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मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का भारत पर क्या होगा असर? जानिए 5 बड़े प्रभाव

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। यदि क्षेत्र में संघर्ष और गहराता है या होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) में समुद्री आवाजाही प्रभावित होती है, तो इसका असर भारत सहित दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए विशेषज्ञ संभावित आर्थिक प्रभावों पर नजर बनाए हुए हैं।

  1. तेल और गैस की आपूर्ति पर पड़ सकता है असर

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है। भारत के कच्चे तेल और एलएनजी (LNG) आयात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है। यदि इस समुद्री मार्ग पर आवाजाही बाधित होती है, तो तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे ऊर्जा लागत बढ़ने की आशंका रहेगी।

  1. बढ़ सकता है भारत का आयात बिल

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है। यदि लंबे समय तक तेल महंगा रहता है, तो चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) और विदेशी मुद्रा पर भी दबाव बढ़ सकता है।

  1. ईंधन की कीमतों पर पड़ सकता है दबाव

यदि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी बनी रहती है, तो इसका असर घरेलू स्तर पर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर भी पड़ सकता है। हालांकि खुदरा ईंधन कीमतों में बदलाव कई अन्य कारकों और सरकारी नीतियों पर भी निर्भर करता है, इसलिए किसी तत्काल वृद्धि की पुष्टि नहीं की जा सकती।

  1. महंगाई बढ़ने का जोखिम

ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों, उपभोक्ता वस्तुओं और औद्योगिक उत्पादों की लागत भी बढ़ सकती है। इससे खुदरा महंगाई पर दबाव आने की आशंका रहती है और भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

  1. शेयर बाजार और निवेशकों की चिंता

भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने पर वैश्विक वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता का माहौल बनता है। ऐसे समय में निवेशक जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाकर सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख करते हैं। इसका असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई दे सकता है, जहां अस्थिरता और बिकवाली बढ़ने की संभावना रहती है।

भारत के पास क्या हैं विकल्प?

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत ने पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता लाने, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बढ़ाने और वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था विकसित करने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। इससे किसी संभावित वैश्विक संकट के प्रभाव को कुछ हद तक कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार और भारतीय अर्थव्यवस्था दोनों पर इसका असर पड़ सकता है।

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