
नई दिल्ली, 28 अक्टूबर (प्रेस ब्यूरो)। दिल्ली उच्च न्यायालय ने पासपोर्ट (संशोधन) नियम, 2026 के तहत पासपोर्ट जारी करने और नवीनीकरण पर तय की गई फीस में 67 % की वृद्धि को सही ठहराया, जबकि उस निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। इस फैसले में नितिन वासुदेव सांब्रे मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बेंच ने स्पष्ट किया कि 14 साल के लंबे अंतराल के बाद हुई इस बढ़ोतरी को किसी भी तरह से अनुचित या अत्यधिक नहीं माना जा सकता।
यह याचिका प्रवासी लीगल सेल द्वारा दायर की गई थी। इसके वकील ने मुख्य रूप से पासपोर्ट (संशोधन) नियम, 2026 को चुनौती देते हुए, अनिवासी भारतीयों और देश में रहने वाले भारतीयों के लिए तय फीस में अंतर पर आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि भारत में रहने वाले नागरिकों की तुलना में अनिवासी भारतीयों को लगभग पांच हजार रुपये अधिक चुकाने पड़ते हैं। दलील में यह भी कहा गया कि इस भारी वृद्धि से खाड़ी देशों में प्लंबर, मैकेनिक और निर्माण कार्य में लगे आर्थिक रूप से कमजोर भारतीय प्रवासियों पर असहनीय वित्तीय बोझ पड़ेगा।
न्यायालय ने उत्तरदायी पक्ष से पूछा कि विदेश में रह रहे नागरिकों की आर्थिक स्थिति का आकलन कौन करेगा और क्या किसी दूसरे देश का प्रमाणपत्र भारत सरकार के लिए बाध्यकारी हो सकता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट शुल्क का निर्धारण और प्रवासियों की वित्तीय स्थिति का मूल्यांकन पूरी तरह से सरकार के नीतिगत निर्णयों के दायरे में आता है। जब तक यह शुल्क अत्यधिक क्रूर या तर्कहीन न हो, न्यायालय कार्यपालिका के ऐसे फैसलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
अंततः न्यायालय ने कहा कि चूंकि 2012 में ही पासपोर्ट शुल्क का अंतिम संशोधन हुआ था, इसलिए इतने वर्षों बाद हुआ यह बदलाव पूरी तरह से जायज है।
