
जम्मू, 25 अक्टूबर (प्रेस ब्यूरो)। विश्व हिंदू परिषद — जम्मू कश्मीर ने पूर्व अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल की जन्मशताब्दी के उपलक्ष्य में पुलिस ऑडिटोरियम जम्मू में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया। मुख्य वक्ता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह‑सरकार्यवाह अरुण कुमार ने श्रोताओं को बताया कि अशोक जी का जीवन “बनने की कोई इच्छा नहीं” वाला था; वे केवल दायित्वों को निभाते रहे और संघ के आदेशों पर चले। उन्होंने कहा, “उस 40 पीढ़ी के लोगों ने बलिदान दिए, जो कष्ट सहा; उनका स्मरण करके हम उनका बलिदान व्यर्थ न जाने दें।”
अरुण कुमार ने उल्लेख किया कि “एक हजार साल से जो शक्तियाँ हमसे लड़ी रही थीं, धीरे‑धीरे उनका वर्चस्व खत्म हो रहा है।” उन्होंने दो प्रमुख ताकतों – कम्युनिज्म और ग्लोबल मार्केट फोर्सेस – का उल्लेख किया और कहा कि असली चुनौती अब भारत के भीतर है, इसलिए “अकेले‑अकेले हम लड़ नहीं सकते, मिलकर लड़ेंगे।”
वक्ता ने बताया कि वर्तमान में हिंदुत्व की भावना जाग रही है, सामाजिक समरसता का लक्ष्य स्पष्ट हो गया है और “देशभक्ति के आधार पर एक मजबूत राष्ट्र निर्माण” की दिशा में कार्य हो रहा है। उन्होंने मीडिया और सोशल मीडिया द्वारा “हिंदुत्व के वातावरण को कमजोर करने” के प्रयासों को उजागर किया, साथ ही समाज को जातियों और छोटे‑छोटे प्रश्नों पर बाँटने की कोशिशों का उल्लेख किया।
उनका यह भी कहना था कि “भारत में कभी एकल ‘हिंदू पूजा पद्धति’ नहीं रही; हमारी साझा पहचान वैदिक काल से ही रही है।” उन्होंने 1881 की जनगणना को उद्धृत करते हुए कहा कि पहली बार “सिख, जैन, बौद्ध, हिंदू” जैसी वर्गीकरण हुई, जिससे पहचान को तोड़ने की कोशिश की गई।
कार्यक्रम में हृदय दीप आश्रम के स्वामी हृदयानंद जी महाराज, विश्व हिंदू परिषद के प्रांत अध्यक्ष राजेश गुप्ता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संघचालक डॉ. गौतम मेंगी तथा कई गणमान्य अतिथियों ने उपस्थिति दर्ज की। अन्य वक्ताओं ने भी अशोक सिंहल जी के प्रेरणादायक जीवन, उनके दूरदर्शी विचार तथा राष्ट्र‑समाज के प्रति उनके योगदान को याद किया और कहा कि अयोध्या धाम की मुक्ति के बाद काशी और मथुरा की मुक्ति के लिए तेज़ गति से कार्य किया जाएगा।
समाप्ति में उन्होंने कहा कि इस वर्ष “हिन्दू धर्मांतरण पर प्रतिबंध, घर‑वापसी को प्रोत्साहन, वैदिक ज्ञान‑विज्ञान का प्रसार, मंदिरों की सरकारी नियंत्रण से मुक्ति तथा सामाजिक समरसता” को बढ़ावा देने के लिए हजारों विचार‑गोष्ठियों और सभाओं का आयोजन किया जाएगा।
