
नई दिल्ली, 07 नवंबर (प्रेस ब्यूरो)। कांग्रेस के संसदीय दल के प्रमुख सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार पर तीखा आरोप लगाया कि पिछले बारह वर्षों में देश के लोकतंत्र के ढाँचे, संस्थाओं और सामाजिक ताने‑बाने को “भारी नुकसान” पहुँचा है। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार के हटने के बाद भी इन क्षति को ठीक करने में समय लगेगा और इसके लिए सभी राजनीतिक दलों को “गंभीर और सामूहिक” प्रयास करने पड़ेंगे।
यह बयान सोनिया गांधी ने अपनी आने वाली पुस्तक ‘बिलॉन्गिंग : अ जर्नी ऑफ लव’ के प्रकाशन से पहले एक अंग्रेजी दैनिक को दिए साक्षात्कार में दिया। यह पुस्तक हार्परकोलिन्स इंडिया द्वारा प्रकाशित होगी और 10 नवंबर को बाजार में उपलब्ध होगी, जबकि 16 नवंबर को आधिकारिक लोकार्पण होगा। किताब में उन्होंने अपने निजी जीवन, भारत से जुड़ाव, राजनीतिक सफर, कांग्रेस की भूमिका और वर्तमान राजनैतिक माहौल पर विस्तृत विचार प्रस्तुत किए हैं।
सांसद ने बताया कि लोगों में अब संस्थाओं और लोकतांत्रिक व्यवस्था को हुए नुकसान का अहसास बढ़ रहा है, फिर भी वह देश के भविष्य को लेकर आशावादी हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को “सम समान अवसर” नहीं मिला, और सरकार ने विशेष रूप से चुनाव आयोग पर पूर्ण नियंत्रण कर लिया है। मुख्यधारा के मीडिया को भी उसी प्रभाव में रखा गया है, जबकि धनबल और धर्म का प्रयोग राजनीतिक मुकाबले को बदल रहा है।
फिर भी सोनिया गांधी ने कहा कि चुनौतियों और उत्पीड़न के बावजूद कांग्रेस के नेता एवं कार्यकर्ता गांव‑स्तर पर संविधान के मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखे हुए हैं। हालिया कई चुनावों में “गड़बड़ी” और “चुनाव चोरी” के मामले सामने आए हैं, और जनता इन मुद्दों को लेकर जागरूक हो रही है। कांग्रेस समान विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर काम कर रही है और उसकी संभावनाएँ दिन‑ब‑दिन बेहतर हो रही हैं।
उन्होंने 1999 में शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर द्वारा उठाए गए “विदेशी मूल” के प्रश्न को याद किया, जिससे उनका मनोबल टूट गया था। वह कहती हैं कि इस घटना ने उन्हें “भारत के प्रति निष्ठा” पर सवाल उठाने के कारण गहरा शोक पहुँचाया।
भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ किसी समझौते की बात पर उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस ने कभी इन संगठनों के साथ समझौता नहीं किया और भविष्य में भी नहीं करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि नरेंद्र मोदी अलग वैचारिक पृष्ठभूमि से आते हैं, परंतु कांग्रेस के पास आरएसएस से सीखने के लिए बहुत कम है।
अंत में, सोनिया गांधी ने इंदिरा गांधी द्वारा 1977 में आपातकाल के बाद चुनाव करवाने के निर्णय को “काले अध्याय” के रूप में वर्णित किया, जहाँ लोकतांत्रिक अधिकारों पर रोक और बंदी प्रत्यक्षीकरण का अधिकार निलंबित किया गया था, और बाद में इंदिरा ने इस अवधि की “ज्यादतियों” पर खेद व्यक्त किया।
