
मेदिनीपुर, 05 नवंबर (प्रेस ब्यूरो)। सेतुआ परिवार की काली पूजा शहर के पाटनाबाजार में स्थित सेतुआ लेन पर आयोजित की जाती है और यह 100 से अधिक वर्ष पुरानी परंपरा को जीवित रखने का एक अनूठा प्रयास है। इतिहास के अनुसार, लगभग सौ वर्ष पहले परिवार के प्रपितामह सुरेंद्रनाथ सेतुआ ने स्वप्नादेश मिलने के बाद माँ काली की पूजा शुरू की थी। तब से पीढ़ी दर पीढ़ी इस परंपरा को अनन्य श्रद्धा और निष्ठा के साथ आगे बढ़ाया गया है। इसी कारण से इस क्षेत्र का नाम भी सेतुआ लेन पड़ा, जो इस पूजा को क्षेत्र के इतिहास से गहराई से जोड़ता है।
यह काली पूजा में कभी भी पशुबलि की परंपरा नहीं रही है; परिवार के सदस्यों ने गोस्वामी मत के अनुसार माँ के प्रति भक्ति के साथ पूजा और सभी अनुष्ठान संपन्न किए हैं। माँ सेतुआ काली को एक जागृत देवी के रूप में माना जाता है, और इस कारण से पूजा के अवसर पर दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु यहाँ दर्शन के लिये आते रहे हैं।

पहले के दिनों में भव्य आयोजन में ढाक, ढोल और विभिन्न वाद्य यंत्रों की धुन पर सुबह से रात तक पूजा की रस्में चलती थीं। शाम को नैवेद्य अर्पित करने के बाद आतिशबाजी और पटाखों से उत्सव का उल्लास चारों ओर फैलता था। अगले दिन श्रद्धालु अन्नकूट के प्रसाद को ग्रहण करते थे। समय के साथ कुछ नियमों में बदलाव हुआ है, परंतु मूल परंपरा आज भी जीवित है। अब बैंड या डीजे की जगह परिवार के सदस्य ही सभी धार्मिक अनुष्ठान करते हैं और शांतिपूर्ण माहौल में प्रतिमा विसर्जन भी पारंपरिक ढंग से किया जाता है।
इस वर्ष के लिए पूजा मंडप के निर्माण और माँ की प्रतिमा बनाने के कार्य तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं। परिवार के वंशज अलग-अलग जगहों पर रहते हैं, परंतु पूजा के समय सभी एक साथ मिलकर मिलाप और उत्साह का माहौल बनाते हैं। नई पीढ़ी भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है।
कुछ स्थानीय लोगों का मानना है कि माँ सेतुआ काली की प्रतिमा का रूप लछिपोद्धार की काली प्रतिमा से समान है, और दोनों को दो बहनों के रूप में देखा जाता है। यह मान्यता और लोकविश्वास इस पूजा के आकर्षण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस प्रकार, 100 वर्ष से अधिक पुरानी सेतुआ परिवार की काली पूजा आज भी मेदिनीपुर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का अनमोल प्रतीक बनी हुई है।
