सौरभ वार्ष्णेय
भारतीय कृषि लंबे समय से बढ़ती लागत और घटती आमदनी की चुनौती व पुरानी रुढि़वादी तकनीक से जूझ रही है। डीजल, बिजली, बीज, कीटनाशक और उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि ने किसानों के सामने आर्थिक संकट को और गहरा किया है। खेती की लागत में उर्वरकों की हिस्सेदारी भी काफी महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से यूरिया की उपलब्धता और उसकी कीमत किसानों के लिए हमेशा एक बड़ा मुद्दा रही है। ऐसे में सरकार द्वारा ग्रीन अमोनिया के इस्तेमाल की संभावनाएं तलाशना एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा सकती है। यदि यह प्रयोग सफल होता है तो आने वाले समय में किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने की दिशा में बड़ा बदलाव संभव है। हालांकि, इस पहल की वास्तविक सफलता केवल तकनीकी प्रयोग तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसका लाभ खेतों में काम करने वाले किसानों तक पहुंचना भी जरूरी है।
किेसानों के लिए खुश खबरी आई है कि सरकार छह राज्यों में लगभग 10 हजार एकड़ भूमि पर ग्रीन अमोनिया के उपयोग का परीक्षण कर रही है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि पारंपरिक नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों के विकल्प के रूप में इसका इस्तेमाल कितना प्रभावी और किफायती हो सकता है। ग्रीन अमोनिया का उत्पादन नवीकरणीय ऊर्जा से तैयार हाइड्रोजन के माध्यम से किया जाता है। इसके विपरीत परंपरागत अमोनिया उत्पादन में मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस से प्राप्त हाइड्रोजन का उपयोग होता है। इस प्रक्रिया में ऊर्जा की अधिक खपत के साथ कार्बन उत्सर्जन भी होता है। इसलिए ग्रीन अमोनिया को न केवल कृषि की लागत कम करने, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक संभावनाशील विकल्प माना जा रहा है।
नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष सारंगी के अनुसार, अमोनिया को सीधे मिट्टी में डालने से उर्वरक की लागत मौजूदा स्तर से लगभग एक-तिहाई तक घट सकती है। यदि यह अनुमान व्यावहारिक रूप से सही साबित होता है तो खाद उत्पादन और कृषि अर्थव्यवस्था के लिए यह महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल भी है कि उत्पादन लागत में संभावित कमी का लाभ किसानों को किस रूप में मिलेगा? क्या इससे यूरिया की खुदरा कीमत घटेगी, या सरकार की सब्सिडी का बोझ कम होगा? इन सवालों का जवाब परीक्षण के परिणाम और सरकार की नीतिगत व्यवस्था से ही मिलेगा।
दरअसल, भारत में यूरिया केवल एक औद्योगिक उत्पाद नहीं, बल्कि कृषि उत्पादन व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। देश में बड़ी संख्या में किसान नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए यूरिया पर निर्भर हैं। सरकार किसानों को सस्ती दरों पर यूरिया उपलब्ध कराने के लिए भारी सब्सिडी देती है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस और कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर उर्वरक क्षेत्र पर पड़ता है। भारत को उर्वरकों के उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल और गैस की उपलब्धता के मामले में भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में स्वच्छ ऊर्जा आधारित अमोनिया का विकल्प देश की आयात निर्भरता कम करने में भी सहायक हो सकता है। हालांकि, ग्रीन अमोनिया को यूरिया का सीधा और तत्काल विकल्प मान लेना जल्दबाजी होगी। अमोनिया एक प्रभावी नाइट्रोजन स्रोत है, लेकिन इसका सुरक्षित भंडारण, परिवहन और खेतों में उपयोग विशेष तकनीकी सावधानी की मांग करता है। यह एक विषाक्त रसायन है और इसके रिसाव से मानव स्वास्थ्य तथा पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए किसानों को इसके इस्तेमाल की उचित जानकारी, सुरक्षा उपकरण और आधुनिक कृषि तकनीक उपलब्ध कराना आवश्यक होगा। इसके अतिरिक्त मिट्टी की प्रकृति, फसल की जरूरत, मौसम और सिंचाई की परिस्थितियों के अनुसार इसके प्रभाव का वैज्ञानिक मूल्यांकन भी जरूरी है।
सबसे महत्वपूर्ण चुनौती ग्रीन अमोनिया की उत्पादन लागत है। नवीकरणीय ऊर्जा से हाइड्रोजन तैयार करने और उसके माध्यम से अमोनिया बनाने के लिए बड़े निवेश, आधुनिक तकनीक और पर्याप्त ऊर्जा की जरूरत होती है। जब तक इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर प्रतिस्पर्धी कीमतों पर नहीं होगा, तब तक किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने का लक्ष्य पूरी तरह हासिल करना आसान नहीं होगा। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस तकनीक के विकास का आर्थिक बोझ अंतत: किसानों पर न पड़े।
भारत में कृषि सुधारों की चर्चा अक्सर नई तकनीक और आधुनिक उत्पादन प्रणालियों तक सीमित रह जाती है, जबकि किसान की सबसे बड़ी चिंता उसकी लागत और उपज का उचित मूल्य है। ग्रीन अमोनिया की पहल को भी इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए। यदि इससे उर्वरकों की कीमत कम होती है, मिट्टी की सेहत बेहतर रहती है और पर्यावरण को नुकसान घटता है तो यह कृषि क्षेत्र के लिए दूरगामी परिवर्तन साबित हो सकता है। लेकिन केवल उत्पादन लागत में कमी का दावा पर्याप्त नहीं है। इसके लिए पारदर्शी मूल्य निर्धारण, वितरण व्यवस्था और किसानों तक तकनीक की पहुंच सुनिश्चित करनी होगी।
इसके साथ ही रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग पर भी ध्यान देना जरूरी है। अत्यधिक यूरिया के इस्तेमाल से मिट्टी के पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ता है और कृषि भूमि की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसलिए ग्रीन अमोनिया को केवल सस्ती खाद के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि टिकाऊ कृषि व्यवस्था के व्यापक हिस्से के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। जैविक खाद, नैनो उर्वरक, प्राकृतिक खेती और मिट्टी परीक्षण जैसी व्यवस्थाओं के साथ इसका संतुलित समन्वय जरूरी है।
निस्संदेह, ग्रीन अमोनिया की दिशा में सरकार का प्रयोग भविष्य की कृषि के लिए उम्मीद जगाता है। लेकिन किसानों को ऐसी योजनाओं के परिणामों के लिए वर्षों तक इंतजार नहीं करना चाहिए। सरकार को परीक्षण के नतीजे सार्वजनिक करने, उत्पादन लागत का वास्तविक आकलन करने और किसानों को मिलने वाले संभावित लाभ का स्पष्ट खाका तैयार करना चाहिए। कृषि प्रधान देश में तकनीकी नवाचार की सार्थकता तभी है, जब उसका लाभ खेत और किसान तक पहुंचे। आखिरकार, ग्रीन अमोनिया का उद्देश्य केवल हरित ऊर्जा को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि किसान की जेब पर पडऩे वाला बोझ कम करना भी होना चाहिए। सस्ती खाद, स्वस्थ मिट्टी और खुशहाल किसान ही इस नई पहल की वास्तविक सफलता का पैमाना होंगे।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।
