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डिजिटल युद्ध के झांसे में युवा वर्ग

सुरेश हिंदुस्तानी

कहा जाता है कि किसी भी व्यक्ति या समाज को उद्देश्य विहीन करने के लिए उसको किसी विषय में ऐसा उलझा दिया जाए, जो उसकी दिशा को बदल दे। आज सोशल मीडिया पर बहुत बड़े पैमाने पर यही खेल चल रहा है। तर्क और कुतर्क के सहारे नैरेटिव गढ़ने का यह प्रयास निश्चित ही देश के लिए घातक ही कहा जाएगा। आज सोशल मीडिया ही नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रचार में भी यह बात गहरे तक दिखाई देती है। समाज को इससे निकलने का प्रयास करना चाहिए, नहीं तो आने वाला समय अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा ही होगा। खास बात यह है कि इस नैरेटिव को युवा वर्ग और समाज के बीच ले जाने का कार्य कुछ राजनीतिक दल के नेता कर रहे हैं। आज नैरेटिव चलाने के लिए डिजिटल प्लेटफार्म का उपयोग भी किया जा रहा है। जो एक प्रकार से युद्ध के रूप ले चुका है। आज सोशल मीडिया प्लेटफार्म का उपयोग समाज में भेद पैदा करने और युवाओं के मानस को भ्रमित करने के लिए किया जा रहा है।

वर्तमान समय में देश में युद्ध का स्वरूप बदल चुका है। इसके साथ ही यह सत्य है कि किसी भी देश को समाप्त करना हो तो वहां की युवा पीढ़ी को गुमराह कर दीजिए। वह देश स्वतः ही समाप्त हो जाएगा। इस खेल वामपंथी ताकतें आग में घी डालने का काम कर रही हैं। युवाओं के मध्य यह नैरेटिव स्थापित करने का खेल इसलिए भी किया जा रहा है, क्योंकि युवाओं का मन एक कोरे कागज की तरह होता है, उसे जो बताया जाएगा, उसी को सत्य मान लेता है। यह खेल युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने जैसा ही है। इसलिए ऐसे किसी भी कृत्य से बहुत सावधान रहने की आवश्यकता है।

यह एक ऐसा युद्ध है, जिसकी कोई सीमा दिखाई नहीं देती। यह युद्ध सूचनाओं, तस्वीरों, वीडियो, सोशल मीडिया पोस्ट और डिजिटल नैरेटिव के माध्यम से लड़ा जा रहा है। किसी देश की छवि को प्रभावित करना, उसकी संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करना और झूठ को इतनी तेजी से फैलाना कि सत्य पीछे छूट जाए। डिजिटल युद्ध की यही सबसे गंभीर चुनौती है। आज सत्य पर प्रहार करने का प्रयास किया जा रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई के विस्तार ने इस खतरे को और जटिल बना दिया है। अगर एआई का उपयोग युवाओं को सार्थक दिशा देने के लिए किया जाए तो इसके अपेक्षित परिणाम भी मिल सकते हैं, लेकिन इसके लिए केवल सरकारी प्रयास ही काफ़ी नहीं हैं, समाज के जागरण में सक्रिय संस्थाओं और व्यक्तियों को खुलकर सामने आना होगा।

आज किसी व्यक्ति के चेहरे और आवाज को बदलकर ऐसा वीडियो तैयार किया जा सकता है, जिसमें किसी वास्तविक घटना के साथ झूठा विवरण जोड़कर उसका अर्थ बदला जा सकता है। यही वह बिंदु है जहां सूचना और दुष्प्रचार के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है। हालांकि भारत सरकार ने भी डीपफेक और एआई जनित भ्रामक सामग्री की चुनौती को गंभीरता से लिया है। लेकिन झूठ की ताकत हमारी जल्दबाजी से बढ़ती है। किसी दुष्प्रचार अभियान की सफलता केवल उसे बनाने वाले पर निर्भर नहीं करती। उसकी असली शक्ति उस समाज से आती है, जो बिना जांचे उसे आगे बढ़ाता है। एक सनसनीखेज शीर्षक दिखाई दिया, भावनाएं भड़कीं और व्यक्ति ने बिना स्रोत देखे उसे साझा कर दिया। कुछ ही मिनटों में वह सामग्री हजारों लोगों तक पहुंच जाती है। यहीं नागरिक की जिम्मेदारी शुरू होती है। सोशल मीडिया पर किसी संदेश को साझा करना अब केवल व्यक्तिगत प्रतिक्रिया नहीं रह गया है। प्रत्येक शेयर उस सूचना की विश्वसनीयता को बढ़ाता है। यदि सूचना गलत है तो अनजाने में किया गया साझा करना भी दुष्प्रचार की श्रृंखला का हिस्सा बन जाता है। इसलिए डिजिटल नागरिकता का अर्थ केवल तकनीक का इस्तेमाल करना नहीं, बल्कि सूचना के प्रति विवेकपूर्ण व्यवहार करना भी है।

लोकतंत्र में प्रश्न पूछना अधिकार है। सरकार की नीतियों की आलोचना अधिकार है। किसी व्यवस्था की कमियों को सामने लाना भी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। लेकिन जानबूझकर झूठ गढ़ना, फर्जी सामग्री को वास्तविक बताना, हिंसा या वैमनस्य को उकसाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। यह सारा खेल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किया जा रहा है। क्या इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहा जा सकता है। झूठ परोसना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं माना जा सकता। क्योंकि झूठ को निर्बाध फैलने देना भी समाज के हित में नहीं है। पूर्व में संसद में भी डीपफेक और दुष्प्रचार को लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बताया गया है। लेकिन कानून हर झूठ को पैदा होने से नहीं रोक सकता। एक सामग्री हटाए जाने तक उसकी हजारों प्रतियां बन चुकी हो सकती हैं। इसलिए तकनीकी व्यवस्था के साथ सामाजिक जागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है। इस लड़ाई में प्रत्येक नागरिक की भूमिका महत्वपूर्ण है। किसी भी संवेदनशील वीडियो को साझा करने से पहले उसके स्रोत की जांच करना, पुराने वीडियो को नए संदर्भ में तो नहीं दिखाया जा रहा है यह देखना, तस्वीरों और दावों की स्वतंत्र पुष्टि करना और संदिग्ध सामग्री की रिपोर्ट करना, ये छोटे कदम बड़े प्रभाव पैदा कर सकते हैं। समाज को केवल सरकारी फैक्ट-चेक का इंतजार नहीं करना चाहिए। विद्यालयों में डिजिटल साक्षरता, परिवारों में मीडिया साक्षरता और सामाजिक संगठनों द्वारा तथ्य-जांच की संस्कृति विकसित करना समय की मांग है।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में झूठी सूचना का प्रभाव केवल किसी व्यक्ति की छवि तक सीमित नहीं रहता। यह सामाजिक विश्वास को प्रभावित कर सकता है। इसलिए भारत के सामने चुनौती केवल यह नहीं है कि कोई बाहर से क्या प्रचार कर रहा है। चुनौती यह भी है कि हम भीतर से उस प्रचार को कितनी आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम हर वायरल सामग्री को सत्य मानने के बजाय प्रश्न पूछें कि इसका स्रोत क्या है? प्रमाण क्या है? संदर्भ क्या है? क्योंकि सूचना के इस युग में देश की सुरक्षा केवल सीमा पर खड़े जवान की जिम्मेदारी नहीं रह गई है। मोबाइल स्क्रीन के सामने बैठा प्रत्येक नागरिक भी इस सुरक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण प्रहरी है। भारत के विरुद्ध चलने वाले किसी भी दुष्प्रचार अभियान की अंतिम सफलता या असफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारतीय समाज झूठ को कितनी जल्दी पहचानता है और सत्य को कितनी मजबूती से आगे बढ़ाता है।

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