
सीवान, 25 अक्टूबर (प्रेस ब्यूरो)।
छठ महापर्व की चमक‑धमक, घर‑आँगन में पूजा की तैयारियाँ और घाटों पर उमड़ती आस्था के बीच जब माँ साथ नहीं होती, तो उत्सव के बीच एक खालीपन बना रहता है। इस गहरी भावनात्मक पीड़ा को भोजपुरी गायक सुशांत अस्थाना ने अपने हालिया सिंगल ‘माई के बिनु छठ…’ में शब्दों में ढाला है। सीवान जिले के निवासी अस्थाना ने इस गीत के माध्यम से माँ की ममता, छठ की परंपरा और अपनों से बिछड़ने की कसक को लोकभाषा में अभिव्यक्त किया है।
गीत के शुरुआती पंक्तियों में ठेकुआ बनाने, दउरा उठाने और पूजा सामग्री जुटाने जैसे पारंपरिक दृश्यों को चित्रित किया गया है, जिससे ग्रामीण जीवन की सरलता सामने आती है। इन तैयारियों में माँ की भूमिका को याद कर गायक अपने दर्द को बयां करता है, जो उन लोगों के दिल को छूता है जो इस त्यौहार पर अपने मातृस्नेह को खो चुके हैं।
गीत की सबसे प्रभावशाली शक्ति उसके बोलों में निहित है। माँ को संबोधित करते हुए “बिना माँ के छठ का सूरज भी उदास लगता है” जैसी पंक्तियाँ श्रोताओं को उस स्थिति से जोड़ती हैं जहाँ छठ की आस्था बनी रहती है, पर माँ की अनुपस्थिति हर खुशी के बीच गहरी पीड़ा लाती है। इस ग़म को बेटी के दृष्टिकोण से पेश किया गया है, जो माँ के हाथों की तैयारियों और उनके साथ मनाए गये छठ के यादों को फिर से जीवंत बनाता है।
छठ केवल सूर्योपासना का त्यौहार नहीं, बल्कि परिवार, लोकसंस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही परम्पराओं का जश्न भी है। इस संदर्भ में, माँ के बिना छठ मनाने की कल्पना गीत को सामान्य उत्सव गानों से अलग भावनात्मक मंच देती है। गीत में प्रयुक्त स्थानीय शब्दावली और रोज़मर्रा के दृश्यों के माध्यम से भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक पहचान उजागर होती है।
समीक्षात्मक दृष्टिकोण से देखें तो इस गीत की सबसे बड़ी ताकत उसका भावनात्मक पहलू है; यह माँ की स्मृति को छठ की आस्था से जोड़कर उन लोगों के दिलों में आवाज़ भरता है जो त्यौहार के अवसर पर प्रियजन को याद करते हैं। पारंपरिक छठ गीत अक्सर भक्ति, उत्साह और सूर्यदेव के प्रति श्रद्धा पर केन्द्रित होते हैं, पर ‘माई के बिनु छठ…’ में खुशी के बीच छिपे दर्द को उजागर किया गया है, जो इसे संवेदनशील और विशिष्ट बनाता है। कुल मिलाकर, सुशांत अस्थाना का यह प्रयास माँ की ममता और छठ की आस्था के गहरे संबंध को उजागर करता है और यह याद दिलाता है कि लोकपर्वों की असली आत्मा केवल रीति‑रिवाजों में नहीं, बल्कि उन रिश्तों में भी बसी है जो परम्पराओं को जीवित रखती हैं।
