होंगे और लाखों लोगों के लिए रोजगार के नए मौके बनेंगे। इस वक्‍त भारत और ईयू मिलकर वैश्विक जीडीपी का करीब 25 फीसद और दुनिया के कुल व्यापार का लगभग एक-तिहाई सा अपने पास रखते हैं। कहा जा रहा है कि यह समझौता व्यापार संबंधों में विविधता लाने और अमेरिका और चीन पर निर्भरता कम करने में मदद करेगा, इससे हर साल ड्यूटी में चार अरब यूरो की बचत होगी। अब ये बचत वास्‍तव में कितनी सच होगी ये आनेवाला वक्‍त बताएगा, किंतु आज बड़ा सवाल है कि हम चीन की तुलना में ईयू को अपना सामान बेचने के लिए कितने तैयार हैं। इसके लिए जो ...
संत रविदास ने दिया भगवान श्रीराम की भक्ति का संदेश

संत रविदास ने दिया भगवान श्रीराम की भक्ति का संदेश

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By: डॉ. आनंद सिंह राणा "संत रविदास ने दिया भगवान श्रीराम की भक्ति का संदेश " -डॉ. आनंद सिंह राणा मध्ययुगीन भक्ति चेतना के प्रमुख संतों में संत रविदास जी का नाम श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। वे केवल मात्र संत अथवा भक्तों के रूप में ही प्रतिष्ठित नहीं है, अपितु उनका व्यक्तित्व समाज सुधारक, क्रांतिकारी, चिंतक, उत्कृष्ट युग-पुरुष के रूप में अभिव्यक्त हुआ है। ऐसे महामानव के जीवन चरित्र ने वर्तमान समाज को एक नई ज्योति प्रदान की है। उनकी पूर्ण प्रामाणिक एवं सर्वप्रथम प्रकाशित वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में उपलब्ध होती है। संत रविदास जी का नाम विभिन्न ग्रंथों में अलग-अलग रूप में उपलब्ध होता है। उनके प्रचलित नामों में रविदास, रैदास रोहतास, रोहीदास, रामदास, रुईदास आदि उल्लेखनीय हैं। रामानंद संप्रदाय में मान्य ग्रंथ भक्तमाल में उन्हें रविदास के नाम से अभिहित किया गया है। वर्तमान समय में अन्...
समाज के लिए सर्वस्व समर्पण करने वाली बुधरी ताती

समाज के लिए सर्वस्व समर्पण करने वाली बुधरी ताती

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By: प्रियंका कौशल बुधरी ताती, ये नाम शायद आपने पहले ना सुना हो। लेकिन दक्षिण बस्तर में बुधरी ताती महिला सशक्तिकरण का दूसरा नाम है। उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री देने की घोषणा की है। दक्षिण बस्तर यानि दंतेवाड़ा से अबूझमाड़ तक फैला धुर नक्सल प्रभावित इलाका। एक ऐसा इलाका जहां चप्पे-चप्पे पर मौत अपना शिकार ढूंढती थी। बारूद, गोली, एनकाउंटर, पुलिस-नक्सली संघर्ष वाले इस क्षेत्र में बुधरी ताती 80 के दशक से शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और आत्मनिर्भरता की अलख जगा रही हैं। 1985 में 12 आदिवासी बच्चों के छात्रावास को प्रारंभ कर अपने सामाजिक जीवन की शुरुआत करने वाली बुधरी ताती ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा जिले के छोटे से गांव हीरानार निवासी बुधरी ताती का जन्म 15 सितम्बर 1966 को हुआ। समाज सेवा का जुनून ऐसा कि 15 साल की उम्र से ही परिजनों की मनाही के बावजूद दूसरों की मदद करना श...
भारत का निम्न मध्यम आय से उच्च मध्यम आय श्रेणी में अग्रसर होना

भारत का निम्न मध्यम आय से उच्च मध्यम आय श्रेणी में अग्रसर होना

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By: प्रहलाद सबनानी भारत आज अपने आर्थिक इतिहास के एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर चुका है। पिछले कुछ दशकों के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में जिस गति से परिवर्तन और विस्तार देखने को मिला है, उसने न केवल देश के आर्थिक ढांचे को सुदृढ़ किया है बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति को भी नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। यही कारण है कि आने वाले वर्षों में भारत के निम्न मध्यम आय श्रेणी से उच्च मध्यम आय श्रेणी में परिवर्तित होने की प्रबल संभावना व्यक्त की जा रही है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत को निम्न आय श्रेणी से बाहर निकलकर निम्न मध्यम आय श्रेणी में पहुँचने में लगभग 60 वर्षों का समय लगा। वर्ष 1962 में भारत की प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय मात्र 90 अमेरिकी डॉलर थी, जो मिश्रित वार्षिक 5.3 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ वर्ष 2007 में बढ़कर 910 अमेरिकी डॉलर हो गई। इसी वर्ष भारत को विश्व बै...
संस्कारित परिवार: जागरूक नागरिक, समरस समाज और संवेदनशील राष्ट्र निर्माण की मूल धुरी

संस्कारित परिवार: जागरूक नागरिक, समरस समाज और संवेदनशील राष्ट्र निर्माण की मूल धुरी

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By: कैलाश चन्द्र संस्कारित परिवार: जागरूक नागरिक, समरस समाज और संवेदनशील राष्ट्र निर्माण की मूल धुरी -कैलाश चन्द्र भारतीय समाज की रचना में परिवार केवल रक्त-संबंधों का केंद्र नहीं बल्कि एक जीवंत संस्कृति, अनुशासन और भविष्य का निर्माण करने वाली संस्था है। जब दुनिया व्यक्तिगतता, उपभोक्तावाद और क्षणिक सुख की संस्कृति में उलझकर अपने मूल्यों से दूर जा रही है, तब हमारे लिए यह समझना अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि राष्ट्र-निर्माण किसी एक नीति, किसी एक नेतृत्व या किसी एक विचारधारा से नहीं चलता; उसका वास्तविक केंद्र परिवार होता है। परिवार ही वह स्थान है जहाँ भविष्य की पीढ़ियाँ अपना पहला श्वांस, पहला संस्कार, पहली दृष्टि और पहला जीवन-शिक्षण प्राप्त करती हैं। अतः परिवार में संस्कारों की स्थापना केवल निजी जीवन का विषय नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय प्रश्न है। बच्चा अपने जन्म से किशोरावस्था...
रुपये की गिरावट को इतना हल्‍के में मत लीजिए

रुपये की गिरावट को इतना हल्‍के में मत लीजिए

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By: डॉ. मयंक चतुर्वेदी रुपये की गिरावट को इतना हल्‍के में मत लीजिए -डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारत और यूरोपीय संघ के बीच हाल में संपन्न मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को सरकार एक ऐतिहासिक आर्थिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है। यह समझौता निःसंदेह भारत के निर्यातकों के लिए नए अवसर पैदा करता है और दीर्घकाल में व्यापारिक संबंधों को मजबूती देने की क्षमता रखता है, किंतु इसी उत्सवधर्मी माहौल के बीच एक गंभीर आर्थिक संकेत डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का निरंतर कमजोर होने को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। देखा जाए तो वर्ष 2013 में जहां एक डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग 68 के स्तर पर था, वहीं जनवरी 2026 तक यह 92 (91.95 रुपये प्रति डॉलर) के करीब पहुंच चुका है। लगभग 35 प्रतिशत का यह अवमूल्यन विदेशी मुद्रा बाजार का आंकड़ा आज भारत की एक हकीकत है, जो साफ तौर पर कहता है कि ये स्थिति हमारी अर्थव्यवस्...
धर्म ही है सृष्टि का संचालक और भारत के पुनरुत्थान का आधार

धर्म ही है सृष्टि का संचालक और भारत के पुनरुत्थान का आधार

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By: डॉ. मयंक चतुर्वेदी डॉ. मोहन भागवत ने ‘धर्म’ को सृष्टि का संचालक बताया है। उनका कथन है, सृष्टि निर्माण के साथ उसके संचालन के लिए बने नियम ही धर्म हैं। ये नियम विश्वव्यापी हैं। कोई व्यक्ति या वस्तु पूर्णतः अधर्मी नहीं हो सकते। यह प्राचीन ग्रंथों की गहन व्याख्या पर आधारित उनका धर्म के विषय में निष्कर्ष है। श्रीमद्भागवत, मनुस्मृति, पाराशर स्मृति, महाभारत जैसे ग्रंथ ‘धर्म’ को स्वाभाविक नियम के रूप में परिभाषित करते हैं। डॉ. भागवत जी का मूल सूत्र यही है कि ‘धर्म’ ही पूरी सृष्टि का ड्राइवर है। यही श्रीमद्भागवत पुराण में कहा गया है “धर्मः सनातनः सर्वस्य मूलं” अर्थात् धर्म सनातन है और समस्त सृष्टि का मूल। भगवान विष्णु स्वरूप में सृष्टि संचालित करते हैं। नियम ‘धर्म’ के रूप में निर्धारित हैं। यहां डॉ. भागवत जल को बहने और अग्नि को जलाने का ‘धर्म’ बताते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसा श्रीमद्भागवत पु...
अमन-शांति, सुरक्षा और प्रगति के लिए आपसी संवाद ज़रूरी

अमन-शांति, सुरक्षा और प्रगति के लिए आपसी संवाद ज़रूरी

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By: - प्रो. जसीम मोहम्मद अमन-शांति, सुरक्षा और प्रगति के लिए आपसी संवाद ज़रूरी पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपालजी को सुनने का अवसर मिला। उन्होंने स्पष्ट रूप से इस बात पर ज़ोर दिया कि हिंदू-मुसलमानों के बीच आपसी संवाद का मकसद मुसलमानों को आरएसएस के नज़रिए को मानने के लिए बाध्य करना नहीं है, बल्कि उनकी चिंताओं और कठिनाइयों को ईमानदारी से समझना है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारतीय समाज की संवाद परंपरा यह मानती है कि हर तर्क में कुछ सचाई होती है। आपस में सिर्फ़ एक-दूसरे पर आरोप लगाने या अलग-अलग पक्षों द्वारा सांप्रदायिक उन्माद की घटनाओं का उल्लेख करने से कुछ हासिल नहीं होता। उन्होंने यह उल्लेख किया कि सांप्रदायिक तनाव की असली जड़ "दूसरों को अलग-थलग करने" में है, जबकि समावेशी स्वरूप में समाज को एकजुट करने की शक्ति है। बताया कि सांप्रदायिक घट...
‘मनरेगा‘ और ‘विकसित भारत जी राम जी‘

‘मनरेगा‘ और ‘विकसित भारत जी राम जी‘

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By:-हृदयनारायण दीक्षित कांग्रेस ’मनरेगा बचाओ संग्राम’ अभियान चला रही है। कांग्रेस बीते 11 वर्षों से सत्ताहीन है। अच्छी बात है कि कांग्रेस ने केन्द्र का विरोध करने के लिए सड़क पर आने का निर्णय लिया है। रोजगार योजनाएं गरीबों की आय बढ़ाने की दृष्टि से चलाई गई हैं। कोई भी व्यवस्था जड़ नहीं होती। देशकाल की गति में जीर्ण-शीर्ण और पुराना विस्थापित होता है। नया उसकी जगह लेता रहता है। भाजपा ने कांग्रेस को विस्थापित किया। वह पुरानी होने के साथ-साथ ध्येयनिष्ठ भी नहीं रही। जन समर्थन घटा। भाजपा ने कांग्रेस को विस्थापित कर दिया। कांग्रेस मनरेगा को लेकर अपना रोना रो रही है। मनरेगा में कानूनी तौर पर रोजगार पाने की गारंटी थी लेकिन प्रमुख विपक्षी दल होने के बावजूद वह नए वी.बी.जी राम जी एक्ट का विरोध कर रही है। देखना यह चाहिए कि राजग सरकार द्वारा लाए गए नए अधिनियम की अच्छाइयां बुराइयां क्या हैं? आइए नए अधिनियम...