
नई दिल्ली, 29 अक्टूबर (प्रेस ब्यूरो)। विश्व में शांति, सहयोग और सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र का गठन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किया गया। इस नई अंतरराष्ट्रीय संस्था के चार्टर पर 26 जून 1945 को हस्ताक्षर हुए और 24 अक्टूबर 1945 को यह प्रभावी रूप से लागू हुआ। जब संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की जा रही थी, तब भारत अभी भी ब्रिटिश शासन के अधीन था, परन्तु वह इस संगठन के संस्थापक सदस्य देशों में से एक बन गया।
विलियम डब्ल्यू. डेज़ी, तब के ब्रिटिश वाणिज्य मंत्री, ने कहा कि “भारत का योगदान हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वह एशिया‑प्रशांत क्षेत्र में शांति व स्थिरता के लिए एक प्रमुख शक्ति है।” भारतीय प्रतिनिधि मंडल ने शांति, समानता और मानव अधिकार को संयुक्त राष्ट्र के मुख्य सिद्धांतों में शामिल करने के लिए दृढ़ संकल्प व्यक्त किया। भारत ने प्रथम बार संयुक्त राष्ट्र के महासभा में भाग लेकर अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए अपने विचार रखे और यह स्पष्ट किया कि वह भविष्य में भी विश्व शांति के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएगा।
संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक सदस्यों में भारत की भागीदारी को इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है, क्योंकि इसने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान विकसित हुई भारतीय विदेश नीति के सिद्धांतों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित किया। भारतीय प्रतिनिधियों ने विशेष रूप से आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और नस्लीय समानता को विश्व स्तर पर प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
आज भी 30 अक्टूबर को स्मरण किया जाता है कि कैसे भारत ने अपने स्वतंत्रता के संघर्ष के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय शांति, समानता और मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देने के लिये संयुक्त राष्ट्र के मंच पर अपना योगदान दिया। इस ऐतिहासिक घटना ने न केवल भारत की विदेश नीति को आकार दिया, बल्कि विश्व को भी एक अधिक न्यायसंगत और शांतिपूर्ण भविष्य की ओर अग्रसर किया।
