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SIR: बंगाल में 37 लाख अपील, 5 माह में निपटी मात्र 1.26 लाख, इस स्पीड से सभी के निपटारे में लगेंगे 12 साल

कोलकाता। पश्चिम बंगाल (West Bengal) में गहन पुनरीक्षण अभियान (Intensive Review Campaign- SIR) में नाम कटने के बाद वोटर लिस्ट में दोबारा नाम शामिल करने वाली इतनी अपील आ गई हैं कि सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) द्वारा बनाया गया ट्राइबन्यूनल (Tribunal) अगले 12 साल में भी इनका निपटारा नहीं कर पाएगा। चुनाव आयोग ने ही सुप्रीम कोर्ट में जवाब देते हुए बताया है कि पिछले पांच महीने में 1 लाख 26 हजार मामलों का निपटारा हो पाया है। वहीं 37 लाख से ज्यादा अपील ट्राइबन्यूल में आई हैं। ऐसे में अगर यही स्पीड रही तो सारी अपील निपटाने में 12 साल का समय लग जाएगा।


एक महीने में कितने केस सुलझाए जा रहे
अगर आंकड़ों पर और ट्राइब्यूनल के काम करने की स्पीड पर कौर करें तो एक महीने में लगभग 25 हजार 238 मामलों का निपटारा हो रहा है। इसमें शनिवार और रविवार को छुट्टी के तौर पर नहीं गिना गया है। वहीं 16 सितंबर तक कुल 37,05,235 केस पेंडिंग हैं। ऐसे में अगर ट्राइबन्यूल सातों दिन लगातार काम करता है और कोई छुट्टी नहीं करता है तो कम से कम 146 महीने लग जाएंगे।


ऐसे में चुनवा आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि मौजूदा इन्फ्रास्ट्रक्चर और कर्मचारियों की संख्या इतने सारे केस निपटाने के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसे में ट्राइबन्यूनल की संख्या बढ़ाकर 24 से 42 की जा सकीत है। इसके अलावा न्यायिक अधिकारियों को अगर घर से काम करने की भी सुविधा दी जाए तो काम में तेजी आएगी।


टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने अपील निपटाने को लेकर एक याचिका फाइल की थी। इसपर जवाब देते हुए चुनाव आयोग ने बताया कि अगर न्यायिक अधिकारियों को घर से भी काम करने की छूट मिलती है तो केस निपटाने में आसानी होगी।


कांग्रेस का चुनाव आयोग पर निशाना
कांग्रेस ने रविवार को निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के जारी विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का मुद्दा उठाया और आरोप लगाया कि एसआईआर वास्तव में मतदाताओं के नाम हटाने की एक बड़े पैमाने की ”शाह इंस्टीगेटेड रिमूवल” (शाह के इशारे पर मतदाताओं के नाम हटाने की) प्रक्रिया तथा ”संविधान पर हमला” है। कांग्रेस ने कहा कि इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि विभिन्न राज्यों में बड़े पैमाने पर हटाए गए नामों में सबसे अधिक संख्या समाज के आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे कमजोर तथा वंचित वर्गों से आने वाले मतदाताओं की है।

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