
कोयंबटूर, 07 नवंबर (प्रेस ब्यूरो)। दीपावली का मौसम आमतौर पर आतिशबाज़ी, मिठाइयाँ और रंगीन रोशनी से सजता है, परंतु कोयंबटूर जिले के किट्टाम्पालयम गाँव और तिरुनेलवेली जिले के कूंथनकुलम में यह परम्परा बदल दी गई है। लगभग 25 वर्षों से दोनों गाँवों में पटाखे नहीं फोड़े जाते, क्योंकि स्थानीय लोग पक्षियों और चमगादड़ की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं।
किट्टाम्पालयम में बड़े बरगद, पीपल और अन्य पेड़ों पर अनेक पक्षी और चमगादड़ निवास करते हैं। दीपावली के दौरान तेज़ आवाज़ और धुएँ से इन जीवों को तनाव होता था, इसलिए गाँव के बुजुर्गों ने सामूहिक रूप से पटाखे न फोड़ने का निर्णय लिया। यह निर्णय युवा पीढ़ी ने भी अपनाया और अब यह गाँव की पहचान बन गया है। बच्चे स्कूल में भी इस परम्परा के महत्व को समझते हैं और मित्रों के पटाखे खरीदने की बात पर भी इस निर्णय पर कायम रहते हैं।
गाँव की पर्यावरणीय पहल में नई पेड़ लगाना भी शामिल है। बरगद, पीपल, अंजीर, जामुन और अमरूद के पौधे लगाकर पक्षियों के लिए घोंसले और भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। इस कदम से हरियाली बढ़ी है और जीवों का आवास सुरक्षित रहा है।
राज्य सरकार ने दीपावली के दौरान पटाखे के प्रयोग को सीमित करने के लिये सुबह 6‑7 बजे और शाम 7‑8 बजे के समय निर्धारित किया है, परन्तु इन दो गाँवों की पहल यह सिद्ध करती है कि उत्सव की खुशी के लिये शोर और धुएँ की जरूरत नहीं है। सामूहिक इच्छा शक्ति और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता से ऐसी परम्पराएँ विकसित हो सकती हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रेरित करें।
