Wednesday, November 4खबर जो असर करे |
Shadow

लेख

घुसपैठ का गहराता संकट, ग्वालियर की घटना से बड़ा सबक लेने की जरूरत

घुसपैठ का गहराता संकट, ग्वालियर की घटना से बड़ा सबक लेने की जरूरत

लेख
डॉ. मयंक चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के ग्वालियर से हाल ही में सामने आया बांग्लादेशी नागरिकों का मामला एक पुलिस कार्रवाई भर नहीं है; यह भारत की आंतरिक सुरक्षा, जनसंख्या संतुलन और प्रशासनिक चौकसी पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। महाराजपुरा एयरबेस जैसे संवेदनशील क्षेत्र के पास बिना वैध दस्तावेजों के बारह वर्षों तक आठ बांग्लादेशी नागरिकों का रहना इस ओर संकेत करता है कि अवैध विदेशी घुसपैठ सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं रही, अब यह देश के भीतर गहराई तक फैल चुकी है। गुजरात में सबसे बड़ी कार्रवाई अप्रैल 2025 में हुई, जब सूरत और अहमदाबाद से हजारों संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों को हिरासत में लिया गया। पुलिस ने पाया कि ये लोग वर्षों से फर्जी पहचान पत्रों और किरायेदारी के आधार पर रह रहे थे। हरियाणा के गुरुग्राम में भी सैकड़ों अवैध घुसपैठियों को पकड़ा गया, जिनमें बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिक शामिल थे। ...
आपातकाल के 50 वर्ष : यह अराजकता और तानाशाही का काला दौर था

आपातकाल के 50 वर्ष : यह अराजकता और तानाशाही का काला दौर था

लेख
यह इंदिरा की सबसे बड़ी गलती थी, सत्ता पर काबिज रहने के लिए की थी लोकतंत्र की हत्या : रामपाल सिंह रामानुज शर्मा नई दिल्ली, 09 अक्टूबर (हि.स.)। आपातकाल को अगर बर्बर, अराजकता और तानाशाही के काले दौर की संज्ञा दी जाये तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह ऐसा वक्त था, जिसमें पुलिस और प्रशासन निरंकुश था। किसी की कोई सुनवाई नहीं थी। ऐसा लगता था कि हम लोकतांत्रिक देश में नहीं, अपितु एक गुलाम देश में रह रहे हों। यह इंदिरा की सबसे बड़ी गलती थी। सत्ता पर काबिज रहने के लिए उन्होंने लोकतंत्र की हत्या की थी। आपातकाल को बर्बर, अराजकता और तानाशाही का काला दौर करार देते हुए अमोद अरोड़ा बताते हैं कि यह ऐसा वक्त था जिसमें पुलिस और प्रशासन निरंकुश था। किसी की कोई सुनवाई नहीं थी। ऐसा लगता था कि हम लोकतांत्रिक देश में नहीं अपितु एक गुलाम देश में रह रहे हों। वे कहते हैं कि आपातकाल का विरोध करने वा...
सीजेआई गवई और राकेश किशोर मामला कहां जाकर थमेगा

सीजेआई गवई और राकेश किशोर मामला कहां जाकर थमेगा

लेख
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारतीय लोकतंत्र की आत्मा उसके संविधान और न्यायपालिका में बसती है, जहां समानता, स्वतंत्रता और न्याय के आदर्शों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। वस्‍तुत: सर्वोच्च न्यायालय को इसी आत्मा का रक्षक कहा जाता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह प्रश्न बार-बार उठ रहा है कि क्या यह रक्षक संस्था सभी समुदायों के लिए समान रूप से न्यायसंगत है? जब मुद्दे बहुसंख्यक समाज, हिन्दू परंपराओं या सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़े होते हैं, तो न्यायिक रवैया अक्सर असहज और असंतुलित दिखाई देता है। जनहित याचिका : उद्देश्य से औपचारिकता तक भारत में जनहित याचिका (पीआईएल) की शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी ताकि समाज के हाशिये पर खड़े लोगों को भी न्याय का दरवाजा खुला मिले। ‘लोकस स्टैंडी’ की दीवार को तोड़कर सुप्रीम कोर्ट ने आम नागरिकों को न्याय की प्रक्रिया में भागीदार बनाया। किंतु धीरे-धीरे यह औजार राजनीत...
संघ के 100 सालः बूंद-बूंद सागर बना

संघ के 100 सालः बूंद-बूंद सागर बना

लेख
मनोज कुमार मिश्र इस विजयादशमी को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्थापना के सौ स्वर्णिम साल पूरे हो गए। सौ साल पहले डाक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने अपने कुछ साथियों के साथ राष्ट्र जागरण के संकल्प के साथ संघ के रूप में एक दीप जलाया था। इन सौ सालों में वह अखंड ज्योति बन कर भारत की आत्मा को आलोकित कर रहा है। उसकी मजबूत उपस्थिति आज समाज के हर क्षेत्र में है। संघ के मौजूदा सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत ने कई बार दोहराया है कि संघ में सबकुछ परिवर्तनशील है, सिवाय इस मूल विश्वास के कि भारत हिन्दू राष्ट्र है। संघ हिन्दू समाज को संगठित करने और उसे सामर्थ्यवान बनाने का काम कर रहा है। वह न तो किसी का तुष्टिकरण करता है न ही किसी से भेदभाव। संघ के आसपास बने विभिन्न संगठनों में कांग्रेस तो एक हद तक अपनी मौजूदगी बनाए हुए है लेकिन जिस नेता (महात्मा गांधी) के बूते उसे आजाद भारत की सत्ता मिली, उसके विचारो...