
नई दिल्ली, 05 नवंबर (प्रेस ब्यूरो)। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली एक बेंच ने मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष से निर्देश जारी किया है कि बागी कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे के खिलाफ दसवीं अनुसूची के अंतर्गत दायर अयोग्यता याचिका पर दो महीने के भीतर निर्णय लिया जाए।
इस आदेश में न्यायालय ने याचिका के शीघ्र निपटान की आवश्यकता पर बल दिया, साथ ही इस बात पर नाराज़गी भी जताई कि पहले उच्चतम न्यायालय ने इस विषय पर देरी करते हुए कोई ठोस निर्णय नहीं लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि जब तक अयोग्यता के दावे को मान्य नहीं माना जाता, तब तक विधायक को विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर चुना गया माना जाता है, परन्तु बाद में जब वह भाजपा में शामिल हो जाती है, तो यह अयोग्यता का आधार बन जाता है।
जुलाई 2024 में मध्य प्रदेश विधानसभा के विपक्षी नेता उमंग सिंगार द्वारा दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि सप्रे ने कांग्रेस की सदस्यता स्वेच्छा से त्यागी है। यह दावा करते हुए कि वह भाजपा की प्रचार-प्रसार में सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं, यह तर्क दिया गया कि इस कारण वे पहले से ही अयोग्य हो चुकी हैं, परन्तु अब तक किसी भी प्राधिकरण ने स्पष्ट निर्णय नहीं दिया।
इस निर्देश के तहत, सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष को निर्देशित किया है कि वे अयोग्यता याचिका के निपटान को प्राथमिकता दें और दो महीनों के भीतर फैसला सुनाएँ। यदि समयसीमा का पालन नहीं हुआ तो उच्चतम न्यायालय भी इस मामले पर कार्रवाई कर सकता है। यह कदम संसद और विधानमंडलों में दल बदलाव के खिलाफ लागू कानून के सख्त अनुपालन की याद दिलाता है, और यह सुनिश्चित करता है कि राजनेताओं के लिए किसी भी तरह के हित संघर्ष पर तुरंत निर्णय लिया जाए।
