नई दिल्ली। शादियों के सीजन से पहले सर्राफा बाजारों (Bullion Markets) में सोने की चमक तेज (Gold Shines Brighter) होने लगी है। इस अगस्त में दूसरी सबसे तेज रैली देखी जा रही है। घरेलू मार्केट (Domestic Market) में सोने का हाजिर भाव जहां इस महीने 11008 रुपये बढ़ चुका है, वहीं इंटरनेशनल मार्केट में यह $4,500 के पर पहुंच गया है। IBJA के रेट्स के मुताबिक 31 जुलाई 2026 को भारत के सर्राफा बाजारों में सोना 142860 रुपये प्रति 10 ग्राम पर था और 19 अगस्त को यह 153868 रुपये पर बंद हुआ।
बुधवार, 19 अगस्त 2026 को ग्लोबल मार्केट (Global market) में स्पॉट गोल्ड की कीमतों (Spot gold prices) में हल्की मुनाफावसूली देखी गई, लेकिन सोना अब भी 4,500 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर मजबूती से टिका हुआ है। इस महीने अब तक सोने की कीमतों में 11% का इजाफा हो चुका है और अगस्त साल का दूसरा सबसे शानदार महीना बनता जा रहा है। पहला स्थान जनवरी का है, जब कीमतें 13% बढ़ी थीं।
अगस्त में सोना क्यों चमका?
कारण नंबर 1: महीने की शुरुआत अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा सितंबर में ब्याज दरें बढ़ाने की आशंका के साथ हुई, और इसकी संभावना 70% से भी ऊपर थी। आमतौर पर ब्याज दरें बढ़ने पर सोना कमजोर पड़ता है, क्योंकि वह ब्याज नहीं देता।
कारण नंबर 2: इसी महीने आई अमेरिकी रोजगार रिपोर्ट ने श्रम बाजार की सुस्त तस्वीर पेश कर दी, जिससे ब्याज दर बढ़ने की संभावना घटकर 50% से नीचे आ गई। फिर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) और थोक मूल्य सूचकांक (PPI) के आंकड़े आए, जिनमें ऊर्जा की कीमतों को छोड़ दें तो महंगाई दबाव कम होता दिखा।
दोनों ही आंकड़े अर्थशास्त्रियों की उम्मीद से बेहतर थे। इसके बाद तो ब्याज दर बढ़ने की संभावना सीधे 32% पर आ गिरी, और बाकी की संभावना अब यही दिखाती है कि फेड सितंबर में भी ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा।
कारण नंबर 3: अमेरिकी ट्रेजरी की बुधवारीय दखल ने बॉन्ड यील्ड को नीचे ला दिया और अमेरिकी डॉलर भी कमजोर हुआ। इन दोनों ने मिलकर सोने की कीमत को 4,500 डॉलर प्रति औंस के पार पहुंचाने में बड़ा हाथ दिया। कमजोर डॉलर सोने के लिए फायदेमंद है, क्योंकि इससे विदेशी खरीदारों को सोना सस्ता पड़ता है, जिससे मांग बढ़ती है और कीमतें और ऊपर चली जाती हैं।
क्या यह तेजी टिकाऊ है
इस महीने की तेजी के बावजूद, सोने की राह में कई रोड़े अब भी हैं। कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं, और भू-राजनीतिक तनाव भी कम नहीं हुआ है। अगर तेल की कीमत और बढ़ी तो महंगाई फिर से सिर उठा सकती है, जिससे फेड की मौजूदा ब्याज न बढ़ाने की नीति पर खतरा पैदा हो जाएगा। मध्य-पूर्व में किसी समझौते की उम्मीद भी फिलहाल मुश्किल लगती है।
