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स्त्री की स्वतंत्रता पर बढ़ता बाजार और बदल रही सौंदर्य दृष्टि

-डा. अरविंद नाथ तिवारी
आज की स्त्री स्वयं को पुरुषवादी व्यवस्था की बेड़ियों से मुक्त करने के लिए संघर्षरत है। वह अपने अधिकार, स्वतंत्र निर्णय और समानताओं के लिए आवाज उठा रही है। यह संघर्ष निःस्संदेह समय की आवश्यकता है क्योंकि सदियों से चली आ रही सामाजिक रूढ़ियों ने स्त्री की स्वतंत्रता को सीमित करने का प्रयास किया है लेकिन इस संघर्ष के बीच एक गंभीर प्रश्न भी खड़ा होता है कि क्या स्वतंत्रता की तलाश में स्त्री अनजाने उसी बाजारवादी व्यवस्था के हाथों का खिलौना बनती जा रही है, जिसका वह विरोध करना चाहती है? क्या आधुनिकता के नाम पर उसकी पसंद, पहनावा और सौंदर्यबोध को बाजार की शक्तियां नियंत्रित कर रही हैं? यह प्रश्न स्त्री की स्वतंत्रता का विरोध नहीं बल्कि स्वतंत्रता के वास्तविक स्वरूप को समझने का प्रयास है।

वर्तमान समय में पहनावों को लेकर समाज में तेजी से बदलाव आया है। वस्त्रों की शैली, उनकी बनावट और शरीर को प्रदर्शित करने के तौर-तरीकों में व्यापक परिवर्तन दिखाई दे रहा है। इस परिवर्तन को आधुनिकता, व्यक्तिगत पसंद और आत्मविश्वास से जोड़कर देखा जा रहा है लेकिन इसके साथ यह समझना भी जरूरी है कि किसी व्यक्ति की पसंद कितनी स्वतंत्र है और कितनी विज्ञापन, फिल्म, फैशन उद्योग तथा सोशल मीडिया द्वारा निर्मित की गई है। बाजार केवल वस्तुएं नहीं बेच रहा, वह इच्छाएं भी पैदा कर रहा है। वह सुंदरता की परिभाषा गढ़ रहा है, आकर्षण के मानक निर्धारण भी कर रहा है और फिर उन्हीं मानकों के अनुरूप बनने के लिए उपभोक्ताओं को प्रेरित कर रहा है। इस प्रक्रिया में स्त्री का शरीर एक बड़े व्यावसायिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। सौंदर्य प्रसाधनों से लेकर परिधान, फिल्म, विज्ञापन और मनोरंजन उद्योग तक, स्त्री की छवि का इस्तेमाल उत्पादों को आकर्षक बनाने के लिए किया जा रहा है। विडंबना यह है कि स्त्री को अपनी पसंद का अधिकार देने का दावा करने वाला बाजार कई बार उसकी पसंद को भी अपने लाभ के अनुसार दिशा दे रहा है, ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि स्त्री जो पहन रही है, वह उसकी स्वतंत्र अभिव्यक्ति है या उस अभिव्यक्ति पर बाजार के प्रभाव का परिणाम?

पुरुषवादी व्यवस्था हमेशा स्त्री पर प्रत्यक्ष प्रतिबंध लगाकर ही काम नहीं करती। कई बार वह आकर्षण, प्रशंसा और सामाजिक स्वीकृति के माध्यम से भी अपने मानदंड स्थापित करती है। पहले स्त्री से अपेक्षा की जाती थी कि वह समाज की निर्धारित मर्यादाओं के अनुरूप रहे। आज कुछ क्षेत्रों में उसके सामने एक दूसरी अपेक्षा खड़ी कर दी गई है- वह आधुनिक दिखे, आकर्षक लगे, अपनी देह को प्रदर्शित करने से संकोच नहीं करे और प्रचलित सौंदर्य मानकों पर खरी उतरे, यहां विरोधाभास दिखाई देता है। जिस स्त्री को पहले उसके शरीर को ढंकने के लिए सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ता था, वही स्त्री आज कुछ परिस्थितियों में शरीर को अधिक प्रदर्शित करने के लिए सामाजिक और व्यावसायिक दबाव झेल रही है। दोनों स्थितियों में समस्या वस्त्रों की लंबाई या बनावट मात्र नहीं बल्कि स्त्री के निर्णय पर किसी दूसरे की अपेक्षाओं का प्रभाव है। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या स्त्री को अपनी पसंद चुनने की स्वतंत्रता है या उसे किसी खास तरह से दिखने के लिए विवश किया जा रहा है?

एक समय सुंदरता का मूल्यांकन चेहरे की सहजता, व्यक्तित्व, व्यवहार, संवेदनशीलता और विचारों की परिपक्वता से किया जाता था। आज भी ये गुण महत्वपूर्ण हैं लेकिन लोकप्रिय संस्कृति के कुछ हिस्सों में शारीरिक आकर्षण को असाधारण महत्व मिलने लगा है। आकर्षक दिखने की प्रतिस्पर्धा, सोशल मीडिया पर प्रशंसा पाने की आकांक्षा और लोकप्रियता की दौड़ ने इस प्रवृत्ति को और बल दिया है। फैशन उद्योग और मनोरंजन जगत में स्त्री की देह को आकर्षण का माध्यम बनाना कोई नई बात नहीं है। अंतर यह है कि अब डिजिटल मंचों के कारण यह प्रक्रिया अधिक व्यापक और निरंतर हो गई है।

वस्त्रों से आगे विचारों का प्रश्न

वस्त्र किसी व्यक्ति की संपूर्ण संस्कृति, नैतिकता या चरित्र का प्रमाण नहीं होते। शालीनता का निर्धारण केवल कपड़ों की लंबाई से नहीं किया जा सकता, न ही आधुनिक परिधान किसी के संस्कारहीन होने का प्रमाण हैं। इसी प्रकार पारंपरिक वेशभूषा पहनने वाला प्रत्येक व्यक्ति नैतिक रूप से श्रेष्ठ हो, यह भी आवश्यक नहीं है। इसलिए चिंता का विषय यह नहीं होना चाहिए कि स्त्री क्या पहन रही है बल्कि यह होना चाहिए कि समाज उसके पहनावे को किस दृष्टि से देखता है और बाजार उसकी छवि का किस प्रकार उपयोग करता है। यदि किसी विज्ञापन में स्त्री को केवल उपभोग की वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तो उस प्रस्तुति की आलोचना आवश्यक है। लेकिन उसी आधार पर स्त्री के निजी निर्णयों पर प्रतिबंध लगाने की मांग करना भी स्वतंत्रता के सिद्धांत के विरुद्ध होगा।

भारतीय समाज आज परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद के दौर से गुजर रहा है। एक ओर परिवार, संस्कृति और सामाजिक उत्तरदायित्व की अपेक्षाएं हैं तो दूसरी ओर व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और आत्मनिर्णय की आकांक्षाएं। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना समय की आवश्यकता है। पश्चिमी समाजों की नकल करना या हर आधुनिक प्रवृत्ति को सांस्कृतिक पतन मान लेना, दोनों ही दृष्टिकोण अधूरे हैं। प्रत्येक समाज को अपने अनुभव, मूल्य और बदलती परिस्थितियों के आधार पर विवेकपूर्ण निर्णय लेना चाहिए। संस्कृति कोई स्थिर वस्तु नहीं है; वह समय के साथ बदलती है लेकिन परिवर्तन की दिशा का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उससे मनुष्य की गरिमा, स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता मजबूत होती है या कमजोर।

वर्जनाहीन खुलेपन की बहस का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि स्वतंत्रता और बाजार द्वारा निर्मित इच्छाओं के बीच अंतर पहचाना जाय। बाजार का उद्देश्य लाभ कमाना है इसलिए वह मनुष्य की भावनाओं, इच्छाओं और आकर्षणों का व्यावसायिक उपयोग कर सकता है, ऐसे में स्त्री हो या पुरुष, दोनों के लिए यह समझना आवश्यक है कि उनकी पसंद के पीछे कौन-सी शक्तियां काम कर रही हैं। स्त्री को पुरुषवादी मानसिकता से मुक्त करना आवश्यक है लेकिन उसे बाजारवादी मानसिकता के अधीन हो जाने से बचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अंततः प्रश्न यह नहीं है कि स्त्री कितना ढंक रही है या कितना प्रदर्शित कर रही है। असली प्रश्न यह है कि उसके निर्णय का स्वामी कौन है- वह स्वयं, समाज की रूढ़ियां या बाजार की लाभ-केंद्रित दृष्टि?

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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