By: डॉ. मयंक चतुर्वेदी

डॉ. मोहन भागवत ने ‘धर्म’ को सृष्टि का संचालक बताया है। उनका कथन है, सृष्टि निर्माण के साथ उसके संचालन के लिए बने नियम ही धर्म हैं। ये नियम विश्वव्यापी हैं। कोई व्यक्ति या वस्तु पूर्णतः अधर्मी नहीं हो सकते। यह प्राचीन ग्रंथों की गहन व्याख्या पर आधारित उनका धर्म के विषय में निष्कर्ष है। श्रीमद्भागवत, मनुस्मृति, पाराशर स्मृति, महाभारत जैसे ग्रंथ ‘धर्म’ को स्वाभाविक नियम के रूप में परिभाषित करते हैं।
डॉ. भागवत जी का मूल सूत्र यही है कि ‘धर्म’ ही पूरी सृष्टि का ड्राइवर है। यही श्रीमद्भागवत पुराण में कहा गया है “धर्मः सनातनः सर्वस्य मूलं” अर्थात् धर्म सनातन है और समस्त सृष्टि का मूल। भगवान विष्णु स्वरूप में सृष्टि संचालित करते हैं। नियम ‘धर्म’ के रूप में निर्धारित हैं। यहां डॉ. भागवत जल को बहने और अग्नि को जलाने का ‘धर्म’ बताते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसा श्रीमद्भागवत पुराण 5.26.18 में वर्णित मिलता है। ‘प्रत्येक तत्व का स्वभाव स्वधर्म सृष्टि संतुलन का आधार है।’ भागवतजी इसे आध्यात्मिक एकता से जोड़ते हैं।
प्राचीन न्याय ग्रंथ मनुस्मृति भी अपने श्लोक 7.35 के माध्यम से ‘राजधर्म’ को प्रजा रक्षा के रूप में वर्णित करती है। डॉ. भागवत कहते हैं राज्य सेक्युलर हो सकता है किंतु मनुष्य नहीं। प्रत्येक वर्ण-आश्रम का स्वधर्म अनिवार्य है। समीक्षात्मक रूप से भारत में सेक्युलरिज्म का दुरुपयोग धार्मिक पहचान को कुचल रहा है। मनुस्मृति के अनुसार धर्मरहित राज्य अराजकता को निमंत्रण है। वहीं, पाराशर स्मृति आज के संदर्भ में विशेष प्रासंगिक है। ऋषि पाराशर 4.12 कर्मयोग पर बल देते हैं। निष्काम भाव से कर्तव्य पालन करते रहना ही व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए उन्नति का मार्ग है।
महाभारत इस ‘धर्म’ दर्शन का महाकाव्य रूप है। भीष्म पितामह युधिष्ठिर को उपदेश देते हैं अनुशासन पर्व 165.58 ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ अर्थात् धर्म की रक्षा करने वाला स्वयं सुरक्षित रहता है। महाभारत शांति पर्व 109.10 में कृष्ण कहते हैं ‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।‘ प्रत्येक का स्वधर्म पालन ही सृष्टि संचालन है। समीक्षात्मक विश्लेषण से महाभारत धर्म को व्यावहारिकता में सिद्ध करता है।
इस बात को अन्य ‘धर्म’ ग्रंथ जैसे उपनिषद और गीता भी समर्थन देते हुए दिखाई देते हैं। ईशावास्य उपनिषद का प्रथम श्लोक कहता है- ‘ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।’ सृष्टि ईश्वरीय नियम धर्म से संचालित है। भगवद्गीता 3.35 स्वधर्म पर जोर देती है।
कहना होगा कि ‘धर्म’ भारत की रग-रग में बसा है। भारत में धर्मांतरण, गैर मुसलमानों के विरोध में जिहाद, नैतिक क्षय जैसी समस्याएं चहुंओर व्याप्त हैं। किंतु इन सभी संकटों का एक ही उपाय है, जिसे डॉ. मोहन भागवत ने स्पष्ट रूप से बताया है और वह विचार है ‘सर्वस्व धर्म खड़ा होगा तो भारत विश्व गुरु बनेगा।’
डॉ. भागवत का आह्वान अहंकार मुक्त सेवा के लिए ‘स्व’ का समर्पण कर देने के लिए भी है। कुल मिलाकर वर्तमान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक आज जो कह रहे हैं या परंपरा में हमारे प्राचीन ग्रंथ समय-समय पर ‘धर्म’ के अर्थ को समझाते हुए जो कहना चाहते रहे हैं, उन सभी का एक ही मूल है। ‘धर्म’ ही सृष्टि नियम है। कोई भी अपने स्वभावगत धर्म में सहज विरत नहीं हो सकता है। अपने को परिष्कृत करने के लिए सतत साधना, कठोर अभ्यास एवं निरंतरता चाहिए।
ऐसे में यदि भारत को परम वैभव चाहिए तो फिर उसके प्रत्येक नागरिक को धर्मयुक्त आचरण तो करना ही होगा। यहां विशेष रूप से सभी को समझना चाहिए कि ‘धर्म’ का अर्थ संकुचित अर्थ में रिलीजन, मत, पंथ, मजहब नहीं है। यदि किसी को ‘धर्म’ के वास्तविक अर्थों को और गहराई से जानना है तो थोड़ा प्रयास करें, अध्ययन की गहराइयों में उतरें और ‘धर्म’ को जानते हुए अपने होने के सच्चे अर्थ को भी जानें। यही भारतीय वांग्मय का चिंतन है और यही संघ के सर संघचालक डॉ. भागवत के मन का भाव भी समझ आता है। अंत में इतना ही कि हम सभी धर्म को अपने आचरण विषय बनाएं क्योंकि इसी में भारत का हित है और इसी में भारत के प्रत्येक व्यक्ती की सच्चे अर्थों में सर्वांग उन्नति है।
सूचना: (लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।
