Tuesday, June 16खबर जो असर करे |
Shadow

पश्चिम एशिया में शांति की असली परीक्षा शुरू, परमाणु विवाद से आगे बढ़कर 60 दिन तय करेंगे युद्ध और भरोसे का भविष्य

वाशिंगटन/तेहरान। अमेरिका और ईरान के बीच बने नए शांति ढांचे को परखने के लिए तय की गई 60 दिन की अवधि पश्चिम एशिया के भविष्य के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि यह समय केवल परमाणु कार्यक्रम पर सहमति का नहीं, बल्कि क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने की सबसे बड़ी परीक्षा साबित होगा।

समझौते की दिशा में बढ़ते हुए अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अपने रुख में नरमी दिखाई है। तेहरान पर तत्काल परमाणु गतिविधियां पूरी तरह बंद करने का दबाव बनाने के बजाय उसे बातचीत और समाधान के लिए समय दिया गया है। हालांकि परमाणु कार्यक्रम पूरे संकट का प्रमुख मुद्दा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अगले दो महीनों में दोनों देशों के बीच विश्वास, सैन्य संयम और समझौते की शर्तों के पालन की वास्तविक परीक्षा होगी।

60 दिनों में तय होगी शांति की दिशा

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस अवधि में यह स्पष्ट होगा कि अमेरिका और ईरान के बीच भरोसा किस स्तर तक मजबूत हो पाता है। साथ ही, समझौते को स्वीकार नहीं करने वाले इजराइल का रुख भी महत्वपूर्ण रहेगा। मिसाइलों, ड्रोन और हवाई हमलों के इस्तेमाल में कितना संयम बरता जाता है और सभी पक्ष समझौते की शर्तों का कितनी गंभीरता से पालन करते हैं, यही पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की राह तय करेगा।

परमाणु मुद्दे पर मजबूत स्थिति में दिख रहा ईरान

विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और इजराइल अपने सभी रणनीतिक लक्ष्य हासिल करने में सफल नहीं रहे, जबकि ईरान ने इस पूरे घटनाक्रम के दौरान अपनी स्थिति को अपेक्षाकृत मजबूत बनाया है। परमाणु वार्ता को लेकर उसकी स्थिति पहले की तुलना में अधिक मजबूत मानी जा रही है। मौजूदा समझौता कई मायनों में हालात को युद्ध पूर्व की स्थिति के करीब ले जाता है।

युद्ध से पहले अमेरिका के पास ईरान पर दबाव बनाने के दो प्रमुख साधन थे—कड़े आर्थिक प्रतिबंध और परमाणु प्रतिष्ठानों पर सैन्य कार्रवाई। जून 2025 में चलाए गए ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ के दौरान नातंज, इस्फहान और फोर्डो स्थित परमाणु केंद्रों को भारी नुकसान पहुंचाया गया था।

होर्मुज जलडमरूमध्य ने बढ़ाई ईरान की रणनीतिक ताकत

रिपोर्टों के अनुसार, ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी रणनीतिक स्थिति का लाभ उठाकर अमेरिकी दबाव को काफी हद तक संतुलित किया। साथ ही, उसने अमेरिका समर्थित देशों के सैन्य और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को भी नुकसान पहुंचाया। ईरान का दावा है कि उसने संघर्ष के दौरान अमेरिका और इजराइल की तुलना में अधिक ठिकानों को निशाना बनाकर अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन किया।

ट्रंप बोले- संवर्धित परमाणु ईंधन हटाने की कोई जल्दबाजी नहीं

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान के भूमिगत ठिकानों में मौजूद बम बनाने योग्य संवर्धित परमाणु सामग्री को हटाने की प्रक्रिया को लेकर कोई जल्दबाजी नहीं है। उनके अनुसार, अमेरिका और ईरान मिलकर समय के साथ इस सामग्री को बाहर निकालेंगे और उसका निष्प्रभावीकरण किया जाएगा।

ट्रंप ने कहा कि सैन्य कार्रवाई और मिसाइल हमलों का ही प्रभाव था, जिसके कारण समझौते का रास्ता खुला। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे किसी तीसरे सैन्य हमले के पक्ष में नहीं हैं। ट्रंप के अनुसार, अमेरिका ईरान के पास मौजूद लगभग 12 टन संवर्धित परमाणु ईंधन को सुरक्षित तरीके से हटाने और उसका निम्नीकरण करने की प्रक्रिया में सहयोग करेगा।

उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में हुए परमाणु समझौते के तहत ईरान के परमाणु भंडार का लगभग 97 प्रतिशत हिस्सा रूस भेजा गया था।

हालांकि, पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की संभावनाएं अब केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं हैं। आने वाले 60 दिन यह तय करेंगे कि क्षेत्र एक बार फिर संघर्ष की ओर बढ़ेगा या कूटनीति और भरोसे के सहारे स्थिरता की नई राह पर आगे बढ़ेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *