
प्रयागराज, 17 अक्टूबर (प्रेस ब्यूरो)। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गाजियाबाद के इंदिरापुरम थाने में दर्ज एक मामले में अभियुक्त पंकज राघव के विरुद्ध एससी/एसटी एक्ट और भारतीय दंड संहिता के तहत चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने दिया।
शिकायतकर्ता सुनीत कुमार जाटव का कहना है कि 2024 में उनकी फर्म ने ग्रीनेक्स इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रा. लि. के साथ पंजीकृत संयुक्त विकास समझौता किया था। आरोप है कि कंपनी के शेयरधारक एवं निदेशक पंकज राघव ने उन्हें निजी खाते में धन हस्तांतरण करने का दबाव डाला, अज्ञात व्यक्तियों के माध्यम से धमकियां दिलवाईं और उनके व्यापार में बाधा उत्पन्न की।
शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया कि 27 नवंबर 2025 को पंकज राघव ने जातिसूचक अपशब्द कहे, अवैध वसूली की मांग की और झूठे मामलों में फँसाने की धमकी दी। जांच के बाद आरोपपत्र दाखिल किया गया और गाजियाबाद के विशेष न्यायाधीश ने 13 मई 2026 को आदेश पारित किया, जिसके विरुद्ध अभियुक्त ने धारा 14‑ए(1) के तहत हाई कोर्ट में अपील दायर की।
हाई कोर्ट ने कहा कि मामला मुख्यतः वित्तीय एवं व्यावसायिक विवाद से उत्पन्न हुआ है और अज्ञात व्यक्तियों से धमकी दिलाने का आरोप अस्पष्ट है। प्राथमिकी में घटना का समय नहीं दर्शाया गया और यह नहीं स्पष्ट है कि कथित शब्द पीड़ित को उसकी जाति के कारण अपमानित करने की मंशा से बोले गये थे।
शिकायतकर्ता का दावा है कि अभियुक्त को प्राथमिकी में “चमार” व “चमेट्टे” जैसे शब्दों के प्रयोग का आरोप है तथा गवाह सचिन कुमार के बयान से घटना स्थल पर उसकी मौजूदगी सिद्ध होती है। कोर्ट ने कहा कि प्राथमिकी से यह स्पष्ट नहीं होता कि कोई विशिष्ट जातिसूचक शब्द केवल अनुसूचित जाति से संबंधित होने के कारण अपमानित करने की मंशा से उपयोग किया गया। रिकॉर्ड दर्शाता है कि दोनों पक्षों के बीच घनिष्ठ व्यावसायिक संबंध थे और विवाद वित्तीय लेन‑देनों से उत्पन्न हुआ। कोर्ट ने यह भी कहा कि घटना “सार्वजनिक दृष्टि” में हुई, इसका कोई प्रमाण नहीं है, जबकि यह शर्त इन धाराओं के लिये अनिवार्य है। केवल शिकायतकर्ता के अनुसूचित जाति का सदस्य होना अपराध सिद्ध नहीं करता, जब तक अपमान या धमकी का कारण उसकी जाति न हो। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमा निजी रंजिश या दीवानी विवाद को दबाव बनाने के साधन के रूप में नहीं बनाया जा सकता, हालांकि दीवानी विवाद के अस्तित्व से कार्यवाही रद्द नहीं होती, जब तक कि प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध न स्थापित हो।
