मालवा में कहाँ गए पितरों के दूत? कौवों के विलुप्त होने की कहानी
अशोक झलोया
मंदसौर, नीमच, रतलाम सहित मालवा क्षेत्र में पितरों के दूत कहे जाने वाले कौवे इस बार पितृपक्ष में श्राद्ध की थाली का भोग खाने के लिए भी मौजूद नहीं हैं। श्राद्ध पक्ष में यह विषय लोगों के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है। कितनी भी आवाज लगाओ, कौवे नहीं आते। पहले गांव-गांव में आवाज लगाने पर घर के आंगन और छत पर श्राद्ध का भोजन ग्रहण करने के लिए कौवों की भरमार होती थी। परिजन बड़ी उम्मीद से कौवों को बुलाते हैं, धार्मिक मान्यता है कि कौवे के माध्यम से ही पितरों तक श्रद्धा का भोजन पहुंचता है।अब श्राद्ध में भटकते हे लोगपितृपक्ष में पहले गाँव-गाँव में सुबह कांव-कांव से नींद खुलती थी। इस बार मंदसौर, नीमच, रतलाम, आगर-मालवा, उज्जैन में स्थिति यह है कि श्राद्ध का भोग लगाने के लिए कौवा ही नहीं मिल रहा। लोगों को मजबूरी में गाय और कुत्ते को भोग लगाना पड़ रहा है। यह केवल धार्मिक संकट नहीं, पर्यावरण ...









