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क्या व्हेल मछलियों की भी होती है अपनी संस्कृति? जानिए कैसे 20 हजार सालों में बदल गई इन समुद्री दिग्गजों की जुबान

नई दिल्‍ली। जैसे भारत में कुछ किलोमीटर की दूरी पर इंसानों की भाषा और बोली बदल जाती है, ठीक वैसे ही समुद्र की गहराइयों में भी कुछ ऐसा ही चल रहा है. वैज्ञानिकों ने एक बेहद हैरान करने वाली खोज में पता लगाया है कि विशालकाय स्पर्म व्हेल (Sperm Whales) भी इंसानों की तरह अलग-अलग क्षेत्रीय बोलियों (Regional Dialects) का इस्तेमाल करती हैं. भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) में पिछले दो दशकों से किए जा रहे एक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि पूर्वी और पश्चिमी हिस्से में रहने वाली व्हेल्स एक ही बात को अलग-अलग रफ्तार और अंदाज में बोलती हैं. आइए जानते हैं समुद्र के नीचे चल रहे इस दिलचस्प कम्यूनिकेशन के पीछे का पूरा विज्ञान.
क्या है व्हेल्स का यह सीक्रेट कोड?
स्पर्म व्हेल आपस में बातचीत करने के लिए एक खास तरह की आवाज निकालती हैं, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘कोडा’ (Coda) कहा जाता है. यह कोडा असल में क्लिक-क्लिक की आवाजों का एक लयबद्ध सीक्वेंस होता है. प्रोसीडिंग्स ऑफ द रॉयल सोसाइटी बी में छपी इस रिसर्च के लिए वैज्ञानिकों ने लगभग 20 सालों तक समुद्र के नीचे से 5,291 कोडा रिकॉर्डिंग्स को इकट्ठा किया और उनका बारीकी से एनालिसिस किया.
पूर्वी और पश्चिमी व्हेल्स में मिला बड़ा अंतर

सालों से वैज्ञानिकों का मानना था कि भूमध्य सागर की सभी स्पर्म व्हेल्स एक ही सांस्कृतिक समूह का हिस्सा हैं और वे बातचीत के लिए ‘3+1’ कोडा का इस्तेमाल करती हैं. इस कोड में पहले तीन बार क्लिक की आवाज आती है, फिर एक छोटा सा पॉज होता है और फिर चौथी क्लिक होती है. लेकिन नए विश्लेषण से पता चला है कि पूर्वी भूमध्य सागर (विशेषकर ग्रीस के पास) रहने वाली व्हेल्स, स्पेन के पास रहने वाली पश्चिमी व्हेल्स की तुलना में इसी कोड को बहुत ज्यादा तेजी से बोलती हैं.
पुरानी भाषा भी याद रखती हैं व्हेल्स

इस रिसर्च में एक और बेहद दिलचस्प बात सामने आई है. पश्चिमी हिस्से की व्हेल्स तो हमेशा अपनी पारंपरिक और धीमी बोली का ही इस्तेमाल करती हैं. लेकिन पूर्वी हिस्से की व्हेल्स, जो अब तेज रफ्तार वाली नई बोली सीख चुकी हैं, वे कभी-कभी अचानक अपनी पुरानी पश्चिमी बोली में भी बात करने लगती हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई इंसान अपनी नई भाषा सीखने के बाद भी अपनी पुरानी मातृभाषा को नहीं भूलता और वक्त आने पर उसका इस्तेमाल करता है.
20 हजार साल पुराना है इतिहास

वैज्ञानिकों के अनुसार, स्पर्म व्हेल्स का यह समूह करीब 20,000 साल पहले जिब्राल्टर जलडमरूमध्य से होते हुए भूमध्य सागर में दाखिल हुआ था. इसके बाद ये व्हेल्स पूर्व की तरफ फैल गईं. भौगोलिक रूप से एक-दूसरे से अलग रहने के कारण, पीढ़ियों दर पीढ़ियों इनकी बातचीत का तरीका बदल गया और इन्होंने अपनी एक नई क्षेत्रीय बोली विकसित कर ली. वर्तमान में भूमध्य सागर में इन व्हेल्स की संख्या बहुत कम बची है और ये विलुप्त होने की कगार पर हैं.
इंसानी विकास को समझने में मिलेगी मदद

यह खोज इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह साबित करती है कि संस्कृति और कम्यूनिकेशन का विकास सिर्फ इंसानों तक ही सीमित नहीं है. जानवर भी अपने समाज और माहौल के हिसाब से अपनी भाषा को बदलते और संवारते हैं. वैज्ञानिक अब इस बात की गहराई से जांच कर रहे हैं कि पूर्वी व्हेल्स ने आखिर तेज रफ्तार में बोलना क्यों शुरू किया, जिससे भविष्य में जानवरों के सामाजिक व्यवहार को समझने में बड़ी मदद मिलेगी.

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