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कमलनाथ ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्तियों पर उठाए सवाल, कहा- “पूर्व सरकारी वकीलों से निष्पक्षता की उम्मीद कैसे करें?”

भोपाल, 31 जनवरी (प्रेस ब्यूरो)। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता कमलनाथ ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में हाल ही में हुई न्यायाधीश नियुक्तियों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र में न्यायपालिका अंतिम उम्मीद की संस्था होती है, लेकिन जब अदालत में पूर्व सरकारी वकीलों की बड़ी संख्या होती है, तो आम नागरिकों के मन में निष्पक्षता को लेकर स्वाभाविक संदेह उत्पन्न होता है।

कमलनाथ ने शनिवार को सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट किया कि लोकतंत्र में न्यायपालिका वह संस्था मानी जाती है, जहाँ सत्ता के अत्याचार के खिलाफ अंतिम उम्मीद होती है। आम नागरिक विश्वास करता है कि अदालतें सरकार से ऊपर उठकर, बिना किसी दबाव या झुकाव के, केवल संविधान और न्याय के आधार पर फैसले देंगी। लेकिन जब न्यायपालिका की संरचना सत्ता के पूर्व पैरोकारों से भरी नजर आती है, तो यह विश्वास संकट में पड़ जाता है।

उन्होंने आगे कहा कि हालिया तथ्य बताते हैं कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में नियुक्त जजों का एक बड़ा हिस्सा पहले सरकार के वकील के रूप में काम कर चुका है। यह स्थिति न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सीधा प्रश्न उठाती है। वर्षों तक सरकार का पक्ष रखने के बाद, उसी सरकार के मामलों में निष्पक्ष निर्णय देने की अपेक्षा सामान्यतः संदेह को जन्म देती है।

‘व्यक्तिगत ईमानदारी या योग्यता पर हमला नहीं’

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि यह प्रश्न किसी व्यक्ति की ईमानदारी या योग्यता पर व्यक्तिगत हमला नहीं है, बल्कि पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल है। न्याय केवल होना ही पर्याप्त नहीं, उसका निष्पक्ष दिखना भी आवश्यक है। जब अदालत में बैठा जज कभी उसी सत्ता का पैरोकार रहा हो, जिसके खिलाफ आज नागरिक न्याय की गुहार लगा रहा है, तो आम आदमी के मन में यह शंका स्वाभाविक है कि क्या उसे बिना पक्षपात के न्याय मिल पाएगा।

कमलनाथ ने यह भी कहा कि सरकार और न्यायपालिका के बीच की संवैधानिक दूरी लोकतंत्र की बुनियाद है। न्यायपालिका का काम सत्ता पर नियंत्रण रखना है, न कि उसके निर्णयों को सहज रूप से वैधता प्रदान करना। यदि न्यायिक पदों पर उन्हीं लोगों की संख्या बढ़ती जाती है, जो कल तक सरकार के हितों की रक्षा कर रहे थे, तो यह दूरी खतरनाक रूप से सिमटने लगती है। ऐसी परिस्थिति में अदालतें धीरे-धीरे सत्ता के विरुद्ध ढाल बनने के बजाय, सत्ता के लिए सहज रास्ता बन जाती हैं।

उन्होंने कहा कि इसका सबसे बड़ा नुकसान जनता के भरोसे को होता है। जब नागरिक महसूस करने लगता है कि अदालतें भी सरकार के प्रभाव से मुक्त नहीं हैं, तो वह न्याय की प्रक्रिया से निराश होने लगता है। यही निराशा अंततः लोकतंत्र को भीतर से खोखला कर देती है। कानून भले ही कागज़ों पर मजबूत दिखे, परंतु यदि न्याय पर भरोसा खत्म हो जाए, तो लोकतंत्र का नैतिक आधार ढहने लगता है।

कमलनाथ ने कहा कि न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता, संतुलन और विभिन्न पृष्ठभूमियों का प्रतिनिधित्व अत्यंत आवश्यक है। यह आवश्यक है कि अदालतें केवल एक ही वर्ग या सत्ता-समर्थक पृष्ठभूमि के लोगों से न भरी हों। यदि समय रहते इस प्रवृत्ति पर गंभीर आत्ममंथन और सुधार नहीं किया गया, तो अदालतों के फैसले तकनीकी रूप से वैध होने के बावजूद, जनता की नज़र में उनकी विश्वसनीयता लगातार कम होती जाएगी। अंततः सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका जनता की उम्मीदों की संरक्षक बनी रहेगी, या सत्ता के साये में खड़ी एक और संस्था बनकर रह जाएगी। यही सवाल लोकतंत्र की दिशा तय करेगा।

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