
Indore, 26 अक्टूबर (प्रेस ब्यूरो)। आज इंदौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (DAUV) के तक्षशिला परिसर के ऑडिटोरियम में आयोजित “जेन‑जी चर्चा” कार्यक्रम में कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय ने युवाओं से संवाद किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज की जेन‑जी पीढ़ी “यूजलेस” नहीं है, बल्कि उनकी क्षमताओं का पूरा उपयोग नहीं किया जा रहा।
उपाध्याय ने युवाओं में अपार संभावनाओं की बात करते हुए कहा कि उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने और निर्णय‑लेने वाली व्यवस्थाओं में भाग लेने के पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे। उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि “युवाओं की क्षमताओं पर ध्यान देकर उन्हें राजनीति एवं संवैधानिक व्यवस्थाओं में भागीदारी का मौका दिया जाए।”
इस कार्यक्रम में इंदोरीएक्स और IET DAUV ने मिलकर युवाओं की सोच, धैर्य, सफलता, सामाजिक जिम्मेदारियाँ और आध्यात्मिक जीवन पर चर्चा की। उपाध्याय ने बताया कि समाज में अब चर्चा केवल राजपूत और ब्राह्मण जैसी जातियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि जेन‑जी और जेन‑अल्फा के बीच भी अंतर और टकराव की स्थिति उभर रही है।
उन्होंने धैर्य के महत्व पर चर्चा करते हुए भारतीय क्रिकेट के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी, महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली का उदाहरण दिया, यह कहते हुए कि इन खिलाड़ियों ने कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखा और संघर्ष को जीत में बदला। उन्होंने युवाओं से कहा कि “सफलता केवल प्रतिभा से नहीं मिलती, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में डटे रहने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।”
उपाध्याय ने देवी अहिल्याबाई होलकर का उल्लेख करते हुए उनकी परिवारिक जिम्मेदारियों और सामाजिक योगदान पर प्रकाश डाला, और बताया कि “बहू को विवाह से पहले पिता और भाई का सम्मान करना चाहिए तथा विवाह के बाद ससुराल का नाम रोशन करना चाहिए।”
धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कलयुग में भगवान का नाम ही परिवर्तन का माध्यम बनेगा। उन्होंने “बुराइयों से मुक्ति के लिए 30 दिन लगातार भगवान का नाम लेने” की सलाह दी, और कहा कि 31वें दिन व्यक्ति स्वयं अपने जीवन में बदलाव महसूस कर सकता है।
कार्यक्रम में जेन‑जी को सामने आने वाली चुनौतियों, सामाजिक जिम्मेदारियों और सफलता प्राप्त करने के तरीकों पर चर्चा हुई, और उपाध्याय ने युवाओं को पहचानने, उनमें धैर्य विकसित करने और उन्हें सामाजिक एवं संवैधानिक व्यवस्थाओं में अधिक भागीदारी देने की आवश्यकता पर बल दिया।
