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भारत का निम्न मध्यम आय से उच्च मध्यम आय श्रेणी में अग्रसर होना

By: प्रहलाद सबनानी

भारत आज अपने आर्थिक इतिहास के एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर चुका है। पिछले कुछ दशकों के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में जिस गति से परिवर्तन और विस्तार देखने को मिला है, उसने न केवल देश के आर्थिक ढांचे को सुदृढ़ किया है बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति को भी नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। यही कारण है कि आने वाले वर्षों में भारत के निम्न मध्यम आय श्रेणी से उच्च मध्यम आय श्रेणी में परिवर्तित होने की प्रबल संभावना व्यक्त की जा रही है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत को निम्न आय श्रेणी से बाहर निकलकर निम्न मध्यम आय श्रेणी में पहुँचने में लगभग 60 वर्षों का समय लगा। वर्ष 1962 में भारत की प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय मात्र 90 अमेरिकी डॉलर थी, जो मिश्रित वार्षिक 5.3 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ वर्ष 2007 में बढ़कर 910 अमेरिकी डॉलर हो गई। इसी वर्ष भारत को विश्व बैंक द्वारा औपचारिक रूप से निम्न मध्यम आय श्रेणी में शामिल किया गया। यह परिवर्तन भारत की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव था, किंतु इसके पश्चात विकास की गति में जो तेजी आई, वह कहीं अधिक उल्लेखनीय सिद्ध हुई।

यदि सकल घरेलू उत्पाद के आकार पर दृष्टि डालें, तो भारत को वर्ष 2007 में एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने में लगभग छह दशक लगे। इसके पश्चात मात्र सात वर्षों में, अर्थात वर्ष 2014 तक भारत का सकल घरेलू उत्पाद बढ़कर दो लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर हो गया। इसके अगले सात वर्षों में, वर्ष 2021 तक यह तीन लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुँच गया। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि केवल चार वर्षों के भीतर वर्ष 2025 में भारत ने चार लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था का आंकड़ा भी पार कर लिया। विभिन्न आर्थिक आकलनों के अनुसार आगामी दो से तीन वर्षों में भारत का सकल घरेलू उत्पाद पाँच लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को भी पार कर सकता है।

प्रति व्यक्ति आय के संदर्भ में भी भारत की प्रगति इसी प्रवृत्ति को दर्शाती है। वर्ष 2009 में भारत को प्रति व्यक्ति आय के 1,000 अमेरिकी डॉलर के स्तर तक पहुँचने में 62 वर्षों का समय लगा था। किंतु इसके बाद केवल दस वर्षों अर्थात वर्ष 2019 में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 2,000 अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुँच गई। वर्तमान अनुमानों के अनुसार वर्ष 2026 तक भारत में प्रति व्यक्ति आय 3,000 अमेरिकी डॉलर और वर्ष 2030 तक 4,000 अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर सकती है। इसी आधार पर यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि वर्ष 2030 तक भारत निम्न मध्यम आय श्रेणी से निकल कर उच्च मध्यम आय श्रेणी में प्रवेश कर जाएगा, जिस श्रेणी में आज चीन और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हैं।

विश्व बैंक द्वारा विश्व के देशों को प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय के आधार पर चार श्रेणियों में विभाजित किया जाता है, जिनमें निम्न आय, निम्न मध्यम आय, उच्च मध्यम आय और उच्च आय शामिल हैं। वर्तमान परिभाषा के अनुसार किसी देश को उच्च आय श्रेणी में शामिल होने के लिए उसकी प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय 13,926 अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार करनी आवश्यक होती है। भारत ने वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत को सकल घरेलू उत्पाद में औसतन 7.5 प्रतिशत की वार्षिक संयुक्त वृद्धि दर बनाए रखनी होगी। यह वृद्धि दर अव्यावहारिक नहीं मानी जा सकती क्योंकि पिछले 23 वर्षों के दौरान भारत की औसत वार्षिक आर्थिक वृद्धि दर 8.3 प्रतिशत रही है।

इन तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि भारत आगामी कुछ वर्षों में ही प्रति व्यक्ति औसत आय 4,500 अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार करते हुए उच्च मध्यम आय श्रेणी में शामिल हो सकता है। इसके पश्चात वर्ष 2047 तक उच्च आय श्रेणी में प्रवेश करने के लिए भारत को प्रति व्यक्ति आय को लगभग 18,000 अमेरिकी डॉलर के स्तर तक पहुँचाना होगा। इसके लिए आगामी 23 वर्षों में प्रति व्यक्ति आय में लगभग 8.9 प्रतिशत की संयुक्त वार्षिक वृद्धि दर की आवश्यकता होगी। यदि केन्द्र और राज्य सरकारें मिलकर ऐसी आर्थिक नीतियाँ बनाती हैं, जिनका लाभ समाज के सबसे गरीब और वंचित वर्ग तक सुनिश्चित रूप से पहुँचे तो यह लक्ष्य भी कठिन नहीं प्रतीत होता।

वैश्विक स्तर पर यदि तुलना की जाए तो 139 विकासशील और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से केवल छह देशों की अर्थव्यवस्थाएँ भारत की तुलना में अधिक तेज गति से विकास कर पाई हैं। इसके बावजूद विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में भारत आज भी सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना हुआ है। छोटे देशों के सकल घरेलू उत्पाद का आकार सीमित होने के कारण उनकी प्रतिशत वृद्धि दर अधिक दिखाई देती है, किंतु जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ता है, वैसे-वैसे उच्च वृद्धि दर बनाए रखना कठिन होता जाता है। इस संदर्भ में भारत की आर्थिक उपलब्धियाँ और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

विश्व बैंक के आँकड़े यह भी दर्शाते हैं कि वर्ष 1990 में विश्व में निम्न आय श्रेणी के देशों की संख्या 51 थी, जो वर्ष 2024 तक घटकर 26 रह गई है। इसी प्रकार निम्न मध्यम आय श्रेणी के देशों की संख्या भी घटकर 50 रह गई है, जबकि उच्च मध्यम आय श्रेणी के देशों की संख्या बढ़कर 54 और उच्च आय श्रेणी के देशों की संख्या बढ़कर 87 हो गई है। यह परिवर्तन वैश्विक आर्थिक संरचना में हो रहे सकारात्मक बदलाव को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

चीन और गयाना जैसे देशों के उदाहरण इस प्रक्रिया को और अधिक स्पष्ट करते हैं। चीन वर्ष 1990 में मात्र 330 अमेरिकी डॉलर की प्रति व्यक्ति आय के साथ निम्न आय श्रेणी में था, किंतु वर्ष 2010 तक उसकी प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 4,410 अमेरिकी डॉलर हो गई और वह उच्च मध्यम आय श्रेणी में शामिल हो गया। इसी प्रकार गयाना जैसे छोटे देश ने भी कुछ ही दशकों में निम्न आय श्रेणी से निकलकर उच्च आय श्रेणी में स्थान बना लिया। इन उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि यदि उपयुक्त आर्थिक नीतियाँ, संसाधनों का सही उपयोग और राजनीतिक इच्छाशक्ति मौजूद हो तो तीव्र आर्थिक परिवर्तन संभव है।

आज भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और अगले दो से तीन वर्षों में इसके तीसरे स्थान पर पहुँचने की पूरी संभावना है। अनुमान है कि वर्ष 2027-28 तक भारत की अर्थव्यवस्था पाँच लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर और वर्ष 2035-36 तक दस लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर सकती है।

इस संपूर्ण विकास यात्रा में समाज की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा समाज को दिए गए पंच परिवर्तन कार्यक्रम, जिसमें नागरिक कर्तव्यों का पालन, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण तथा कुटुम्ब प्रबोधन जैसे विषय शामिल हैं, यदि व्यापक स्तर पर अपनाए जाएँ तो भारत के आर्थिक और सामाजिक विकास को नई दिशा मिल सकती है। जब समाज, सरकार और संस्थाएँ एकजुट होकर कार्य करती हैं, तभी किसी राष्ट्र का समग्र और संतुलित विकास संभव हो पाता है।

(लेखक, आर्थ‍िक मामलों के विशेषज्ञ एवं स्‍तम्‍भकार हैं।)


(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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