नई दिल्ली। विपक्ष के INDIA गठबंधन में हालिया टूट और बड़े पैमाने पर हुए दलबदल (AAP के 7, TMC के 20 और UBT के 6 सांसदों के पाला बदलने) के बाद, मोदी सरकार के लिए संसद का नया गणित काफी अनुकूल हो गया है. हालांकि पूर्ण बहुमत अभी भी दूर है, लेकिन सरकार के लिए विधायी कामकाज और महत्वपूर्ण बिल पास कराना पहले से कहीं अधिक आसान हो गया है. हाल के दिनों में विपक्षी खेमे में बढ़ी राजनीतिक हलचल ने संसद के शक्ति संतुलन को प्रभावित किया है.
INDIA गठबंधन के कई सांसदों के अलग-अलग राजनीतिक दलों की ओर रुख करने के बाद सत्ता पक्ष की स्थिति पहले की तुलना में अधिक मजबूत दिखाई देने लगी है. आम आदमी पार्टी (AAP), तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) से जुड़े कई सांसदों के पाला बदलने की खबरों ने विपक्ष की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन घटनाक्रमों का सीधा असर संसद के भीतर बनने वाले समीकरणों पर पड़ सकता है. अब सरकार को कई विधेयकों और नीतिगत प्रस्तावों पर समर्थन जुटाने के लिए पहले जितनी मशक्कत नहीं करनी पड़ सकती. खास तौर पर उन मुद्दों पर, जहां पहले संख्या बल को लेकर अनिश्चितता बनी रहती थी, वहां सरकार की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत मानी जा रही है.
इस पूरे सियासी घटनाक्रम की शुरुआत 16 अप्रैल 2026 को हुई. नरेंद्र मोदी की सरकार को अपने 12 साल के कार्यकाल में पहली बार किसी संवैधानिक संशोधन विधेयक बिल पेश किया था और इस बिल पर मोदी सरकार को विपक्ष के सामने हार का सामना करना पड़ा था. इस प्रस्तावित संशोधन के जरिए लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या बढ़ाकर लगभग 850 करने का सुझाव दिया गया. साथ ही, नए परिसीमन की प्रक्रिया को 2011 की जनगणना के आंकड़ों से जोड़ने की बात कही गई है.विधेयक में एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह भी शामिल है, जिसके तहत भविष्य में होने वाले परिसीमन के लिए किस जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाएगा, इसका निर्णय करने का अधिकार संसद को देने का प्रस्ताव रखा गया है.
परिसीमन बिल पर सरकार को लगा था 54 वोट का झटका
संसद में पेश किया गया परिसीमन विधेयक अपेक्षित समर्थन हासिल नहीं कर सका और जरूरी दो-तिहाई बहुमत के अभाव में पारित होने से चूक गया. मतदान के दौरान विधेयक के पक्ष में 298 सांसदों ने वोट दिया, जबकि 230 सांसद इसके विरोध में खड़े नजर आए. इस तरह सरकार बहुमत के तय आंकड़े से 54 वोट पीछे रह गई. इस परिणाम को केंद्र सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण सियासी झटका माना जा सकता है. सरकार जिस आत्मविश्वास के साथ विधेयक को आगे बढ़ा रही थी, उसके मुकाबले मतदान का नतीजे अलग नजर आए थे. विधेयक के असफल होने के बाद राजनीतिक हलकों में नई चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है.
