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संस्कारित परिवार: जागरूक नागरिक, समरस समाज और संवेदनशील राष्ट्र निर्माण की मूल धुरी

By: कैलाश चन्द्र

संस्कारित परिवार: जागरूक नागरिक, समरस समाज और संवेदनशील राष्ट्र निर्माण की मूल धुरी

-कैलाश चन्द्र

भारतीय समाज की रचना में परिवार केवल रक्त-संबंधों का केंद्र नहीं बल्कि एक जीवंत संस्कृति, अनुशासन और भविष्य का निर्माण करने वाली संस्था है। जब दुनिया व्यक्तिगतता, उपभोक्तावाद और क्षणिक सुख की संस्कृति में उलझकर अपने मूल्यों से दूर जा रही है, तब हमारे लिए यह समझना अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि राष्ट्र-निर्माण किसी एक नीति, किसी एक नेतृत्व या किसी एक विचारधारा से नहीं चलता; उसका वास्तविक केंद्र परिवार होता है। परिवार ही वह स्थान है जहाँ भविष्य की पीढ़ियाँ अपना पहला श्वांस, पहला संस्कार, पहली दृष्टि और पहला जीवन-शिक्षण प्राप्त करती हैं। अतः परिवार में संस्कारों की स्थापना केवल निजी जीवन का विषय नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय प्रश्न है।

बच्चा अपने जन्म से किशोरावस्था तक घर के वातावरण से जो कुछ ग्रहण करता है, वह आगे चलकर उसके व्यक्तित्व, उसके निर्णयों और उसके सार्वजनिक आचरण का आधार बन जाता है। यदि परिवार का वातावरण अनुशासन, सत्य, परिश्रम, करुणा और कर्तव्य-बोध से भरा है, तो उस घर से एक ऐसा नागरिक निकलता है जिसकी दृष्टि केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित नहीं रहती बल्कि वह समाज, प्रकृति और राष्ट्र को अपने अस्तित्व का विस्तार मानता है। भारतीय संस्कृति में ‘संस्कार’ कोई बाह्य प्रदर्शन नहीं बल्कि आत्मा को गढ़ने वाली आग है, जो धातु को स्वर्ण में बदलने का सामर्थ्य रखती है। संस्कारित बच्चा गृहस्थी से लेकर समाज तक हर स्थान पर संतुलन, मर्यादा और उत्तरदायित्व की भावना लेकर चलता है। यही कारण है कि परिवार में संस्कारों का स्थान राष्ट्र-निर्माण की प्रथम आधारशिला माना गया है।

परिवार की इस संस्कारात्मक शक्ति का अगला विस्तार कुटुम्ब और मोहल्ले तक पहुँचता है। जब परिवार के भीतर सद्भाव, सम्मान, संवाद और परस्परता का वातावरण होता है तो वह ऊर्जा केवल घर की चहारदीवारी में नहीं रुकती, बल्कि बाहर मोहल्ले तक फैलती है। एक संस्कारित परिवार मोहल्ले में तनाव, हिंसा, विवाद या अव्यवस्था का कारण नहीं बनता बल्कि वह वातावरण को सुसज्जित और शांत रखने में सहायक होता है। ऐसे परिवार सामाजिक विश्वास को बढ़ाते हैं और एक प्रकार की अदृश्य सामाजिक पूँजी का निर्माण करते हैं, जिससे पूरा नगर और समाज अधिक स्थिर, सुरक्षित और सामंजस्यपूर्ण बनता है। समाज का स्वास्थ्य किसी सरकार या संस्था द्वारा निर्मित नहीं होता; वह घरों के वातावरण से पैदा होता है। यदि घर स्वस्थ हैं तो मोहल्ले सुरक्षित होते हैं और यदि मोहल्ले सुरक्षित हैं तो पूरा समाज नैतिक रूप से मजबूत होता है।

संस्कारों का यह प्रभाव केवल मानव-व्यवहार तक सीमित नहीं रहता; वह प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता तक भी विस्तारित होता है। आज दुनिया पर्यावरणीय संकटों का सामना कर रही है, जल-स्रोत सूख रहे हैं, उर्जा का अत्यधिक अपव्यय हो रहा है, वृक्ष कट रहे हैं और जीव-जगत असुरक्षा में जी रहा है। इन सबका समाधान केवल कानूनों या अभियानों से नहीं होगा। समाधान तब आएगा जब परिवार अपने बच्चों को संसाधनों का महत्त्व, प्रकृति के प्रति आदर और मितव्ययता की संस्कृति सिखाएँगे। जब बच्चा घर में यह देखता है कि पानी का अनावश्यक बहाव रोका जाता है, बिजली व्यर्थ नहीं जलाई जाती, पौधों को अपना परिवार माना जाता है, पशु-पक्षियों को दया और सह-अस्तित्व की भावना से देखा जाता है, तब उसके भीतर पर्यावरण संरक्षण कोई बाहरी आदेश नहीं बल्कि आंतरिक संस्कार बन जाता है। भारतीय परंपरा में प्रकृति पूजानीय है और यह पूजा्यता परिवार की संस्कृति से ही जीवन का अंग बनती है। अतः पर्यावरण का संरक्षण तभी संभव है जब परिवार अपनी जीवन-शैली में संवेदनशीलता का बीज बोए।

परिवार का दायित्व केवल नैतिकता या व्यवहार तक सीमित नहीं है; वह सांस्कृतिक स्वत्व को बनाए रखने का केंद्र भी है। भजन, भोजन, भ्रमण और भेष जैसे विषय केवल क्रिया नहीं बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास के वाहक हैं। यदि परिवार अपने घर में अपनी परंपराओं के भजन, मंत्र, कथा और लोकध्वनियों को स्थान देता है तो बच्चों में आध्यात्मिकता कृत्रिम नहीं, सहज बनती है। भोजन में स्थानीयता और स्वदेशीता अपनाने से बच्चे यह सीखते हैं कि जीवन का पोषण धरती के अपने अनाज और अपनी परंपरा से होता है। भ्रमण यदि विदेशी चमक के पीछे न भागकर अपने देश की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और भूगोलिक धरोहरों को देखने पर आधारित हो, तो बच्चों में इतिहास-बोध और राष्ट्र-गौरव जन्म लेता है। भेष में भारतीयता का सम्मान केवल कपड़ा नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक पहचान की सौम्यता है। जब परिवार “स्व” का भाव अपनाता है, तब उसकी संतति सांस्कृतिक रूप से मजबूत, आत्मविश्वासी और मानसिक रूप से स्थिर बनती है।

इन सबके साथ ही समरसता का महत्व सर्वोच्च है। समरस परिवार वह है जिसमें सभी सदस्य एक-दूसरे को सम्मान देते हैं, किसी को कमतर या अधिकतर नहीं मानते और सबके स्वभाव और कर्तव्य को समझते हैं। समरसता का यह भाव घर से निकल कर समाज में समान रूप से फैलता है। आज दुनिया विभाजनों, उपहास, तनाव और घृणा की राजनीति से जूझ रही है। यदि परिवार के भीतर समरसता होगी तो समाज विभाजन से मुक्त होगा। समरस परिवारों से ही समरस समाज जन्म लेता है और ऐसा समाज ही एक समरस राष्ट्र का आधार बन सकता है। जाति, भाषा, वर्ग और क्षेत्र के कृत्रिम भेद तभी समाप्त होंगे जब परिवारों में एकात्मता की भावना विकसित होगी। समरस परिवार समाज के लिए जीवंत उदाहरण बनता है कि विविधता संघर्ष का नहीं बल्कि सहयोग और पूरकता का आधार है।

अंततः राष्ट्र-निर्माण किसी भारी-भरकम नारे या महंगी योजना से नहीं बल्कि एक छोटे-से परिवार की संस्कृति, अनुशासन और दैनंदिन आचरण से शुरू होता है। संस्कारित परिवार ही जागरूक नागरिक तैयार करता है। यही परिवार सुरक्षित मोहल्ला बनाते हैं। यही संवेदनशील पीढ़ी को प्रकृति-संरक्षण का वास्तविक अर्थ सिखाते हैं। यही ‘स्व’ के भाव को पोषित करते हैं और यही समरसता को पल्लवित करते हैं। इसलिए भारत के उज्ज्वल भविष्य का वास्तविक प्रकाश-स्तंभ कोई बाहरी शक्ति नहीं बल्कि अंदर बैठे छोटे-छोटे परिवार हैं, जिनमें संस्कार, प्रेम, मर्यादा, स्वाबलंबन और एकात्मता की दीप्ति जल रही है। इन्हीं परिवारों से वह पीढ़ी जन्म लेगी जो केवल विकसित भारत नहीं बल्कि विचारवान, समरस, संवेदनशील और आत्मगौरवयुक्त भारत का निर्माण करेगी।

(लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)


(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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