कोलकाता। तृणमूल कांग्रेस में जारी अंदरूनी संकट के बीच पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी की संगठनात्मक पकड़ ने बागी खेमे की रणनीति को फिलहाल झटका दिया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पार्टी के संगठन पर मजबूत नियंत्रण के कारण ममता बनर्जी ने खुद को मूल तृणमूल कांग्रेस के रूप में स्थापित करने की लड़ाई में बढ़त बना ली है।
बागी सांसदों द्वारा अपेक्षाकृत कम चर्चित नेशनल सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय का फैसला करने से महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे और अजीत पवार की तर्ज पर मूल पार्टी पर कब्जा करने की संभावनाएं कमजोर पड़ती दिखाई दे रही हैं। इसके अलावा बागी सांसदों और विधायकों के अलग-अलग राजनीतिक रास्तों ने भी ममता बनर्जी के लिए राहत की स्थिति पैदा की है।
संगठन में ममता का दबदबा बना अहम कारक
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पार्टी संगठन पर ममता बनर्जी की मजबूत पकड़ के कारण बागी सांसदों ने अभी तक सीधे तौर पर मूल तृणमूल कांग्रेस पर दावा करने से दूरी बनाए रखी है। साथ ही, संभावित अयोग्यता से बचने के लिए उन्होंने अलग पार्टी में विलय का रास्ता चुना।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी राजनीतिक दल पर दावे से जुड़े मामलों में चुनाव आयोग और अदालतें केवल सांसदों और विधायकों की संख्या ही नहीं, बल्कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को भी महत्व देती हैं। राष्ट्रीय कार्यकारिणी, राज्य इकाइयों और जिला स्तर के संगठन में किस गुट का कितना प्रभाव है, इसका भी आकलन किया जाता है।
बागी विधायकों की रणनीति को लगा झटका
राज्य विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के कुल 80 विधायकों में से 64 विधायक बागी खेमे के साथ बताए जा रहे हैं। इसी संख्या बल के आधार पर विरोधी धड़े ने नेता प्रतिपक्ष का पद हासिल करने के बाद मूल पार्टी पर दावा जताने की कोशिश की थी।
हालांकि, बागी सांसदों के अलग राह अपनाकर एनसीपीआई में विलय करने से समीकरण बदल गए हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि सांसदों के समर्थन के बिना बागी विधायक धड़े के लिए अकेले पार्टी पर दावा करना आसान नहीं होगा। इसके अलावा संगठन में ममता बनर्जी की पकड़ अब भी मजबूत मानी जा रही है।
आगे की रणनीति पर नजर
विश्लेषकों के मुताबिक, यदि बागी विधायक भी मूल पार्टी पर अधिकार का दावा मजबूत करना चाहते हैं तो उन्हें बागी सांसदों के साथ साझा रणनीति बनानी होगी। इसके लिए एनसीपीआई के साथ तालमेल बढ़ाने के अलावा पार्टी संगठन में भी अपनी स्थिति मजबूत करनी होगी।
बागी सांसद सुदीप बंदोपाध्याय ने संकेत दिए हैं कि संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले दोनों गुट मिलकर आगे की रणनीति तैयार कर सकते हैं।
राजनीतिक समीकरणों में बढ़ सकता है असमंजस
यदि बागी विधायक भी एनसीपीआई में शामिल होते हैं, तो राज्य और केंद्र की राजनीति में दिलचस्प स्थिति पैदा हो सकती है। पश्चिम बंगाल में यह धड़ा भाजपा का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बना रह सकता है, जबकि केंद्र में उसके भाजपा के साथ रिश्ते अलग स्वरूप ले सकते हैं।
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई बागी गुट के साथ किसी संभावित प्रत्यक्ष या परोक्ष समझौते को लेकर सहज नहीं है। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व के सामने भविष्य में बागी नेताओं की भूमिका और संभावित भागीदारी को लेकर नए राजनीतिक समीकरण उभर सकते हैं।
