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बुजुर्ग माता-पिता की अनदेखी पड़ी भारी, देखभाल नहीं करने पर वापस ले सकते हैं दी गई संपत्ति; बॉम्बे हाईकोर्ट का अहम फैसला

मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि माता-पिता अपनी संपत्ति इस उम्मीद में बच्चों को उपहार स्वरूप देते हैं कि वे उनकी देखभाल करेंगे, लेकिन बच्चे इस जिम्मेदारी का पालन नहीं करते, तो ऐसी स्थिति में माता-पिता अपनी संपत्ति वापस पाने का अधिकार रखते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि यह अधिकार केवल आर्थिक रूप से कमजोर बुजुर्गों तक सीमित नहीं है, बल्कि संपन्न और आत्मनिर्भर वरिष्ठ नागरिक भी इसका लाभ उठा सकते हैं।

यह फैसला कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखद की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी जिसमें एक व्यक्ति ने वरिष्ठ नागरिक ट्रिब्यूनल के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपने पिता को फ्लैट का कब्जा लौटाने का निर्देश दिया गया था।

गिफ्ट डीड में रखी गई थी देखभाल की शर्त

मामले के अनुसार, लोअर परेल निवासी एक जौहरी ने वर्ष 2005 में एक फ्लैट खरीदा था, जहां वह पत्नी, बेटे और उसके परिवार के साथ रहते थे। वर्ष 2023 में उन्होंने गिफ्ट डीड के माध्यम से यह फ्लैट बेटे के नाम कर दिया। इस दस्तावेज में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि बेटा अपने माता-पिता की बुनियादी जरूरतों, देखभाल और शारीरिक आवश्यकताओं का ध्यान रखेगा।

बाद में पिता ने आरोप लगाया कि पारिवारिक संबंध बिगड़ गए और स्थिति ऐसी बन गई कि वर्ष 2025 में उन्हें और उनकी पत्नी को अपना घर छोड़ना पड़ा। इसके बाद उन्होंने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत गठित ट्रिब्यूनल में शिकायत दर्ज कराई।

ट्रिब्यूनल ने दिया था घर खाली कराने का आदेश

सुनवाई के बाद ट्रिब्यूनल ने बेटे और उसके परिवार को निर्धारित समय सीमा के भीतर फ्लैट खाली कर माता-पिता को सौंपने का आदेश दिया। इस आदेश के खिलाफ बेटे ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

बेटे ने दी आर्थिक स्थिति की दलील

याचिका में बेटे की ओर से कहा गया कि उसके पिता आर्थिक रूप से सक्षम हैं। उनका अपना आभूषण कारोबार है और उनके पास अन्य संपत्तियां भी हैं। इसलिए उन्हें वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत राहत नहीं मिलनी चाहिए, क्योंकि वे न तो बेसहारा हैं और न ही अपने भरण-पोषण के लिए दूसरों पर निर्भर हैं।

हाईकोर्ट ने दलील खारिज की

हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 की धारा 23 का उद्देश्य बुजुर्गों की देखभाल सुनिश्चित करना है। यदि कोई संपत्ति इस शर्त पर हस्तांतरित की गई हो कि लाभार्थी माता-पिता की देखभाल करेगा और वह ऐसा करने में विफल रहता है, तो ट्रिब्यूनल उस गिफ्ट डीड को निरस्त या शून्य घोषित कर सकता है।

खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि इस प्रावधान का लाभ लेने के लिए बुजुर्ग का आर्थिक रूप से कमजोर होना आवश्यक नहीं है। अदालत के अनुसार, कानून अमीर और गरीब में कोई भेद नहीं करता। यदि देखभाल की शर्त का उल्लंघन सिद्ध हो जाता है, तो माता-पिता संपत्ति का हस्तांतरण रद्द कराने के हकदार होंगे, चाहे उनकी आर्थिक स्थिति कितनी भी मजबूत क्यों न हो।

बुजुर्ग माता-पिता की अनदेखी पड़ी भारी, देखभाल नहीं करने पर वापस ले सकते हैं दी गई संपत्ति; बॉम्बे हाईकोर्ट का अहम फैसला

मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि माता-पिता अपनी संपत्ति इस उम्मीद में बच्चों को उपहार स्वरूप देते हैं कि वे उनकी देखभाल करेंगे, लेकिन बच्चे इस जिम्मेदारी का पालन नहीं करते, तो ऐसी स्थिति में माता-पिता अपनी संपत्ति वापस पाने का अधिकार रखते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि यह अधिकार केवल आर्थिक रूप से कमजोर बुजुर्गों तक सीमित नहीं है, बल्कि संपन्न और आत्मनिर्भर वरिष्ठ नागरिक भी इसका लाभ उठा सकते हैं।

यह फैसला कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखद की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी जिसमें एक व्यक्ति ने वरिष्ठ नागरिक ट्रिब्यूनल के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपने पिता को फ्लैट का कब्जा लौटाने का निर्देश दिया गया था।

गिफ्ट डीड में रखी गई थी देखभाल की शर्त

मामले के अनुसार, लोअर परेल निवासी एक जौहरी ने वर्ष 2005 में एक फ्लैट खरीदा था, जहां वह पत्नी, बेटे और उसके परिवार के साथ रहते थे। वर्ष 2023 में उन्होंने गिफ्ट डीड के माध्यम से यह फ्लैट बेटे के नाम कर दिया। इस दस्तावेज में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि बेटा अपने माता-पिता की बुनियादी जरूरतों, देखभाल और शारीरिक आवश्यकताओं का ध्यान रखेगा।

बाद में पिता ने आरोप लगाया कि पारिवारिक संबंध बिगड़ गए और स्थिति ऐसी बन गई कि वर्ष 2025 में उन्हें और उनकी पत्नी को अपना घर छोड़ना पड़ा। इसके बाद उन्होंने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत गठित ट्रिब्यूनल में शिकायत दर्ज कराई।

ट्रिब्यूनल ने दिया था घर खाली कराने का आदेश

सुनवाई के बाद ट्रिब्यूनल ने बेटे और उसके परिवार को निर्धारित समय सीमा के भीतर फ्लैट खाली कर माता-पिता को सौंपने का आदेश दिया। इस आदेश के खिलाफ बेटे ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

बेटे ने दी आर्थिक स्थिति की दलील

याचिका में बेटे की ओर से कहा गया कि उसके पिता आर्थिक रूप से सक्षम हैं। उनका अपना आभूषण कारोबार है और उनके पास अन्य संपत्तियां भी हैं। इसलिए उन्हें वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत राहत नहीं मिलनी चाहिए, क्योंकि वे न तो बेसहारा हैं और न ही अपने भरण-पोषण के लिए दूसरों पर निर्भर हैं।

हाईकोर्ट ने दलील खारिज की

हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 की धारा 23 का उद्देश्य बुजुर्गों की देखभाल सुनिश्चित करना है। यदि कोई संपत्ति इस शर्त पर हस्तांतरित की गई हो कि लाभार्थी माता-पिता की देखभाल करेगा और वह ऐसा करने में विफल रहता है, तो ट्रिब्यूनल उस गिफ्ट डीड को निरस्त या शून्य घोषित कर सकता है।

खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि इस प्रावधान का लाभ लेने के लिए बुजुर्ग का आर्थिक रूप से कमजोर होना आवश्यक नहीं है। अदालत के अनुसार, कानून अमीर और गरीब में कोई भेद नहीं करता। यदि देखभाल की शर्त का उल्लंघन सिद्ध हो जाता है, तो माता-पिता संपत्ति का हस्तांतरण रद्द कराने के हकदार होंगे, चाहे उनकी आर्थिक स्थिति कितनी भी मजबूत क्यों न हो।

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