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कब तक अभियान और अनुदान के भरोसे होगा जल संरक्षण?

– नीलेश वर्मा

जल संकट अब किसी एक गांव, शहर या प्रदेश की समस्या नहीं रह गया है, देश के अनेक जिले आज तेजी से सूखाग्रस्त घोषित हो रहे हैं। अनियमित मानसून एवं भूजल के लगातार गिरते स्तर से आने वाले समय की बड़ी चुनौती हमारे सामने खड़ी है। बारिश का मौसम अभी समाप्त ही हुआ है और जल का पर्याप्त संचय नहीं कर पाने का परिणाम हमारे सामने है। आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब तक जल संरक्षण के नाम पर हम अभियान, सरकारी योजनाएं और आर्थिक अनुदान के भरोसे बैठे रहेंगे? क्या जल संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी है? इसलिए अब प्रत्येक नागरिक को अपनी भूमिका निभानी होगी, क्योंकि जल ही जीवन है और यही हमारे कल को निर्धारित करेगा। भारत में विभिन्न राज्यों  के अनेक जिलों में सूखे की स्थिति नीचे जानेंगे, जो आगामी ग्रीष्म ऋतु में गंभीर जल संकट का रूप ले सकती है

हाल के दिनों में महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में सूखे के हालात ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है। महाराष्ट्र में सितंबर 2026 में पहले 265 तालुकाओं को सूखाग्रस्त घोषित किया गया, वहीं अक्टूबर में इस सूची का विस्तार करते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 305 तालुकाओं को सूखा प्रभावित क्षेत्र में शामिल करने की जानकारी दी। प्रभावित किसानों को तत्काल राहत देने के लिए 5 हजार रुपये की अग्रिम सहायता के साथ ही भू-राजस्व, फसल ऋण और बिजली बिलों में रियायत जैसे कदम उठाए गए। यह स्थिति बताती है कि सूखे का दायरा कितना व्यापक हो सकता है और उसका असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आम जनजीवन को भी प्रभावित करता है।

मध्य प्रदेश में भी कम बारिश के कारण कई क्षेत्रों में चिंता की स्थिति बनी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में 27 अक्टूबर को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में कम वर्षा से प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति की समीक्षा की गई। प्रभावित जिलों में सूखे के आकलन के लिए वैज्ञानिक मापदंडों के आधार पर स्थानीय स्तर पर सर्वे कराने और किसानों को राहत देने की दिशा में कार्यवाही पर जोर दिया गया। दूसरी ओर सिंचाई परियोजनाओं को मजबूत करने के लिए 3,378 करोड़ 69 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की गई। यह स्पष्ट है कि सरकारें संकट के समय राहत और दीर्घकालीन सिंचाई व्यवस्था के लिए प्रयास कर रही हैं, लेकिन केवल राहत और परियोजनाओं से जल संकट का स्थायी समाधान संभव नहीं है। सूखे की स्थिति सामने आने के बाद राहत पैकेज, मुआवजा, टैंकरों से जलापूर्ति और अतिरिक्त बजट की जरूरत पड़ती है। ये सभी कदम संकट के समय आवश्यक हैं। किसानों को राहत मिलनी चाहिए और आम नागरिकों को पेयजल उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व है। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि संकट आने के बाद राहत देना और संकट आने ही न देने के लिए पानी सहेजना, दोनों अलग-अलग विषय हैं। यदि हर साल बारिश के बाद पानी बिना एकत्र किये ही बहकर निकलता रहेगा और भूजल का दोहन उसकी भरपाई से अधिक होगा तो देश की निर्भरता सरकारी योजनाओं और अनुदान पर बढ़ती जाएगी।

देश के प्रत्येक नागरिक को जल संरक्षण के लिए अपनी सोच बदलने का समय आ गया है। अब जल संरक्षण को किसी सरकारी अभियान, योजना या अनुदान तक सीमित न रखकर व्यक्तिगत जिम्मेदारी और सामाजिक संकल्प बनाना होगा। प्रत्येक नागरिक को यह समझना होगा कि जितना पानी वह उपयोग करता है, उसके संरक्षण और पुनर्भरण में भी उसकी उतनी ही भागीदारी होनी चाहिए। इसी सोच को ‘अपनी जरूरत-अपना जल’ के सिद्धांत के रूप में अपनाना होगा।

इसके लिए सबसे पहले वर्षा जल संचयन को घर, निजी एवं सरकारी भवन, स्कूल, कार्यालय और सार्वजनिक संस्थानों की अनिवार्य व्यवस्था बनाने की जरूरत है, जिससे अपनी जरूरतों के अनुसार जल संचय किया जा सके। इसके लिए छतों पर गिरने वाले बारिश के पानी को नालियों में बहाने के बजाय संग्रहित किया जाए या रिचार्ज पिट के माध्यम से जमीन में पहुंचाया जाए। गांवों में पुराने तालाबों, कुओं, बावड़ियों और जल संरचनाओं को पुनर्जीवित किया जाए। खेतों में मेड़बंदी, प्रत्येक छोटी नदी जो अब नाले के रूप में बह रही है, उन पर छोटे चेकडैम, खेत तालाब और जलग्रहण क्षेत्र का विकास करना होगा। शहरों में जल निकासी की व्यवस्था ऐसी हो कि बारिश का पानी केवल बाढ़ और जलभराव का कारण न बनते हुए स्वच्छ भूजल के पुनर्भरण का माध्यम भी बने।

भारत में जल संरक्षण की सफलता केवल योजनाएं बनाने से नहीं मिलेगी, बल्कि पानी के उपयोग में अनुशासन भी उतना ही जरूरी है। घरों में अनावश्यक बहते नल बंद करना व मीटर का प्रयोग आवश्यक है। जरूरत के अनुसार पानी का उपयोग करना और जहां संभव हो वहां उपयोग किए गए पानी का पुनः इस्तेमाल करना छोटे कदम जरूर हैं, लेकिन सामूहिक रूप से इनका बड़ा प्रभाव हो सकता है। खेती में भी फसल चयन, सिंचाई की आधुनिक तकनीक और स्थानीय जल उपलब्धता के अनुरूप कृषि पद्धतियां अपना कर किसान भाई सीमित जल का उचित प्रयोग कर सकते हैं। आज कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाली तकनीकों और फसलों को प्रोत्साहित करना समय की मांग है, जिसे सरकार व आमजन को संयुक्त रूप से पूरा करना होगा।

जल संरक्षण में सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रत्येक नागरिक की भागीदारी के बिना कोई भी योजना पूरी तरह सफल नहीं हो सकती। पंचायतों, नगरीय निकायों, सामाजिक संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों और उद्योगों को अपने-अपने क्षेत्र में जल बजट तैयार करने की दिशा में काम करना चाहिए। हर गांव और शहर यह आकलन करे कि उसके पास वर्षा के माध्यम से कितना पानी उपलब्ध होता है, कितनी खपत होती है और कितना पानी भूजल के रूप में वापस जमीन में पहुंचाया जा रहा है। जब तक स्थानीय स्तर पर पानी का हिसाब नहीं होगा, तब तक जल प्रबंधन की योजनाएं भी अधूरी रहेंगी।

आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हर साल नए अभियान की घोषणा हो या जल संरक्षण के नाम पर अनुदान की प्रतीक्षा की जाए। आवश्यकता इस बात की है कि पहले से उपलब्ध जल स्रोतों को बचाने, वर्षा जल को रोकने और भूजल स्तर बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास हों। सरकारी सहायता को जनभागीदारी का विकल्प नहीं, बल्कि उसे गति देने का माध्यम बनाया जाए। जल संरक्षण का काम केवल बजट खर्च करने या लक्ष्य पूरा करने तक सीमित न रहे, बल्कि उसका परिणाम जमीन पर दिखाई देना चाहिए। पानी प्रकृति का ऐसा संसाधन है, जिसका कोई वास्तविक विकल्प नहीं है। आज हम जितना जल बचाएंगे, आने वाली पीढ़ियों को उतना ही सुरक्षित भविष्य दे सकेंगे। इसलिए जल संकट को केवल सूखे के समय याद करने के बजाय इसे सालभर की प्राथमिकता बनाना होगा। हर नागरिक, हर परिवार, हर गांव और हर शहर को यह संकल्प लेना होगा कि अपनी जरूरत का पानी बचाने और सहेजने की जिम्मेदारी स्वयं निभाएंगे। अब जल संरक्षण का मूलमंत्र केवल अभियान नहीं, व्यवहार परिवर्तन होना चाहिए, क्योंकि भविष्य में पानी की उपलब्धता इस बात से तय होगी कि आज हमने उसे कितना सहेजा है। ‘अपनी जरूरत, अपना जल’ केवल नारा नहीं, आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी और जल आत्मनिर्भरता का संकल्प बनना चाहिए।

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