
नई दिल्ली, 05 नवंबर (प्रेस ब्यूरो)। कांग्रेस ने बुधवार को यहाँ आयोजित पत्रकार सम्मेलन में बताया कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पर राज्य की सरकारी भूमि और ऐतिहासिक धरोहरों को निजी कंपनियों के हाथों में सौंपने का आरोप लगाया गया है। उन्होंने दावा किया कि 13 जिलों में से 12 जिलों में 40 सरकारी भूमि और ऐतिहासिक संपत्तियों को निजी हाथों में देने की प्रक्रिया जारी है, जिसका कुल बाजार मूल्य कम से कम एक लाख करोड़ रुपये है। इसके विरोध में कांग्रेस ने बुधवार को राज्यभर में ‘भूमि बचाओ‑धामी हटाओ’ अभियान शुरू किया है।
पार्टी की महासचिव और उत्तराखंड प्रभारी कुमारी शैलजा ने कहा कि मुख्यमंत्री ने सरकारी जमीन और संपत्तियों को निजी उपयोग के लिए सौंपने का अंतिम अधिकार अपने पास रखा है। उन्होंने आरोप लगाया कि जनवरी 2025 और नवंबर 2025 में मुख्यमंत्री की मंजूरी से सरकारी विभागों की लगभग 1,080 एकड़ जमीन होटल और निवेश के नाम पर निजी उपयोग के लिए देने का रास्ता खुला।
शैलजा ने उदाहरण के तौर पर नैनीताल के पटवाडांगर का हवाला देते हुए बताया कि 108 एकड़ जमीन के स्वामित्व को लेकर सरकारी अभिलेखों में स्थिति स्पष्ट नहीं थी, फिर भी 13.64 एकड़ हिस्से को 90 साल के लिये देने की निविदा जारी की गई। इसका आरक्षित मूल्य 37.80 करोड़ रुपये और वार्षिक किराया पाँच रुपये प्रति वर्ग मीटर रखा गया। हरिद्वार के अलकनंदा होटल और ऋषिकेश के निरीक्षण भवन सहित ब्रिटिश कालीन 24 अन्य निरीक्षण भवनों को भी निजी कंपनियों को देने की तैयारी है।
शैलजा ने आरोप लगाया कि दिसंबर 2022 में मंत्रिमंडल ने सरकारी जमीन पर अंतिम अधिकार मुख्यमंत्री को देने और संपत्तियों के मौद्रीकरण के लिये उत्तराखंड निवेश एवं अवसंरचना विकास बोर्ड (यूआईआईडीबी) गठित करने का निर्णय लिया था। उन्होंने कहा कि यूआईआईडीबी अधिनियम के तहत संपत्तियों के मौद्रीकरण के लिये राज्य सरकार और संबंधित विभाग की मंजूरी आवश्यक है, परन्तु विभागीय मंत्रियों की सहमति के बिना फैसले लिए गए।
उन्होंने मसूरी के जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट का जिक्र करते हुए कहा कि 142 एकड़ जमीन और धरोहर संपत्ति को 15 साल के लिए एक निजी कंपनी को लगभग एक करोड़ रुपये वार्षिक किराये पर दिया गया। कांग्रेस ने पहले भी इस मुद्दे को उठाया है और राज्य की जमीन और पहचान बचाने के लिए संघर्ष जारी रखेगी। शैलजा ने कहा कि पार्टी के वरिष्ठ नेता राज्यपाल से मिलकर मुख्यमंत्री के फैसलों को रद्द करने की माँग करेंगे। यदि माँगें नहीं मानती, तो कांग्रेस उच्च न्यायालय के समक्ष मामला लेकर जाएगी।
